Saturday, January 16, 2010

चांस पे डांस : नाच ना जाने, आँगन टेढ़ा

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

जब किसी स्टार की लगातार तीन फिल्में सुपर हिट होती हैं, तो ये लाजमी है कि उसके नए फिल्म से लिए लोगों की अपेक्षाए बढेंगी ही। उस पर अगर वह फिल्म नाम से डांस फिल्म लगती हो और वह स्टार शाहीद कपूर जैसा अतुलनीय डांसिंग स्टार की हो तो कुछ जलवे की उम्मीद रखना कोई गलत बात भी नहीं है।

क्या केन घोष अपनी तीसरी फिल्म में इतनी सारी उम्मीदों पर खरे उतर पाये हैं?

कथा सारांश :

कहानी है समीर बहल (शाहीद कपूर) की जो एक बड़ा ब्रेक मिलने के लिए संघर्ष कर रहा है। दिन में कोरियर ऑफिस में काम करते-करते वह बहुत सारी जगह काम पाने की कोशिश करते रहता है। नाकारा भी जाता है तो उसे दिल पे न लेते हुए और कोशिश करते रहता है।

एक दिन एक म्यूजिक वीडियो के टेस्ट में वह चुना जाता है पर किसी और सिफारिश वाले बन्दे के कारण वह काम भी उसे नहीं मिलता। पर वहीं उसकी पहचान एक नृत्यनिर्देशिका सोनिया (जेनिलिया डिसौज़ा) से होती है। फिर से एक जगह काम पाने के लिए गए समीर को हीरो के लिए डायरेक्टर (मोहनीश बहल) चुन लेता है। और वहाँ फिर से समीर की मुलाकात सोनिया से होती है जो उस फिल्म की डांस डायरेक्टर है। दोनों दोस्त हो जाते है।

इस ख़ुशी के दिन ही समीर का मकानमालिक उसे घर से निकल देता है। ऐसी कठिनाइयों का सामना कर के क्या समीर अंत में जीत पाता है?

पटकथा:

कथा जब ख़ास नहीं होती है (बार-बार सुनी सी नहीं लगती क्या?) तो भी उसे पटकथाकार उभार कर एक अलग ऊँचाई पर ले जा सकता है। पर यहाँ ऐसा नहीं हो पाया है। पटकथाकार बार-बार कहानी को वहीं-वहीं घुमाता रहा है और कहानी जैसे एक ही जगह रुकी सी लगती है। फिल्म का प्रॉब्लम पटकथा में है क्योंकि इसी तरह की एक कहानी को "लक बाय चांस' फिल्म में अच्छी तरीके से पेश किया गया है.

दिग्दर्शन:

कमजोर कहानी को सशक्त पटकथा संभाल सकती है पर कमजोर पटकथा को अच्छा दिग्दर्शक भी संभाल नहीं सकता। और यहाँ तो केन घोस जी ने भी नहीं किया है। वे हर दृश्य को और ज्यादा धीमा कर के फिल्म को और बोरिंग बनाते हैं। अगर फिल्म की गति को तेज रखा होता तो शायद फिल्म कुछ हद तक ठीक हो सकती थी। पर यहाँ केन घोष ऐसा करने में नाकामयाब रहे है।

अभिनय:

अभिनय के मामले में शाहीद और जेनेलिया ने इमानदारी से मेहनत की है। शाहीद ने अच्छी एक्टिंग, डांसिंग एंड बॉडी सबका प्रदर्शन किया है पर जहाँ लेखन में ही कमजोरी है वे भी क्या कर सकते है। खून अगर कम हो तो शरीर तो पीला पड़ता ही है। बाकी सभी किरदारों ने अपना काम ठीक-ठाक किया है। पर फिल्म में किसी भी किरदार को निखारा नहीं गया है।

चित्रांकन :

चित्रांकन आज के ज़माने में ज्यादातर फिल्मों में अच्छा ही होता है। इस मामलेमें बॉलीवुड का तकनीकी स्तर ऊँचा हो ही गया है। यह फिल्म भी चकाचक है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

जहाँ शहीद हीरो है और फिल्म के नाम में ही डांस है तो लोग खूब मजेदार डांस की अपेक्षा करेगे ही। पर यहाँ ये डिपार्टमेंट भी कुछ ज्यादा असरदार नहीं हो पाया है। इस तरह के डांस तो हमलोग आजकल टीवी शो में भी देखते हैं। कई बार इससे ज्यादा अच्छे भी।

संकलन:

पटकथा में कंटेंट नहीं है, दिग्दर्शक ने शूटिंग के वक्त कुछ खांस किया नहीं है, तो निर्देशक ने सब जैसे के तैसे लगा दिया है। अगर फिल्म और छोटी की गयी होती और गतिमान रखी गयी होती तो शायद देखने लायक हो सकती थी।

निर्माण की गुणवत्ता:

निर्माण की गुणवत्ता अच्छी है। यू टीवी की फिल्म होने के कारण इस डिपार्टमेंट में कोई कमी नहीं है।

लेखा-जोखा:

*१/२ (१.५ तारे)

फिल्म में कुछ दृश्य मजेदार हैं पर उतने फिल्म को असरदार बनाने में काफी नहीं हैं। फिल्म एक ही जगह अटकी रहती है और किसी भी किरदार से दर्शक खुद को जोड़ नहीं पाते हैं। यह फिल्म देखने की सलाह मैं किसी को भी नहीं दे सकता-इसका मुझे खेद है।


चित्रपट समीक्षक:--- प्रशेन ह.क्यावल

तुम जिओ हजारों काल

अबके उनके जन्मदिन पर फेस टू फेस उन्हें शुभकामनाएं देने के लिए मैं उतावला था। पर मेरे उतावले होने से क्या होता है? जितनी बार भी उनके कार्यालय में फोन लगाता तो हर बार पीए कहता,’ अभी तुम उनसे से नहीं मिल सकते। पंद्रह दिन तक तो उन्हें बधाई देने वालों की रिजर्वेशन हो चुकी है। रोज फोन कर अपना समय तो खराब कर ही रहे हो मेरा भी समय खराब करते हो?’
‘उनका जन्मदिन कब तक चलने की संभावना है?’
‘यार ! झुग्गी वाले तो हैं नहीं। दमखम वाले हैं। जब तक उनके नियाोक्ताओं की इच्छा होगी तब तक जन्मदिन का जश्न चलता रहेगा। पर तुम हो कौन?’
‘ मैं... मैं तो रामजी दास हूं सर जी। जिसने उन्हें वोट दिया है। जो जबसे उनकी सरकार बनी है तबसे अभावों में जी रहा है। ’
‘यार बड़े बदतमीज हो। चार साल पहले एक वोट क्या दिया, जैसे उन्हें ही खरीद लिया।’
‘एक एक वोट कर ही तो वे नेता बने हैं। कभी कहते हैं कि मैं ज्योतिषी नहीं जो यह बता दूँ
कि कब चीनी सस्ती होगी। और दूसरे ही दिन भविष्यवाणी कर देते हैं कि आने वाले समय में जल्दी ही चीनी सस्ती हो जाएगी। उनसे मेरी ओर से यह तो पूछना कि उन्हें हमने जिताकर भविष्यवाणियाँ करने के लिए भेजा है या आम जनता के लिए काम करने के लिए?’
‘ अच्छा चल यार! जो नेता चरित्र और जबान फिसले लानत है उस नेता पर। ज्यादा दिमाग मत खा! कल आ जाना उनसे मिलने ठीक चार बजे। बीच में से उनका कीमती समय चुराकर तुझे दे रहा हूं।’
‘दो बजे क्यों नही?’
‘दो बजे तो उनका जनता का पेट काटने सॉरी, केक काटने का प्रोगाम है।’
‘धन्यवाद सर जी! बहुत बहुत धन्यवाद सर जी!’
‘ अच्छा अब बंदकर फोन! हिंदुस्तान का तभी तो विकास नहीं हो रहा है जब तुम लोग हिंदी को मरी बंदरिया के बच्चे की तरह गले से लगाए हो।’
....और मैं कल दस बजे कोहरे को चीरता हुआ उनके कार्यालय की ओर कूच कर गया। न कहीं ठंड लग रही थी न ही महीने से चल रहे जुकाम का दूर दूर तक कोई नामोनिशान था। इन दोनों को पता था कि मैं किस से मिलने जा रहा हूं। बड़ी से बड़ी बीमारियां इनका नाम सुनते ही समाज से छू मंत्र हो जाती हैं।
पीए द्वारा बताए टाइम के दो घंटे आद मेरी बारी आई। मर गया बैठ बैठ कर,‘ हूं! क्या नाम है?’ मुझे बिलकुल खाली देख उनका पीए घूरा।
‘ रामजी दास! जनाब को जन्मदिन की शुभकामनाएं देना चाहता हूं! बस!!’
‘क्या काम करते हो?’
‘ प्रधानमंत्री रोजगार योजना में सबको देने के बाद जो बचता है, करता हूं।’
‘चलो अंदर! पता नहीं कहां कहां से उठकर खाली हाथ चले आते हैं।’ और मैं उनसे मिलने अंदर। वे कुर्सी पर जन्मदिन इतने दिन जक मना शुभकामनाएं ले लेकर पूरी तरह थके हुए।
‘नमस्कार जी!’
‘ कौन??’
‘जी मैं रामजी दास !’
‘पर तुम तो मेरे जलसे के लिए हो। यहां कैसे आ गए?’
‘ जन्मदिन की शुभकामनाएं देने आया हूं।’
देख लो ,साथ में कोई समस्या तो नहीं लाए हो? समस्या से मुझे बहुत चिढ़ है।’ उनके कहने पर मैंने खुद को झाड़ा तो पता नहीं कहां से मरी एक समस्या झड़ गई। मैं इसे साथ लेकर तो आया नहीं था। समस्या फर्श पर गिरते देख वे गुस्साए,‘ यार! कम से कम जन्मदिन वाले दिन तो रंग में भंग मत डाला करो। जब देखो! कपड़ों की जगह समस्याओं को ओढ़े घूमते रहते हो। तुम लोगों के साथ यही तो एक प्राब्लम है। तभी तो तुम लोगों से सरकार में आने के बाद हम लोगों को मिलना कतई भी अच्छा नहीं लगता। प्राब्लम के अतिरिक्त कभी तो कुछ और भी लाया करो यार!’
‘अपने जन्म महीने में आप जनहित में क्या करना चाहते हो सर जी!’
‘सबसे पहले तो जनहित में इस महीने अपने लिए चार फार्म हाउस बनाऊंगा। जनता के कामों से जब जब थका करूंगा तो जनता के लिए रीफ्रेश होने कहीं भी चला जाया करूंगा ताकि मीडिया को पता ही न चले कि मै थक कर कहां हूं। फिर जनहित में इसी महीने अपने दिल का इलाज करवाने विदेश जाऊंगा ताकि लंबे समय तक जनता की सेवा कर सकूं। फिर जनहित में पक्की सड़कों को तुड़वा उन्हें फिर और पक्की करवाऊंगा। इसी महीने जनहित में अपनी दवाई की फैक्टरी की सप्लाई सरकारी अस्पतालों में लगवाऊंगा जनहित में गरीब बस्ती उठवा वहां फाइव स्टार होटल का पत्थर रखवाऊंगा। जनहित में अपने जन्म महीने में अपने नाम के दस और शिक्षा संस्थान खुलवाऊंगा ताकि वहां पर जनता के बच्चे चैन से पढ़ सकें। इसी महीने जनहित में ऊंचे पदों पर अपनों को बिठाऊंगा ताकि वे बेहिचके मेरे एंगिल से जनसेवा कर सकें।
‘और??’
‘अपने जन्म महीने में जनहित में शहर के अपने बंगले को और बड़ा करूंगा ताकि दूसरे नेताओं के आगे तुम्हारे नेता का कद बौना न लगे। विपक्ष की ऐसी तैसी घूमा कर रख दूंगा।‘
‘और????’
‘यार! बहुत नहीं हो गया एक महीने के लिए! काम करवा करवाकर मुझे मारने का इरादा है क्या!! तुम लोगों के साथ यही तो एक सबसे बड़ी मुश्किल है। दारू की बोतल ले एक वोट क्या देते हो सोचते हो स्वर्ग जमीन पर उतारने वाला मिल गया।’
‘जन्म मुबारक हो सर जी। आप जिओ हजारों साल, दिन के एक घंटे हो एक लाख!’

डॉ.अशोक गौतम

Saturday, January 09, 2010

क्या न्याय के लिये जान देना जरूरी है?

जी हां, शायद लग तो यूँ ही रहा है। रुचिका जैसी तमाम कई लड़कियाँ रोज आत्महत्याएँ करने के लिए मजबूर हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी पुकार न्याय के मंदिर तक नहीं पहुंच पातीं...और दुनिया बदस्तूर चलती रहती है। न्याय पाने में उन्नीस वर्ष का समय लग जाना और डीजीपी को बचाने के लिये हरियाणा के मुख्यमंत्रीी समेत पूरी राज्य व्यवस्था द्वारा अपनी पूरी ताकत लगा देना हमारी समूची कानूनी व्यवस्था को नग्न कर देता है। दोषी डीजीपी राठौर का साथ देने वाले भी उतने ही गुनाहगार हैं जितने कि स्वयं डीजीपी। राठौर को केवल छह माह की सजा और एक हजार जुर्माना लगाया जाना क्या न्याय संगत था ? जबकि छेड़छाड़ के लिए धारा 354 के तहत 2 साल की सजा का प्रावधान है। आखिर क्यों डीजीपी जैसे लोगों के लिए अलग और आम आदमी की सजा के लिए अलग कानून हैं? हालांकि अब इस मामले को मीडिया द्वारा उछाले जाने के बाद और लोगों की प्रतिक्रियाओं को देखते हुए सीआरपीसी के तहत अहम संशोधन लागू हुआ है। पर अब देखना यह है कि यह किस हद तक लागू होगा। क्योंकि इससे पहले भी कई ऐसे कानून बनाये गये हैं, और तोड़े भी गये हैं तो इन्हीं कानून के रक्षकों द्वारा ही।
अब यह सोचने वाली बात तो यह है कि आखिर क्यों रुचिका को जान देने के लिए मजबूर होना पड़ा? यदि पुलिस ने सही समय पर पीड़िता की शिकायत पर संज्ञान लिया होता तो आज रुचिका जिंदा होती। रुचिका जैसी लड़कियां प्रताड़ित होकर या तो आत्महत्या कर लेती हैं या फिर परिवार वालों पर पुलिसिया दवाब के चलते चुप रह जाती हैं ताउम्र सिसकने के लिए। यह कोई पहला किस्सा नहीं जब कोई रक्षक ही भक्षक बन गया हो । ऐसे ही भ्रष्ट अफसरों की लंबी फेहरिस्त है। शिवानी हत्याकांड में दोषी पाये गये आई पी एस अधिकारी आर के शर्मा, और अभी-अभी सुर्खियों में आया 13 साल पहले पूर्व डीआईजी टंडन पर आदिवासी लड़की को अगवा कर बलात्कार का मामला दर्ज है। इन सभी केसों में यह देखा गया है कि भ्रष्ट अफसरों के आरोप कभी सामने आये भी हैं तो यह सर्वविदित है कि उन्हें सत्तासीन किसी वरिष्ठ नेता का प्रश्रय मिला होता है जिससे यह सजा पाने में साफ बच निकलते हैं या फिर इनकी सजाओं में रियायत हो जाती है। दूसरे हमारे देश की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब निचली अदालतें राजनीतिक प्रभुत्ववालों के सामने या उंचे पदों पर बैठे भ्रष्ट अफसरों के सामने न्याय करने में अवश सी नजर आती है तब रही सही कसर उंची अदालतें उनके फैसलों को अनपेक्षित ढंग से बदल कर उनके हित में फैसले कर देती है। उससे भी बड़ी दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह है कि यदि कोई ईमानदार अफसर अपने काम के प्रति ईमानदारी बरते तो उस पर रोक लगाना, उसका तबादला करा देना या फिर उसे हाशिये पर डाल दिया जाना कोई नयी बात नहीं। आईपीएस अधिकारी किरन बेदी को सच बोलने की सजा ’’सोशल इनजस्टिस‘‘ के तौर पर मिलेगी इसकी उन्हें कत्तई उम्मीद न थी। आला दर्जे की अधिकारी ने ऐसी संड़ांध व्यवस्था से क्षुब्घ होकर ही स्वैच्छिक सेवा निवृति ले ली थी।

मौजूदा न्याय व्यवस्था इतनी रुग्ण और अनउपयुक्त है जिसके इलाज के लिये सख्त से सख्त रास्ता खोजा जाना बेहद जरुरी हो गया है। कानून का चाबुक केवल आम आदमियों को पड़ता है क्योंकि वह बचने के उटपटांग रास्ते नहीं जानता या फिर किसी का वरदहस्त उसके सिर पर नहीं होता। सबसे पीड़ादायक बात तो तब होती है जब वर्षों तक न्याय नहीं हो पाता और उस पर भी जब अफसरों के नाम मामला दर्ज होता है,तब या तो वे प्रमोशन पा जाते हैं या लंबित जांच का उनके प्रमोशन पर कोई असर नहीं पड़ता। यानिकि कानून को ठेंगा दिखाने वाले स्वयं ही सरकारी तंत्रा के लोग होते हैं। उदाहरणार्थ कुछ समय पहले ही अपहरण के मामले में एक डीसीपी पर आरोप लगा था। आलम यह कि न तो उस पर कोई कार्रवाई हुई और न ही उसे गिरफतार किया गया। जबकि हुआ यूं कि प्रमोशन के तौर पर इसी डीजीपी ने सीआईडी में भी काम किया।

भारत को तात्कालिक न्यायिक सुधार की जरुरत है खासकर बलात्कार के मामले में कठोर से कठोर दंड की, जहां दुधमुंही बच्चियों को तक शिकार बनाने से नहीं चूका जाता। आये दिन बलात्कार की घटनाओं से पटे पड़े रहते हैं हमारे न्यूज पेपर जैसे कि यह आम बात हो गई हो। सरकार को चेतना होगा आखिर क्यों बार-बार ऐसी पुनरावृत्तियां होतीं हैं ? यौन उत्पीड़न और बलात्कार जैसे मामलों के लिये सख्त कानून क्यों नहीं बन रहे हैं? आखिर सवाल यह भी पैदा होना लाजमी है कि कौन हैं वे लोग जो ऐसे कठोर कानून नहीं चाहते ? और कौन हैं वे लोग जो ऐसे घृणित लोगों की पैरवी करते हैं ?क्या उन्हें सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए? आखिर कब तक ऐसी कई और रुचिकाओं को न्याय पाने के लिये जान देनी पड़ती रहेगी??
सुमीता केशवा

Thursday, December 31, 2009

राजेन्द्र अवस्थी – एक जाँबाज़ साहित्यकार


मध्य प्रदेश के गढा जबलपुर में 25 जनवरी, 1930 को जन्मे श्री राजेन्द्र अवस्थी नवभारत, सारिका, नंदन, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के संपादक रहे। उन्होंने कई चर्चित उपन्यासों, कहानियों एवं कविताओं की रचना की। वह ऑथर गिल्ड आफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे। दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी ने उन्हें 1997-98 में साहित्यिक कृति से सम्मानित किया था। 30 दिसम्बर की सुबह लगभग 9:30 बजे दिल्ली के एस्कार्ट हॉस्पिटल में राजेन्द्र अवस्थी का देहांत हो गया।

उनके उपन्यासों में सूरज किरण की छांव, जंगल के फूल, जाने कितनी आंखें, बीमार शहर, अकेली आवाज और मछलीबाजार शामिल हैं। मकड़ी के जाले, दो जोड़ी आंखें, मेरी प्रिय कहानियां और उतरते ज्वार की सीपियां, एक औरत से इंटरव्यू और दोस्तों की दुनिया उनके कविता संग्रह हैं जबकि उन्होंने ‘जंगल से शहर तक’ नाम से यात्रा वृतांत भी लिखा है।
घर में कम्बल ओढ़ कर दूरदर्शन पर पूरे उत्तरी भारत में शीत लहर के दृश्य देखते देखते और खबरें सुनते सुनते अचानक पर्दे पर नीचे कहीं लिखित समाचारों में एक दुखद समाचार. मन एक सदमे की चपेट में आ जाता है. राजेंद्र अवस्थी नहीं रहे. सारिका, नंदन, कादम्बिनी और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी पत्रिकाओं के लोकप्रिय संपादक राजेंद्र अवस्थी के जाने की खबर मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था. स्मृति बहुत पीछे, सन 87 के आसपास चली जाती है. हिंदी के एक अन्य सशक्त हस्ताक्षर स्व. मणि मधुकर मेरे परम मित्र थे और वे अचानक फोन करते हैं कि तुम्हारी कहानी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी है. हमेशा की तरह मुझे प्रसन्नता तो होती है लेकिन मैं मधुकर जी से कहता हूँ कि राजेंद्र अवस्थी के संपादन काल में साप्ताहिक में छपी यह मेरी पहली कहानी है. मधुकर कहते हैं कि आज शाम को आना मेरे यहाँ, तुम्हें सीधे राजेंद्र अवस्थी के पास ले जाऊंगा. मैंने भी उन से यही कहा कि दिल्ली की सभी गण-मान्य साहित्यिक हस्तियों से मैं मिल चुका हूँ, पर राजेंद्र अवस्थी को कुछ कार्यक्रमों में देख कर भी बढ़ कर उन से परिचय लेने में संकोच सा हुआ है. मधुकर पूछते हैं – ‘ऐसा क्यों? आप तो उत्साही व्यक्ति हैं, सब से मिल लेते हैं’. मैं उन्हें दिल की बात बताता हूँ कि राजेंद्र जी देखने में मुझे कुछ आला शख्सियत से लगते हैं, सो यह संकोच. फिर मैंने उन्हें बताया कि शीला गुजराल की संस्था ‘लेखिका’ के एक कार्यक्रम में दिल्ली और बाहर के तमाम बड़े बड़े साहितयकर आए थे, उनमें अमृता प्रीतम भी थी, जैनेन्द्र भी. अमृता के भाषण के बाद मैंने देखा कि जो साहित्यकार माइक पर आए, वे हैं राजेंद्र अवस्थी. खासे handsome हैं. बहुत प्रभावशाली तरीके से बात करते हैं. बल्कि उनसे पहले अमृता प्रीतम ने महिलाओं के प्रति खासी सहानुभूति जताई थी कि महिलाऐं लेखक बनना चाहें तो समाज उस में रोड़े अटकाता है. उन्होंने जापान और अन्य देशों की कुछ उभरती लेखिकाओं की आत्महत्याओं का ज़िक्र किया. तब राजेंद्र अवस्थी ने बड़े हंसमुख और चुटीले तरीके से अमृता जी की बात पर चुटकी भी ली कि अमृता जी ने तो हमारे सामने आत्महत्याओं की एक अच्छी भली Directory भी रख दी. मुझे लगा कि बात को हंसमुख तरीके से कहना हो तो कोई उन से सीखे, क्यों कि अमृता जी द्वारा बताए दुखद प्रसंगों से जहाँ एक और वातावरण बोझिल सा हो उठा, वहीं राजेंद्र जी ने सब को हंसा कर मन को हल्का भी कर दिया. खूब handsome और प्रभावशाली हैं वे. मेरा संकोची मन आगे बढ़ कर उन्हें अपना परिचय नहीं दे पाता.

शाम को इसीलिए तैयार हो कर मधुकर जी के घर चला जाता हूँ, इसी उत्साह के साथ कि वे मुझे राजेंद्र जी से मिलवाएंगे. मैं उन्हें बताऊंगा कि मैंने आप का उपन्यास ‘सूरज किरण की छांव में पढ़ा है...’. मधुकर जी परिवार समेत अपनी कार में मुझे भी ले चलते हैं. चीनी दूतावास में एक पार्टी है. वो रहे राजेंद्र जी. एक सोफे पर बड़े हलके मन हो बैठे हैं. मधुकर जी मेरा हाथ खींच कर ठीक उनके सामने खड़ा कर देते हैं – ‘ये हैं आप के कहानीकार, प्रेमचंद सहजवाला. कहते हैं, सीधे बात करने में संकोच हो रहा है, वह भी आप से’! राजेंद्र जी मुस्कराते हैं. उन की मुस्कराहट में एक अजब प्रोत्साहन सा है. पर वे कहते हैं- ‘मैं ने आप की कहानियां ‘कहानी’ में भी पढ़ी हैं और ‘सारिका’ ‘धर्मयुग’ में भी. पर जो कहानी आपने मुझे भेजी और आज छपी है, वह उन दूसरी कहानियों की तुलना में पीछे लगी. और बेहतर लिख सकते थे’. मुझे अचरज भी है और अविश्वास भी कि इन्होने क्या मेरी कहानियां पढ़ी होंगी? पर अचरज इस बात पर भी कि ये झूठा प्रोत्साहन नहीं दे रहे. जैसा इन्हें लग रहा है, वैसे कह रहे हैं. मैं संकुचित सा उन्हें कहता हूँ – ‘संभवतः इस कहानी में मैं इतनी जान नहीं डाल सका, जितनी डालने चाहिए थी’. पर राजेंद्र जी कह रहे हैं – ‘आप की कहानी अगर कमज़ोर होती, तो क्या मैं उसे छापता? वह छापने योग्य थी. पर मुझे लगा कि उस पर आप और मेहनत कर सकते थे’. मैं प्रभावित था, इतना बेबाक मार्ग दर्शन, क्या कोई संपादक इतना ध्यान अपने कहानीकारों पर् दे सकता है?...

...और आज उनके निधन की खबर पर अचानक वही, बरसों पुराना चेहरा सामने आ गया. चंद श्रद्धांजलि भरे शब्द लिखने बैठा तो कई साहित्यकार मित्रों से फोन पर पूछने लगा- ‘उन के बारे में क्या कहना है आप को? ‘जंगल के फूल’ जैसे सशक्त उपन्यासकार के बारे में आप के क्या अनुभव हैं’? तब लक्ष्मीशंकर बाजपेयी अल्मोड़ा की किसी लेखिका दिवा भट्ट का सन्दर्भ देते हैं. वे कहते हैं कि एक बार जब वे अल्मोड़ा गए तो किसी प्राध्यापिका दिवा भट्ट ने उन्हें अपनी कहानी पढ़ कर सुनाई. बाजपेयी जी को कहानी अच्छी लगी. उन्होंने दिवा जी को सुझाव दिया कि वे वह कहानी राजेंद्र अवस्थी जी के पास, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशनार्थ भेज दें. दिवा जी भी संकुचित थी – ‘क्या ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ वाले मेरी कहानी छाप देंगे’? बाजपेयी साहस बढ़ाते हैं – ‘ अच्छी लगेगी तो क्यों नहीं छापेंगे? भेज कर देखो’. और दिवा जी वह कहानी छप जाती हैं. बाजपेयी जी का कहना है कि किसी भी नए से नए लेखक की कहानी में अगर दम है, तो अवस्थी जी उसे कभी उपेक्षित नहीं करते थे. राजेंद्र जी से लगभग दो दशक के परिचय के आधार पर बाजपेयी जी का कहना है कि वे बहुत ही सुलझे हुए और खुशहाल सी तबियत वाले व्यक्ति थे.

"वे हमेशा एक संपादकीय दबदबा तो रखते थे, पर कभी किसी को दबाते नहीं थे"
--अशोक चक्रधर
हिंदी के प्रसिद्ध कवि कथाकार डॉ. वीरेंद्र सक्सेना ने फोन पर बताया कि राजेंद्र जी के साथ उन्होंने कई यात्राएं की व कई कार्यक्रमों में उन के साथ गए. राजेंद्र जी मित्रों के प्रति सच्चा स्नेह रखते थे और खुद उन के निवास पर भी कई बार उनके जन्म दिवस या अन्य अवसरों पर गए . राहुल सांकृत्यायन की जन्मशताब्दी के अवसर पर भी वे देहरादून उनके साथ गए. जनवरी 1930 में मध्यप्रदेश में जन्मे राजेंद्र अवस्थी ने कई कहानियां, उपन्यास व यात्रा-वृतांत लिखे व अनेकों पुरस्कार-सम्मान प्राप्त किये. इस के अतिरिक्त बहुत सशक्त बाल-साहित्य भी लिखा. वीरेंद्र सक्सेना ने कहा कि वे प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था Authors Guild of India के संस्थापक रहे तथा आजीवन महासचिव भी, इसी नाते देश की हर भाषा के साहित्यकारों से उनके निजी स्तर पर सामीप्य रहा.

वीरेंद्र सक्सेना के बाद मैंने फोन मिलाया अशोक चक्रधर का. अशोक चक्रधर प्रायः बेहद व्यस्त रहते हैं पर राजेंद्र अवस्थी के विषय में पूछे जाने उन्होंने बहुत सहजता से इस लोकप्रिय हिंदी-सेवी के विषय में काफी बातें कहीं. उन्होंने बताया कि राजेंद्र जी से उनका परिचय लगभग चार दशक का रहा. वे (राजेन्द्र जी) पत्रिकारिता के प्राध्यापक थे और दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कक्षाएं लेने आते थे. वहीं उनकी भेंट राजेंद्र जी से हुई. एक व्यक्ति के तौर पर वे बेहद जिंदादिल इंसान थे वे. कुछ भारी मन से अशोक जी ने कहा कि अब उन की कमी भला कौन पूरी कर सकेगा? मित्रों के साथ ‘कॉफी हाउस’ या ‘टी हाउस’ में बैठ कर ठहाके लगाना उनकी फितरत थी. उनका जीने का भी अपना अंदाज़ था और बात करने का भी. अशोक चक्रधर ‘कादम्बिनी’ में अक्सर उनके कालम ‘काल चिंतन’ पढ़ कर प्रभावित रहते थे. उनका कहना था कि वे हमेशा एक संपादकीय दबदबा तो रखते थे, पर कभी किसी को दबाते नहीं थे.

राजेंद्र जी के एक अन्य करीबी साहित्यकार गंगाप्रसाद विमल ने बताया कि राजेंद्र जी प्रभावशाली साहित्यकार, पत्रकार व चिन्तक थे. उनका कॉलम ‘काल चिंतन’ जो पुस्तक रूप में भी है, बेहद सशक्त माना जाता था. उन्होंने आदिवासियों के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘जंगल के फूल’ लिखा तथा इस के अलावा ‘मछली घर’, ‘भंगी दरवाज़ा’ व आदिवासियों के जीवन पर आधारित कहानी ‘लमसेना’ जैसी यादगार कृतियाँ लिखी. उनकी कई रचनाएं चेक, रूसी व अन्य विदेशी भाषाओँ में अनुवादित हुई.

‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ से जुड़ी हिंदी की साहित्यकार अर्चना त्रिपाठी ने बताया कि राजेंद्र जी से उनका संपर्क भी लगभग 25-30 वर्ष रहा. वे उन्हें सदा Authors Guild of India की सदस्या बनने को प्रेरित करते रहे. पर अर्चना जी ने बताया कि जीवन के अंतिम वर्षों तक आते आते उन्हें स्वस्थ्य के मोर्चे पर खूब संघर्ष करना पड़ा. दुर्भाग्य से उनकी स्मरण शक्ति भी कम हो गई.. वे अमरीका के दौरे पर उनके साथ गई थी पर जब उन्होंने किसी होटल से राजेंद्र जी को सूचित किया कि वे अमुक होटल में ठहरी हैं, तब राजेंद्र जी ने उनसे पूछा कि आप अमरीका कब से आ गई है. क्षण भर को वे भूल गए थे कि अर्चना जी भारत से ही उनके साथ ही इस दौरे पर गई हैं. स्वास्थ्य की चुनौतियां उन्हें सचमुच पराजित कर पाई, इस में मुझे संदेह है. मैंने लगभग दो वर्ष पहले, एक लंबे अरसे बाद उन्हें दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर प्रगति मैदान के एक सभागार में Authors Guild of India की एक विचार गोष्ठी में देखा तो यह भले ही महसूस हुआ कि उनका शरीर अब काफी दुर्बल हो चला है. पर मंच पर खड़े हो कर जिस तरीके से वे मुस्कराते नज़र आए, उस से वही, बहुत पहले वाला handsome सा चेहरा एक बार फिर मेरी कल्पना में आ गया. शायद सक्रिय और हंसमुख लोग बुज़ुर्ग होने पर तन से ही शिथिल लगते होंगे, मन से नहीं. उस विचार गोष्ठी के समापन पर भी शायद वे थके न थे, इसलिए अचानक घोषणा हुई कि थोड़े अंतराल के बाद कवि गोष्ठी भी होगी. राजेंद्र जी मुस्कराते हुए उतने ही तत्पर लगे, हालांकि अधिकतर लोगों के पुस्तक मेले में चले जाने के कारण उपस्थिति बहुत कम रही, सो कवि गोष्ठी नहीं हो पाई, पर उनके निधन से पूर्व इस जिंदादिल साहित्यकार से वह मेरी अंतिम भेंट थी. मैंने करीब जा कर उन्हें नमस्कार किया और अपना परिचय दिया तो उसी, पुरानी आत्मीयता से वे मुस्कराए और पूछा – ‘कहो कैसे हो? कहाँ हो आजकल? मैंने बताया कि मौसम विभाग वाली नौकरी से सेवानिवृत्त हो कर अब स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. मेरे चेहरे पर अभी तक सक्रियता और उत्साह के लक्षण देख कर उनके चेहरे पर जो उत्साह-वर्धक मुस्कराहट आई, वही उनका मुझे दिया हुआ अंतिम, अनमोल तोहफा था. इस जांबाज़ साहित्यकार को मेरा सलाम!

-प्रेमचंद सहजवाला

Friday, December 25, 2009

3 इडियट्स : गांधीगीरी से इडियटगीरी तक ... आल इज वेल

प्रशेन ह. क्यावल द्वारा फिल्म समीक्षा

राजकुमार हिरानी अपने मुन्नाभाई सीरिज की फिल्मों के द्वारा दर्शकों को सकारात्मक सोच के साथ दिल जज्बा लेकर जिंदगी के मुश्किल चुनौतियों का सामना करने की सीख देते आये हैं। मुन्नाभाई सीरिज से हटकर इस बार वह लेकर आये हैं 3 इडियट्स जो चेतन भगत के सफल उपन्यास पर आधारित है।

क्या राजकुमार हिरानी तीसरी बार भी छक्का लगा पाए है... ?

कथा सारांश:

चेतन भगत की प्रसिद्ध उपन्यास से राजूने सिर्फ आधार बनाया है और उसकी जमीन पर अपनी कथा की नीव रखी है। तो कथा कुछ इस तरह है कि रांचो (आमिर खान) एक ऐसे छात्र हैं जो कॉलेज सिर्फ रटने के लिए नहीं, ज्ञान बटोरने के लिए आते हैं। इंजीनियरिंग उनका जूनून है। इसि बात को वह सब दोस्त और शिक्षकों को समझाना चाहते हैं। पर उनके दो रूममेट्स राजू रस्तोगी (शरमन जोशी) और फरहान कुरैशी (माधवन) के अलावा कोई और समझ नहीं पाता। इन तीनों में गहरी दोस्तीं हो जाती है और रांचो की सोच से दोनों में बहुत से सकारात्मक बदलाव आते हैं जो उनके जीवन को एक ठोस लक्ष्य देते हैं।

पर कॉलेज के आखरी दिन रांचो बिना बताये गायब हो जाता है। कहा जाता है रांचो.. क्या उसके 2 दोस्त उसे ढूंढ़ पाते हैं? पर इस तरह जाता ही क्यूँ है वह?

पटकथा:

उपन्यास की सशक्त जमीन पर कहानी की ठोस नीव रखकर राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी ने पटकथा का ऐसा महल खड़ा किया है, जिसकी सुन्दरता और असाधारणता के गुण कई साल गाये जायेंगे। विधु विनोद चोपड़ा ने भी सहायक के तौर पर अपने सुझाव पटकथा में दिए हैं। मुन्नाभाई जैसे 3 इडियट्स की पटकथा से भी फिल्मों के छात्र अभ्यास करेंगे।

दिग्दर्शन:

सशक्त जमीन और ठोस नीव पर खड़े अपने ताजमहल को राजूने अपने दिग्दर्शन से कुछ इस तरह निखारते हैं कि देखने वाले दंग रह जाते हैं। सकारात्मक वातावरण बरकरार रखते हुए संजीदा करने वाला उनका हुनर तो आज के पीढ़ी में सिर्फ उन्हीं के पास है। जिस तरीके से कहानी के प्रस्तुतीकरण पे उनकी पकड़ है वह सच में काबिलेतारीफ है। राजू ऐसे ही ऊँचे दर्जे की फिल्मे बनाते रहे और हमें अपनी फिल्मों की कहानी और किरदारों के जगत में समा जाने दें। हमारी हार्दिक शुभेच्छाएँ हमेशा उनके साथ हैं।

अभिनय:

आमिर जिस फिल्म में होते हैं उस फिल्म में सभी को अपना सबसे बेस्ट देना पड़ता है। और आमिर ही ऐसे कलाकार हैं जो पूरी फिल्म के परिणाम स्वरुप हरेक को अपने किरदार को पूरी तरह से प्रस्तुत करने में मदद करते हैं। ये फिल्म जितनी आमिर की है उतनी ही बाकी सबकी भी है। आमिर ने तो अपने जिंदगी में और एक ऊँचाई को छू ही लिया है पर शरमन जोशी और माधवन ने भी अपने किरदार को पूरी इमानदारी से निभाया है। ओमकर के जो नए कलाकार हैं उन्होंने चतुर के किरदार में अमिट छाप छोड़ी है। उनका भाषण सबको हँसा-हँसा कर लोट पोट कर देता है।

करीना कपूर और बोमेन इरानी ने बेहतरीन अदाकारी का प्रदर्शन किया है। मोना सिंह और जावेद जाफरी भी अपने छोटे रोले में छा गए हैं।

चित्रांकन:

मनाली से शिमला तक और फिर लद्दाख तक बेहेतरीन सिनेमाटोग्राफी भी इस फिल्म की एक जोरदार पेशकश है। फ्लैशबैक में ब्लैक एंड व्हाइट का अच्छे से इस्तेमाल किया गया है।

संगीत और पार्श्वसंगीत:

स्वानंद किरकिरे द्वारा लिखित और शांतनु मोइत्रा द्वारा संगीतबद्ध किये गए गीत आज ऊपरी पायदान पर हैं। मजेदार गीत और सुहाना संगीत 3 गानों को तो लोगों के होंठों पर रखने में कामयाब है।

संकलन:

चुस्त संकलन के कारण इतनी बड़ी होने के बावजूद फिल्म में एक में बार भी दर्शकों की नजर परदे से नहीं हटतीं। ये जितना श्रेय दिग्दर्शक को जाता है उतना ही असरदार संकलन को भी जाता है।

निर्माण की गुणवत्ता:

विधु विनोद चोपड़ा ने निर्माण की गुणवत्ता में कोई कसर नहीं छोड़ी है। उन्हें सराहा जाना चाहिए इतने सारे जिनिअस लोगों को साथ लेकर ये प्रोजेक्ट खड़ा कर के प्रस्तुत करने के लिए। ये कोई शिव धनुष उठाने से कम बड़ा काम नहीं था। और उन्होंने ये काम बखूबी निभाया है।

लेखा-जोखा:

*** (4.5 तारे)

हिंदी चित्रपट जगत में जिन फिल्मों के नाम आदर से लिए जायेंगे उनमें राजकुमार हिरानी की ये फिल्म भी जरूर रहेगी। अपनी संजीदा सोच को सर्वसामान्य दर्शकों की पसंद को मद्देनजर रखकर पेश करना उन्हें खूब आता है। तो आप किस चीज की राह देख रहे है? उठिए, दौड़िए, पूरे मोहल्ले के साथ ये फिल्म देखने जाइये। जनाब! ऐसी फिल्में बार-बार नहीं बनती हैं।

चित्रपट समीक्षक:- प्रशेन ह.क्यावल