Thursday, December 31, 2009

राजेन्द्र अवस्थी – एक जाँबाज़ साहित्यकार


मध्य प्रदेश के गढा जबलपुर में 25 जनवरी, 1930 को जन्मे श्री राजेन्द्र अवस्थी नवभारत, सारिका, नंदन, साप्ताहिक हिन्दुस्तान और कादम्बिनी के संपादक रहे। उन्होंने कई चर्चित उपन्यासों, कहानियों एवं कविताओं की रचना की। वह ऑथर गिल्ड आफ इंडिया के अध्यक्ष भी रहे। दिल्ली सरकार की हिन्दी अकादमी ने उन्हें 1997-98 में साहित्यिक कृति से सम्मानित किया था। 30 दिसम्बर की सुबह लगभग 9:30 बजे दिल्ली के एस्कार्ट हॉस्पिटल में राजेन्द्र अवस्थी का देहांत हो गया।

उनके उपन्यासों में सूरज किरण की छांव, जंगल के फूल, जाने कितनी आंखें, बीमार शहर, अकेली आवाज और मछलीबाजार शामिल हैं। मकड़ी के जाले, दो जोड़ी आंखें, मेरी प्रिय कहानियां और उतरते ज्वार की सीपियां, एक औरत से इंटरव्यू और दोस्तों की दुनिया उनके कविता संग्रह हैं जबकि उन्होंने ‘जंगल से शहर तक’ नाम से यात्रा वृतांत भी लिखा है।
घर में कम्बल ओढ़ कर दूरदर्शन पर पूरे उत्तरी भारत में शीत लहर के दृश्य देखते देखते और खबरें सुनते सुनते अचानक पर्दे पर नीचे कहीं लिखित समाचारों में एक दुखद समाचार. मन एक सदमे की चपेट में आ जाता है. राजेंद्र अवस्थी नहीं रहे. सारिका, नंदन, कादम्बिनी और ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ जैसी पत्रिकाओं के लोकप्रिय संपादक राजेंद्र अवस्थी के जाने की खबर मन स्वीकार नहीं कर पा रहा था. स्मृति बहुत पीछे, सन 87 के आसपास चली जाती है. हिंदी के एक अन्य सशक्त हस्ताक्षर स्व. मणि मधुकर मेरे परम मित्र थे और वे अचानक फोन करते हैं कि तुम्हारी कहानी ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी है. हमेशा की तरह मुझे प्रसन्नता तो होती है लेकिन मैं मधुकर जी से कहता हूँ कि राजेंद्र अवस्थी के संपादन काल में साप्ताहिक में छपी यह मेरी पहली कहानी है. मधुकर कहते हैं कि आज शाम को आना मेरे यहाँ, तुम्हें सीधे राजेंद्र अवस्थी के पास ले जाऊंगा. मैंने भी उन से यही कहा कि दिल्ली की सभी गण-मान्य साहित्यिक हस्तियों से मैं मिल चुका हूँ, पर राजेंद्र अवस्थी को कुछ कार्यक्रमों में देख कर भी बढ़ कर उन से परिचय लेने में संकोच सा हुआ है. मधुकर पूछते हैं – ‘ऐसा क्यों? आप तो उत्साही व्यक्ति हैं, सब से मिल लेते हैं’. मैं उन्हें दिल की बात बताता हूँ कि राजेंद्र जी देखने में मुझे कुछ आला शख्सियत से लगते हैं, सो यह संकोच. फिर मैंने उन्हें बताया कि शीला गुजराल की संस्था ‘लेखिका’ के एक कार्यक्रम में दिल्ली और बाहर के तमाम बड़े बड़े साहितयकर आए थे, उनमें अमृता प्रीतम भी थी, जैनेन्द्र भी. अमृता के भाषण के बाद मैंने देखा कि जो साहित्यकार माइक पर आए, वे हैं राजेंद्र अवस्थी. खासे handsome हैं. बहुत प्रभावशाली तरीके से बात करते हैं. बल्कि उनसे पहले अमृता प्रीतम ने महिलाओं के प्रति खासी सहानुभूति जताई थी कि महिलाऐं लेखक बनना चाहें तो समाज उस में रोड़े अटकाता है. उन्होंने जापान और अन्य देशों की कुछ उभरती लेखिकाओं की आत्महत्याओं का ज़िक्र किया. तब राजेंद्र अवस्थी ने बड़े हंसमुख और चुटीले तरीके से अमृता जी की बात पर चुटकी भी ली कि अमृता जी ने तो हमारे सामने आत्महत्याओं की एक अच्छी भली Directory भी रख दी. मुझे लगा कि बात को हंसमुख तरीके से कहना हो तो कोई उन से सीखे, क्यों कि अमृता जी द्वारा बताए दुखद प्रसंगों से जहाँ एक और वातावरण बोझिल सा हो उठा, वहीं राजेंद्र जी ने सब को हंसा कर मन को हल्का भी कर दिया. खूब handsome और प्रभावशाली हैं वे. मेरा संकोची मन आगे बढ़ कर उन्हें अपना परिचय नहीं दे पाता.

शाम को इसीलिए तैयार हो कर मधुकर जी के घर चला जाता हूँ, इसी उत्साह के साथ कि वे मुझे राजेंद्र जी से मिलवाएंगे. मैं उन्हें बताऊंगा कि मैंने आप का उपन्यास ‘सूरज किरण की छांव में पढ़ा है...’. मधुकर जी परिवार समेत अपनी कार में मुझे भी ले चलते हैं. चीनी दूतावास में एक पार्टी है. वो रहे राजेंद्र जी. एक सोफे पर बड़े हलके मन हो बैठे हैं. मधुकर जी मेरा हाथ खींच कर ठीक उनके सामने खड़ा कर देते हैं – ‘ये हैं आप के कहानीकार, प्रेमचंद सहजवाला. कहते हैं, सीधे बात करने में संकोच हो रहा है, वह भी आप से’! राजेंद्र जी मुस्कराते हैं. उन की मुस्कराहट में एक अजब प्रोत्साहन सा है. पर वे कहते हैं- ‘मैं ने आप की कहानियां ‘कहानी’ में भी पढ़ी हैं और ‘सारिका’ ‘धर्मयुग’ में भी. पर जो कहानी आपने मुझे भेजी और आज छपी है, वह उन दूसरी कहानियों की तुलना में पीछे लगी. और बेहतर लिख सकते थे’. मुझे अचरज भी है और अविश्वास भी कि इन्होने क्या मेरी कहानियां पढ़ी होंगी? पर अचरज इस बात पर भी कि ये झूठा प्रोत्साहन नहीं दे रहे. जैसा इन्हें लग रहा है, वैसे कह रहे हैं. मैं संकुचित सा उन्हें कहता हूँ – ‘संभवतः इस कहानी में मैं इतनी जान नहीं डाल सका, जितनी डालने चाहिए थी’. पर राजेंद्र जी कह रहे हैं – ‘आप की कहानी अगर कमज़ोर होती, तो क्या मैं उसे छापता? वह छापने योग्य थी. पर मुझे लगा कि उस पर आप और मेहनत कर सकते थे’. मैं प्रभावित था, इतना बेबाक मार्ग दर्शन, क्या कोई संपादक इतना ध्यान अपने कहानीकारों पर् दे सकता है?...

...और आज उनके निधन की खबर पर अचानक वही, बरसों पुराना चेहरा सामने आ गया. चंद श्रद्धांजलि भरे शब्द लिखने बैठा तो कई साहित्यकार मित्रों से फोन पर पूछने लगा- ‘उन के बारे में क्या कहना है आप को? ‘जंगल के फूल’ जैसे सशक्त उपन्यासकार के बारे में आप के क्या अनुभव हैं’? तब लक्ष्मीशंकर बाजपेयी अल्मोड़ा की किसी लेखिका दिवा भट्ट का सन्दर्भ देते हैं. वे कहते हैं कि एक बार जब वे अल्मोड़ा गए तो किसी प्राध्यापिका दिवा भट्ट ने उन्हें अपनी कहानी पढ़ कर सुनाई. बाजपेयी जी को कहानी अच्छी लगी. उन्होंने दिवा जी को सुझाव दिया कि वे वह कहानी राजेंद्र अवस्थी जी के पास, ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशनार्थ भेज दें. दिवा जी भी संकुचित थी – ‘क्या ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ वाले मेरी कहानी छाप देंगे’? बाजपेयी साहस बढ़ाते हैं – ‘ अच्छी लगेगी तो क्यों नहीं छापेंगे? भेज कर देखो’. और दिवा जी वह कहानी छप जाती हैं. बाजपेयी जी का कहना है कि किसी भी नए से नए लेखक की कहानी में अगर दम है, तो अवस्थी जी उसे कभी उपेक्षित नहीं करते थे. राजेंद्र जी से लगभग दो दशक के परिचय के आधार पर बाजपेयी जी का कहना है कि वे बहुत ही सुलझे हुए और खुशहाल सी तबियत वाले व्यक्ति थे.

"वे हमेशा एक संपादकीय दबदबा तो रखते थे, पर कभी किसी को दबाते नहीं थे"
--अशोक चक्रधर
हिंदी के प्रसिद्ध कवि कथाकार डॉ. वीरेंद्र सक्सेना ने फोन पर बताया कि राजेंद्र जी के साथ उन्होंने कई यात्राएं की व कई कार्यक्रमों में उन के साथ गए. राजेंद्र जी मित्रों के प्रति सच्चा स्नेह रखते थे और खुद उन के निवास पर भी कई बार उनके जन्म दिवस या अन्य अवसरों पर गए . राहुल सांकृत्यायन की जन्मशताब्दी के अवसर पर भी वे देहरादून उनके साथ गए. जनवरी 1930 में मध्यप्रदेश में जन्मे राजेंद्र अवस्थी ने कई कहानियां, उपन्यास व यात्रा-वृतांत लिखे व अनेकों पुरस्कार-सम्मान प्राप्त किये. इस के अतिरिक्त बहुत सशक्त बाल-साहित्य भी लिखा. वीरेंद्र सक्सेना ने कहा कि वे प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था Authors Guild of India के संस्थापक रहे तथा आजीवन महासचिव भी, इसी नाते देश की हर भाषा के साहित्यकारों से उनके निजी स्तर पर सामीप्य रहा.

वीरेंद्र सक्सेना के बाद मैंने फोन मिलाया अशोक चक्रधर का. अशोक चक्रधर प्रायः बेहद व्यस्त रहते हैं पर राजेंद्र अवस्थी के विषय में पूछे जाने उन्होंने बहुत सहजता से इस लोकप्रिय हिंदी-सेवी के विषय में काफी बातें कहीं. उन्होंने बताया कि राजेंद्र जी से उनका परिचय लगभग चार दशक का रहा. वे (राजेन्द्र जी) पत्रिकारिता के प्राध्यापक थे और दिल्ली विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की कक्षाएं लेने आते थे. वहीं उनकी भेंट राजेंद्र जी से हुई. एक व्यक्ति के तौर पर वे बेहद जिंदादिल इंसान थे वे. कुछ भारी मन से अशोक जी ने कहा कि अब उन की कमी भला कौन पूरी कर सकेगा? मित्रों के साथ ‘कॉफी हाउस’ या ‘टी हाउस’ में बैठ कर ठहाके लगाना उनकी फितरत थी. उनका जीने का भी अपना अंदाज़ था और बात करने का भी. अशोक चक्रधर ‘कादम्बिनी’ में अक्सर उनके कालम ‘काल चिंतन’ पढ़ कर प्रभावित रहते थे. उनका कहना था कि वे हमेशा एक संपादकीय दबदबा तो रखते थे, पर कभी किसी को दबाते नहीं थे.

राजेंद्र जी के एक अन्य करीबी साहित्यकार गंगाप्रसाद विमल ने बताया कि राजेंद्र जी प्रभावशाली साहित्यकार, पत्रकार व चिन्तक थे. उनका कॉलम ‘काल चिंतन’ जो पुस्तक रूप में भी है, बेहद सशक्त माना जाता था. उन्होंने आदिवासियों के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘जंगल के फूल’ लिखा तथा इस के अलावा ‘मछली घर’, ‘भंगी दरवाज़ा’ व आदिवासियों के जीवन पर आधारित कहानी ‘लमसेना’ जैसी यादगार कृतियाँ लिखी. उनकी कई रचनाएं चेक, रूसी व अन्य विदेशी भाषाओँ में अनुवादित हुई.

‘केंद्रीय हिंदी निदेशालय’ से जुड़ी हिंदी की साहित्यकार अर्चना त्रिपाठी ने बताया कि राजेंद्र जी से उनका संपर्क भी लगभग 25-30 वर्ष रहा. वे उन्हें सदा Authors Guild of India की सदस्या बनने को प्रेरित करते रहे. पर अर्चना जी ने बताया कि जीवन के अंतिम वर्षों तक आते आते उन्हें स्वस्थ्य के मोर्चे पर खूब संघर्ष करना पड़ा. दुर्भाग्य से उनकी स्मरण शक्ति भी कम हो गई.. वे अमरीका के दौरे पर उनके साथ गई थी पर जब उन्होंने किसी होटल से राजेंद्र जी को सूचित किया कि वे अमुक होटल में ठहरी हैं, तब राजेंद्र जी ने उनसे पूछा कि आप अमरीका कब से आ गई है. क्षण भर को वे भूल गए थे कि अर्चना जी भारत से ही उनके साथ ही इस दौरे पर गई हैं. स्वास्थ्य की चुनौतियां उन्हें सचमुच पराजित कर पाई, इस में मुझे संदेह है. मैंने लगभग दो वर्ष पहले, एक लंबे अरसे बाद उन्हें दिल्ली पुस्तक मेले के अवसर पर प्रगति मैदान के एक सभागार में Authors Guild of India की एक विचार गोष्ठी में देखा तो यह भले ही महसूस हुआ कि उनका शरीर अब काफी दुर्बल हो चला है. पर मंच पर खड़े हो कर जिस तरीके से वे मुस्कराते नज़र आए, उस से वही, बहुत पहले वाला handsome सा चेहरा एक बार फिर मेरी कल्पना में आ गया. शायद सक्रिय और हंसमुख लोग बुज़ुर्ग होने पर तन से ही शिथिल लगते होंगे, मन से नहीं. उस विचार गोष्ठी के समापन पर भी शायद वे थके न थे, इसलिए अचानक घोषणा हुई कि थोड़े अंतराल के बाद कवि गोष्ठी भी होगी. राजेंद्र जी मुस्कराते हुए उतने ही तत्पर लगे, हालांकि अधिकतर लोगों के पुस्तक मेले में चले जाने के कारण उपस्थिति बहुत कम रही, सो कवि गोष्ठी नहीं हो पाई, पर उनके निधन से पूर्व इस जिंदादिल साहित्यकार से वह मेरी अंतिम भेंट थी. मैंने करीब जा कर उन्हें नमस्कार किया और अपना परिचय दिया तो उसी, पुरानी आत्मीयता से वे मुस्कराए और पूछा – ‘कहो कैसे हो? कहाँ हो आजकल? मैंने बताया कि मौसम विभाग वाली नौकरी से सेवानिवृत्त हो कर अब स्वतंत्र लेखन कर रहा हूँ. मेरे चेहरे पर अभी तक सक्रियता और उत्साह के लक्षण देख कर उनके चेहरे पर जो उत्साह-वर्धक मुस्कराहट आई, वही उनका मुझे दिया हुआ अंतिम, अनमोल तोहफा था. इस जांबाज़ साहित्यकार को मेरा सलाम!

-प्रेमचंद सहजवाला

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2 बैठकबाजों का कहना है :

Manju Gupta का कहना है कि -

युग दृष्टा साहित्य जगत के वरिष्ठ -जाँबाज साहित्यकार राजेन्द्र अवस्थी जी को हमारी हार्दिक श्रधांजलि अर्पित है .
मंजू गुप्ता ,वाशी ,नवी मुंबई .

sumita का कहना है कि -

वरिष्ठ साहित्यकार राजेन्द्र अवस्थी जी को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि!

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