Wednesday, March 04, 2009

हिन्दी ब्लॉगों की संख्या यूँ ही बढ़ती रहेगी

२२ फरवरी २००९ की ब्लॉगर-मीट का निष्कर्ष

वैसे जब कहीं भी और कभी भी २-४ ब्लॉगर मिलते हैं, हम उसे ब्लॉगर-मीट की ही संज्ञा देते रहे हैं। इस तरह से तो कम से कम १० ब्लॉगर मीट रोज़ाना होती होंगी। ज़रा सोचिए जिस परिवार का १ से अधिक सदस्य ब्लॉगर हों, वहाँ क्या हालत होती होगी। लेकिन २२ फरवरी २००९ को राँची में हुआ हिन्दी चिट्ठाकारों का सम्मेलन कई मायनों में एक औपचारिक और बड़ा आयोजन था।

बहुत सी रपटों में आपने पढ़ा कि इस आयोजन को लेकर जो-जो योजनाएँ बनाई गई थीं, वो सभी पूरी नहीं हो पाईं, फिर भी हिन्दी का इंटरनेट पर मिजाज समझने का अवसर ज़रूर मिल गया। अमिताभ मीत के साथ मिलकर जब मैं इस आयोजन की रूपरेखा खींच रहा था तब मैंने मात्र कोलकाता से हजारीबाग की भौगोलिक सीमाओं में रहने वाले ब्लॉगरों को पकड़ने का निश्चय किया था। हमें यह डर था कि दूरी अधिक होने से शायद लोग कम रुचि लेंगे। ईमेल/फोन से संपर्क स्थापित करने के तुरंत बाद कम से कम हमारा अंदाज़ा ठीक ही सिद्ध हो रहा था। लेकिन जब कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल, राँची की निदेशक भारती कश्यप ने आयोजन के खर्च का भार उठाने की बात की और इसे ब्लॉगरों ने सुना तब रेस्पॉन्स अच्छे मिलने लगे।

मनीष कुमार ने फोन पर कहा भी कि हमें वाराणसी (यह शहर भी राँची के क़रीब है) और बिहार के भी ब्लॉगरों को बुलाना चाहिए। जैसे लवली कुमारी के माध्यम से वाराणसी से अभिषेक मिश्र कार्यक्रम में भाग लेने के लिए आ सकते हैं, उसी तरह से वहाँ के अन्य ब्लॉगर भी आ सकते हैं। जब कोलकाता तक से कुछ ब्लॉगर (शिवकुमार मिश्रा और अमिताभ मीत) राँची आने की बात सोच सकते हैं, फिर पटना, दरभंगा से क्यों नहीं। आखिर यह भी वन नाइट जर्नी ही तो है। फिर मुझे भी ऐसा लगा कि इस पर पहले से काम किया गया होता तो यह जमावाड़ा और विराट हो सकता था।

जुलाई २००७ से मैंने टेलीफोन के द्वारा कम्प्यूटर पर 'यूनिकोड (हिन्दी) का इस्तेमाल और ब्लॉग बनाने की विधि' के संदर्भ में लोगों की मदद करनी शुरू की थी (यूनिप्रशिक्षण)। बाद में सार्वजनिक रूप से क्लॉसरूमों में पहुँचा। उस समय से लेकर अब तक इतनी ही कोशिश रही कि सामने वाला हिन्दी और ब्लॉगिंग से जुड़ जाये, आगे वह अपने रास्ते और ब्लॉग का चरित्र खुद बना लेगा। मैंने भी यही मानकर किसी भी सामान्य मुलाक़ात में ब्लॉग के अनुप्रयोग के बड़े फलक की बात नहीं की।

लेकिन हाँ, जहाँ-जहाँ मैंने पत्रकारिता के विद्यार्थियों को इसके बारे में बताया, वहाँ खूब बताया। इसका जितना और जिस तरह का इस्तेमाल मैंने किया, वह भी और बाकी दुनिया में जहाँ-जहाँ जितने बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल हो रहा है, वह भी। और मुझे खुशी है सबसे अधिक उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ भी मुझे झारखण्ड से ही मिलीं। १४ फरवरी २००९ को करीम सिटी कॉलेज, जमशेदपुर के पत्रकारिता के बच्चों की ब्लॉगिंग पर कक्षा लेने का अवसर मिला। एक तो वैलेन्टाइन डे का दिन, फिर भी शत-प्रतिशत उपस्थिति ने मुझे गदगद किया और कक्षा के दौरान उनकी प्रतिक्रियाओं ने भी।

पर इससे उलट प्रतिक्रिया पत्रकार बन चुके ब्लॉगरों में देखने को मिली। २२ फरवरी की मुलाकात में अधिकतम पत्रकार और पत्रकार-ब्लॉगरों को ब्लॉगिंग मात्र आलेख जमा करने का बक्सा नज़र आई। इस सम्मेलन में भी सेंट जेवियर्स कॉलेज के पत्रकारिता के एक विद्यार्थी ने इस विधा को अच्छे तरह से समझने की इच्छा जताई और व्यक्तिगत रूप से मुझे मिला और कहा कि सर हमारे यहाँ भी कक्षा लीजिए। वहीं मुझे एक HRD के इंजीनियर अरूण चक्रवर्ती भी मिलें जिन्होंने अपने ज्योतिष ज्ञान सम्बंधी कार्य को ब्लॉगिंग से कैसे प्रचारित-प्रसारित कर पायें?-इसपर मेरे विचार जानना चाहे। मुझे अगले दिन भी राँची में रुकना था। ज्योतिषी-इंजीनियर अरूण को ब्लॉगिंग ने इतना प्रभावित किया कि अगले दिन उन्होंने फोन करके मुझसे समय माँगा, मुझे अपने घर ले गये और ब्लॉग बनवाया, बहुत से सवाल किये।

ब्लॉगिंग से कमाई की बात टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार संजीव शेखर ने जाननी चाही। मैंने यही कहा कि हिन्दी के ९९% से अधिक ब्लॉग अभी इसपर न ही सोंचे क्योंकि उनके ब्लॉग का ट्रैफिक इतना भी नहीं है कि भारतीय विज्ञापन नेटवर्कों के विज्ञापन से रु १००० प्रतिवर्ष भी कमा पायें (क्योंकि गूगल हिन्दी कंटेंट को विज्ञापन नहीं दे रहा)। मैंने उनसे ज़रूर कहा कि हिन्दी के कमाने वाले ब्लॉगों की संख्या एक आदमी के हाथों की उँगलियों से भी कम हैं। मैंने हिन्द-युग्म की विज्ञापन की कुल कमाई का लेखा-जोखा भी उन्हें दिया।

यह बात ग़ौर करने वाली है कि हिन्दी ब्लॉगिंग की शुरूआत से (यानी की अक्टूबर २००२ से) लेकर अब तक प्रत्येक ब्लॉगर अपने ब्लॉग में मात्र निवेश कर रहा है, वह चाहे धन के रूप में हो या समय के रूप में या फिर दोनों रूपों में। यह स्थिति चिंताजनक है और जैसाकि वरिष्ठ ब्लॉगर देबाशीष चक्रवर्ती ने अपने साक्षात्कार में यह कहा था कि आने वाले पाँच वर्षों में हिन्दी ब्लॉगिंग से कमाई की गुँजाइश नहीं है, वैसे में हिन्दी में प्रोफैशनल ब्लॉगरों की संख्या खूब बढ़ेगी यह कहना मुश्किल है। हाँ यह ज़रूर कहा जा सकता है कि जिस तरह से ब्लॉगों की संख्या पिछले २ वर्षों में बढ़ी है, उसकी वृद्धि दर में लगातार वृद्धि होगी।

मैं आने वाले समय में छोटे और बड़े शहरों में ब्लॉगिंग पर ऐसे आयोजन करने के बारे में विचार कर रहा हूँ जिसमें ब्लॉगर के साथ-साथ नॉन-ब्लॉगर की संख्या भी अच्छी खासी हो।

क्या आप सुन पाए संसद में सिसकी....

चौदहवीं लोक सभा की उम्र पूरी हो चुकी थी। शोक सभा में स्पीकर सोमनाथ चटर्जी, लालकृष्ण आडवाणी आदि नेता अपना-अपना वक्तव्य रख चुके थे। निर्णय हुआ कि लाश को अभी श्मशान तक न ले जाया जाए। जब पंद्रहवीं लोक सभा का जन्म हो जाए, तब क्रिया-कर्म की रस्म पूरी हो। उसके पहले अंतिम संस्कार कर दिया गया, तो बीच की अवधि में लोक सभा की आत्मा कहां-कहां भटकती फिरेगी? वैसे, कुछ लोगों का मत है कि लोक सभा की आत्मा तो पहले ही कूच कर चुकी है। अब हम उसका शरीर ढो रहे हैं। मैं इस बात से सहमत नहीं हूं। जब शरीर है, तो आत्मा भी होगी ही। इसलिए पता लगाने की चीज यह है कि लोक सभा की असली आत्मा के कूच करने के बाद जिस आत्मा ने लोक सभा पर कब्जा कर लिया है, वह कैसी है, कहां की है और क्या करने पर वह अपने मूल क्षेत्र में जा बैठेगी। मैं प्रस्ताव करता हूं कि यह पता लगाने के लिए तुरंत एक राष्ट्रीय आयोग गठित किया जाए, जिसमें संसद का एक भी सदस्य न हो।

लोक सभा के सभी ऑनरेबल सदस्य बाहर निकल आए, तो गार्ड सदन के दरवाजे बंद करने के लिए लपका। बाकी सारे दरवाजों पर वह ताला लगा चुका था। जब वह आखिरी दरवाजे पर ताला लगाने जा रहा था, तभी उसे किसी लड़की की सिसकी सुनाई पड़ी। गॉर्ड भौंचक रह गया। सिसकी की आवाज दीवार के एक कोने से आ रही थी। गॉर्ड थोड़ा डर भी गया -- कहीं भूत-प्रेत का मामला तो नहीं है? फिर धीरे-धीरे उस तरफ बढ़ा जिधर से सिसकी की आवाज आ रही थी। दूर ही से टॉर्च की रोशनी उधर फेंकी, तो देखा, सोलह-सत्तरह साल की एक लड़की बार-बार अपना माथा पीट रही थी और रो रही थी। उसका सिर सामने की ओर झुका हुआ था। उसके आंसू के कण फर्श पर बिखरे हुए थे।

गॉर्ड तीस साल से लोक सभा में नौकरी कर रहा था। कई लोक सभाओं के ताले खोल और बंद कर चुका था। इसके पहले उसने ऐसा दृश्य कभी नहीं देखा था। उसकी समझ जवाब दे रही थी। कौतूहल, जिज्ञासा और भय से वह आगे बढ़ा और दीवार पर लगे एक स्विच को ऑन कर दिया। एक ट्यूब लाइट जल उठा। उसकी रोशनी में उसने उस दुखिनी बाला का भरपूर जायजा लिया। वह कोई युवा प्रेतनी नहीं, हाड़-मांस की जिन्दा लड़की थी। उसकी शक्ल गॉर्ड की मझली बेटी से मिलती-जुलती थी। गॉर्ड का दिल सहानुभूति से भर आया।

गॉर्ड रोती हुई लड़की के नजदीक गया। उसने बहुत ही मुलायम स्वर में पूछा, 'क्या बात है बेटी, क्यों रो रही हो?'

ऐसा लगा मानो लड़की ने कुछ सुना ही न हो। उसकी सिसकी जारी रही।

गॉर्ड थोड़ा और नजदीक गया। उसने अपना प्रश्न दुहराया। लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। विचलित गॉर्ड ने लड़की के माथे पर हाथ रख कर उसे उठाने की कोशिश की। लड़की ने प्रतिरोध किया। गॉर्ड ने अपना सवाल फिर दुहराया। लड़की का रोना और तेज हो गया। गॉर्ड की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। लड़की को इस तरह अकेली छोड़ कर वह लोक सभा का आखिरी दरवाजा बंद नहीं कर सकता था। उसने एक बार फिर कोशिश की, 'बताओ न बेटी, आखिर बात क्या है? हो सकता है, मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं। मुझे अपने पिता की तरह समझो। मेरी एक बेटी तुम्हारी ही उम्र की है।'

लड़की ने सिर झुकाए हुए ही कहा, 'स्पीकर साहब, अब आप क्या, कोई भी मेरी मदद नहीं कर सकता। इस लोक सभा की आखिरी बैठक हो चुकी है।' गॉर्ड ने उसकी गलतफहमी दूर की, 'बेटी, मैं स्पीकर नहीं हूं। वे तो जा चुके हैं। मैं यहां का गॉर्ड हूं। तुम बिना संकोच के अपना दुख मुझसे कह सकती हो।'

लड़की ने सिसकी रोक कर अपना सिर थोड़ा-सा उठाया। बोली, 'मेरा दुख सभी जानते हैं। फिर भी कोई कुछ नहीं करता। लगता है, यहां से मेरी अरथी ही निकलेगी।'

गॉर्ड का सिर चकराने लगा था। उसने जानना चाहा, 'लेकिन तुम सदन में घुसी कैसे? यहां तो कोई भी गैर-मेंबर प्रवेश नहीं कर सकता। इसके लिए पास जारी कराना पड़ता है।'

लड़की ने जवाब दिया, 'बाबा, मेरा तो जन्म ही इस सदन में हुआ है। यहीं पड़े-पड़े मेरी उम्र बढ़ रही है। इंतजार करते-करते दस साल से ज्यादा हो गया। लोक सभा शुरू होती है, तो सब कहते हैं, इस बार तुम्हारा निपटारा कर देंगे। पांच वर्ष तक मैं आंख उठाए स्पीकर और दूसरे मेम्बरान की ओर देखती रहती हूं। सत्र पूरा हो जाता है और मेरा कुछ नहीं होता। अकेले बैठ कर सिसकती रहती हूं। वे मुझे मारते भी नहीं और जीने भी नहीं देते। हमेशा अधमरी हालत में छोड़ देते हैं।'

गॉर्ड ने आश्चर्य से पूछा, 'लेकिन बेटी, तुम हो कौन? तुम्हारा नाम क्या है?'

लड़की ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, 'बाबा, मुझ अभागन को सब जानते हैं। मेरा नाम है महिला आरक्षण विधेयक।'

अब गॉर्ड की समझ में सब कुछ आ गया। उसने हाथ पकड़ कर लड़की को उठाते हुए कहा, 'बेटी, उठो, मेरे घर चलो। यहां रोने से कुछ हासिल होनेवाला नहीं है।'

लड़की ने शांत स्वर में उत्तर दिया, 'बाबा, रात हो रही है। तुम घर जाओ। मैं तो यहीं रहूंगी। या तो मेरा मनोरथ पूरा होगा या यहां से मेरी लाश निकलेगी।'

राजकिशोर

Tuesday, March 03, 2009

बूँद भर सफलता, सागर भर खुशी...

ऑस्करों की खुशी से देश दीवाना है, तो यह उचित ही है। इनमें से कई हमारे नहीं हैं। हमारे असली ऑस्कर वे हैं जो संगीत के लिए दिए गए हैं। इसके बावजूद यह कम गर्व की बात नहीं है कि दूसरी बार किसी भारतीय प्रतिभा को अंतरराष्ट्रीय फिल्म सम्मान मिला है। पहला ऑस्कर एक भारतीय को शेखर कपूर की फिल्म 'एलिजाबेथ' में कॉस्ट्यूम के लिए मिला था। इस बार संगीत के लिए तीन ऑस्कर सम्मान मिले हैं। इसके नशे में देश झूम रहा है। यह और बात है कि फिल्म 'स्लमडॉग मिलियनर' को ले कर तरह-तरह के विवाद खड़े हो गए हैं। इस विवाद में कुछ दम भी है। फिर भी ए.आर. रहमान का सम्मान भारत की प्रतिभा का सम्मान है और इससे हम सभी गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं, तो इसमें कुछ भी बेजा नहीं है। सब कुछ के बावजूद सम्मान सम्मान है।
खुशी की यह दीवानगी पहली बार नहीं देखी जा रही है। क्रिकेट में जब भारत की टीम ने विश्व कप जीता था, तब भी ऐसी दीवानगी दिखाई पड़ी थी। कपिल देव राष्ट्रीय हीरो बन गए थे। क्रिकेट का विश्व कप जीतने पर और ज्यादा दीवानगी दिखाई पड़ी, क्योंकि क्रिकेट हमारे देश के मध्य वर्ग को कुछ ज्यादा ही भाता है। गर्व की ऐसी ही लहर तब भी उठी थी, जब सुष्मिता सेन और ऐश्वर्या राय के सौंदर्य को विश्व स्तर की मान्यता मिली थी। अर्मत्य सेन को जब नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया, तो भारत का कद अचानक फिर बढ़ गया। जब 'फॉर्ब्स' पत्रिका द्वारा दुनिया के अमीरतम व्यक्तियों की सूची प्रकाशित की जाती है, तो उसमें भारतीयों की संख्या पढ़ कर हमें कुछ खुशी तो होती ही है। भारतीय सिर्फ साहित्य, खेल, सौंदर्य और अर्थशास्त्र की विद्वत्ता में आगे नहीं हैं, बल्कि दौलत कमाने में भी पीछे नहीं है, यह जान कर अच्छा लगना कहीं से भी अस्वाभाविक नहीं है।
इसके साथ ही, क्या यह भी विचारणीय नहीं है कि जो है, उसकी रोशनी में जो नहीं है, उसका गम और गाढ़ा हो जाता है? बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि जो नहीं है, उसकी मात्रा इतनी ज्यादा और इतनी दुखदायी है कि जो थोड़ा-बहुत मिल जाता है, उस पर हम झूमने लगते हैं। दुनिया के भ्रष्टतम देशों की सूची छपती है, तो उसमें भारत का स्थान काफी ऊपर होता है। मानव विकास की कसौटी पर सभी देशों के हालात की जांच की जाती है, तो यही भारत बहुत नीचे चला जाता है। शिक्षा में, साक्षरता में, स्वास्थ्य सुविधाओं में, पौष्टिकता में, बाल मृत्यु दर में, स्त्रियों की सामाजिक हैसियत में, स्त्री विरोधी आचरण में, मानव अधिकारों के सम्मान में -- कौन-सा क्षेत्र ऐसा है, जहां हम सिर ऊंचा कर खड़े हो सकते हैं? कुल मिला कर स्थिति यह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति को देखते हुए हमें कई बार भारतीय होने में शर्म आने लगती है।
यह सच है कि दक्षिण एशिया में भारत का कद उसके आकार और उसकी आबादी के अनुरूप ही ऊंचा है। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश एक साथ ही आजाद हुए थे -- तब वे एक ही देश थे। इन तीनों टुकड़ों में भारत ही राजनीतिक और आर्थिक रूप से स्थिर रहा है और जीवन के सभी क्षेत्रों में कुछ न कुछ प्रगति की है। लोकतंत्र भी यहां कमोबेश अक्षुण्ण रहा है। इस तरह भारत उपमहादेश में भारत हर तरह से अग्रणी है। दक्षिण एशिया के पूरे संदर्भ में हम दावा कर सकते हैं कि श्रीलंका, नेपाल, भूटान आदि की तुलना में हमारा रिकॉर्ड प्रशंसनीय रहा है।
लेकिन एशिया के स्तर पर ? इसी एशिया में चीन है, जापान है, कोरिया है तथा अन्य कई देश हैं जिन्होंने प्रगति की दिशा में शानदार रिकॉर्ड बनाए हैं। यहां तक कि कुछ मामलों में श्रीलंका भी हमसे आगे है। सवाल यह है कि हम अपने विकास की तुलना सिर्फ दक्षिण एशिया के परिदृश्य से क्यों करें, वरन पूरे एशियाई संदर्भ में क्यों न करें ? और एशिया में क्या रखा है? जब तुलना ही करनी है, तो विश्व स्तर पर अपनी तुलना क्यों न करें? भारत के लोग अपने को इतना हीन क्यों मानें कि दुनिया के विकसिततम देशों से प्रतिद्वंद्विता करने की सोच ही न सकें?
शुरू में हमने जिन उदाहरणों का हवाला दिया है, उनसे पता चलता है कि व्यक्तिगत स्तर पर भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान और कला का कोई ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसमें कोई न कोई भारतीय सितारा न जगमगा रहा हो। लेकिन ये सभी क्षेत्र ऐसे हैं, जहां व्यक्तिगत प्रतिभा और साधना से खास-खास व्यक्तियों ने शिखर की ऊंचाई छू ली है। हुसैन और ए.आर. रहमान बनने में परिस्थितियों का योगदान अवश्य है, पर मुख्य योगदान इन कलाकारों का अपना ही है। ध्यान देने की बात यह भी है कि इन दोनों कलाकारों का बचपन अत्यंत प्रतिकूल परिस्थितियों में बीता था, लेकिन इन्होंने लगातार तपस्या कर अपने को बनाया और नाम हासिल किया। हम फेल वहां होते हैं, जहां सामाजिक नियोजन और सामूहिक कर्म की चुनौती आती है। तो क्या हमारी सामाजिक दृष्टि और सामाजिकता में कोई भारी कमी है जिसकी वजह से हम समूह के तौर पर उल्लेखनीय विकास नहीं कर पा रहे हैं? व्यक्ति के स्तर पर उत्कर्ष हासिल करना हमारे लिए आसान रहता है, पर राष्ट्र के स्तर पर विकास करने में हम अपने महादेश एशिया के ही अनेक देशों से पिछड़ जाते हैं। इस सवाल पर गहराई से विचार नहीं किया गया और हमने अपनी आदतें नहीं बदलीं, तो हमारे चमकते हुए सितारों की छवि भी धूमिल होने को बाध्य है।
इसके अलावा, सामूहिक विकास का संबंध व्यक्तिगत विकास से भी है। इतने बड़े फिल्म उद्योग में अभी तक सिर्फ चार ही ऑस्कर क्यों ? नोबेल पुरस्कारों की बारी आती है, तो हम मुंह देखने लगते हैं। इतने विशाल देश में कुछ ही चित्रकार, कुछ ही संगीतकार, कुछ ही खिलाड़ी, कुछ ही अभिनेता, कुछ ही विद्वान और कुछ ही वैज्ञानिक क्यों चर्चित हो कर रह जाते हैं? पश्चिमी जगत का कोई भी देश, रूस को छोड़ कर, आबादी में हमसे बड़ा नहीं है। किसी भी देश की सभ्यता-संस्कृति हमसे ज्यादा पुरानी नहीं है। अगर हम सामूहिक रूप से विकास करने में सफल होते हैं, तो इनसे सौ गुना ज्यादा कलाकार और ज्ञानी-विज्ञानी हम पैदा कर सकते हैं। जो है, उसकी मात्रा बताती है कि जो नहीं है, उसमें कितनी बड़ी संभावनाएं छिपी हुई हैं। इसलिए निवेदन यह है कि जो है, उस पर उत्सव मनाते समय उसे न भुलाया जाए जो नहीं है पर हो सकता है।

राजकिशोर

Monday, March 02, 2009

टी आर पी के युग में शो-पीस बनते बच्चे....

अभी पिछले हफ्ते ही टीवी पर एक नया विज्ञापन आया। इसमें एक बच्चे को दिखाया गया है जो बाहर जाकर अपने दोस्तों के साथ खेलना चाहता है पर उसकी माँ उसे बाहर जाने से मना कर देती है। वो दुखी हो जाता है। तभी वो अलमारी से खिलौने का फोन निकालता है और चुपचाप छत पर चला जाता है जहाँ उसे कोई देख न पाये। वो अपने खिलौने से अपने पापा को फोन करता है और कहता है कि माँ खेलने नहीं जाने दे रही तो आप डाँट लगाओ।ये बच्चे की मासूमियत दिखाई गई है। एक... उसे असली और नकली में भेद नहीं पता...दो उसको ये पता है कि फोन से बात कैसे करते हैं और वो मानता है कि पापा का कहना मम्मी मान जायेगी। थोड़ी देर बाद ही उसकी माँ आकर उसको कहती है कि वो पढ़ाई के बाद खेलने जा सकता है और वो भोला बच्चा सोचता है कि उसकी बात पापा तक पहुँच गई है। और उसके बाद उसके चेहरे पर जो खुशी होती है वो देखते ही बनती है। वो खुशी से झूम उठता है।
इसी तरह की एक मासूम कहानी पिछले सप्ताह ही बाल-उद्यान में प्रकाशित हुई। रचना श्रीवास्तव की कलम से निकली मासूम बच्ची की एक मार्मिक कहानी मेरी माँ सिर्फ़ अच्छी है ,सबसे अच्छी नही । इस कहानी को पढ़कर आप बाल-मन को पढ़ सकेंगे। जान सकेंगे कि छोटे से बच्चे के मन में जो भाव होते हैं वो कितने शुद्ध होते हैं। कोई छल कपट नहीं होता। दीन-दुनिया से दूर उनकी अपनी अलग ही दुनिया होती है। इस कहानी ने मुझे भी मन के भीतर तक झकझोर दिया और मैं सोचने लगा कि यदि ये बचपन है तो एक दूसरा बचपन भी पैदा हो रहा है जो आज की हकीकत भी है...
ये दूसरा बचपन है लॉफ्टर शो का.. ये बचपन है नाचने का...ये बचपन है गाने का...ये बचपन है करोड़पति बनने का...एक ऐसा बचपन जिसमें माँ-बाप अपनी इच्छा को बच्चों पर लादते हैं। छोटे-छोटे बच्चे कम्पीटीशन की इस निर्दयी दुनिया में समय से पहले ही पहुँच जाते हैं। कम्पीटीशन की वो दुनिया जिसमें अच्छे से अच्छा खिलाड़ी भी बाहर हो सकता है। उनके ऊपर बोझ होता है अच्छे गाने का वरना जज से डाँट पड़ेगी। उन्हें चाहिये कि वे लोगों को ज्यादा से ज्यादा हँसायें ताकि न्यूज़ चैनलों की खबर बन सकें। उन्हें अच्छा नाचना होता है ताकि सामने बैठे तीन जज ताली पीट सकें और सीटी बजा सकें। उनके आस-पास होते हैं दर्जनों कैमरे, चारों ओर होती है लाइटें, लोग, बोझ... रीयलिटी शो की एक ऐसी "अनरीयल" दुनिया जो खत्म कर देती है मासूमियत को। एक ऐसी झूठी और दिखावटी दुनिया ..जिसमें छल भी होता है... कपट भी होता है... माता-पिता द्वारा किये गये झूठे एस.एम.एस होते हैं...इंटेरनेट पर जाली वोट होते हैं...नाटक होता..ड्रामा होता है...एक ऐसी दलदल होती है जिसमें बचपन फँस जाता है..ऊँच-नीच का पापड़ा...छुपन-छुपाई..आँख-मिचौली खेलने की उम्र में उन्होंने पकड़ रखे होते हैं माइक..क्योंकि वही हैं जो दिलायेंगे माता-पिता को संट्रो कार...और बनायेंगे लखपति..।
आजकल जब ये शो-पीस बच्चे फूहड़ चुटकुले सुनाते हैं तो सचिन और राहुल महाजन उन्हें जज करते है और उन पर हँसते भी हैं। राहुल महाजन॥एक ऐसा शख्स जो शुरु से अब तक विवादास्पद रहा है। ड्रग्स लेते हुए पकड़े जाना, बिगबॉस में अजीब हरकतें करना और अब यहाँ बच्चों के सामने उसको बैठा देना... मुझे हैरानी होती है देख कर और ये सोचकर कि हमारा भविष्य क्या होने जा रहा है... बच्चे गाते हैं और फिल्मी हस्तियों से मिलते हैं तो बहुत खुश होते हैं। पर क्या ये बच्चे भारत का इतिहास और वर्तमान भी जान पाते हैं? क्या पढ़ाई अब गौण होती जा रही है? हाशिये पर फेंक दिया गया है बचपन के खेलों को? क्यों अब कोई पकड़म-पकड़ाई खेलते नहीं दिखता? क्या टी।वी. प्रोग्राम्स के अलावा नहीं हो सकता है बच्चों का मनोरंजन? क्या ये बच्चे सामान्य बचपन व्यतीत कर पायेंगे? इनका भविष्य केवल अलग अलग रीयलिटी शो में आने-जाने और स्टेज पर नाच-गाने में बीत जायेगा? भारत के लिये संगीत-नृत्य के क्षेत्र में नई प्रतिभाओं को ढूँढने के लिये शुरु किये गये इन शोज़ से ये ये नईं कोंपलें कहीं खिलने से पहले ही मुरझा न जायें? क्योंकि इन सबसे चैनल तो फायदा निकाल ले जायेंगे पर पैरों तले रौंद दिया जायेगा बचपन... कैरम, लूडो और साँप-सीढ़ी वाला बचपन...

तपन शर्मा

Sunday, March 01, 2009

चुनाव नाम की लूट है लुटा सके तो लुटा

हर बार लोक सभा चुनाव वर्ष के दौरान सत्तारुढ़ सरकार आम बजट में ऐसे प्रस्ताव लाती है जिनसे आम जनता प्रसन्न हो और उपहार स्वरुप सत्तारुढ़ दल को ही वोट दे कर कृतार्थ करे। इस वर्ष भी ऐसा ही हो रहा लेकिन हालात बदले हुए हैं। सरकार दोनों हाथों से लुटा रही है। फिलहाल तो आम जनता खुश हो रही है लेकिन अगली सरकार के आने भले ही उसे इसकी कीमत चुकानी ही पड़ेगी।

रेल मंत्री श्री लालू यादव ने रेल के यात्री किराए में कमी की है। यह कमी हर श्रेणी में की गई। वह पिछले पांच वर्षों से ऐसा ही करते आ रहे हैं। यह कार्य वह आंकड़ों को इधर से उधर करके कर रहे हैं क्योंकि राजस्व में कोई खास बढ़ोतरी नहीं हो रही है। रेल किराए में जो कमी आती है उसे माल भाड़े के आंकड़ों से पूरा किया जा रहा है। नए प्रोजैक्ट नहीं लग रहे हैं। लेकिन आम जनता को इससे कोई सरोकार नहीं है उसे तो प्लेटफार्म से भी कम के टिकट पर यात्रा करने को मिल ही रहा है।
हालांकि वित्त मंत्री ने अंतरिम बजट पेश करते हुए आम जनता के लिए कोई घोषणा नहीं की थी लेकिन बजट पर बहस के दौरान वाही-वाही लूट ही ली है। उन्होंने आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए आयात शुल्क में कमी की है। उत्पाद शुल्क में कमी की है। सेवाकर की दरों में कमी की है। उन्होंने कई हजार करोड़ रुपए आम जनता पर न्यौछावर कर दिए हैं। लेकिन क्या इसका लाभ जनता को मिलेगा ?

कुछ वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क में दो प्रतिशत की ही कमी की गई। वह ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं है। यही नहीं यह कटौती भी उपभोक्ता तक पहुंच पाएगी? इस पर भी संदेह है।

इस कमी को उद्योग ही हजम कर जाएगा जैसा की पूर्व में होता आया है।

सेवा कर में भी केवल 2 प्रतिशत की कमी की गई है। यानि 100 रुपए के टेलिफोन बिल पर 2 रुपए की छूट।
कूरियर, सैलून, ड्राईक्लनिंग का लाभ तो व्यापारी या सेवा प्रदाता ही हजम कर जाएगा।
आम आदमी यानि कम कीमत की कारों पर शुल्क में कोई छूट नहीं दी है लेकिन महंगी कारों पर शुल्क कम किया है और इसका लाभ उच्च वर्ग को ही मिलेगा। लेकिन बेगानी शादी में अब्दुला दिवाना यानि आम आदमी खुश।

करों में छूट देने का कोई भी विरोधी नहीं है लेकिन यह मौका इस प्रकार की छूट लुटाने का नहीं है। वैश्विक मंदी से भारत भी अछूता नहीं है। निर्यात कम होने से उत्पादन घट रहा है और इससे सरकार को दोहरा नुकसान हो रहा है। एक तो विदेशी मुद्रा में कमी आ रही है और दूसरे उत्पाद शुल्क कम मिल रहा है। यानि राजस्व में कमी हो रही है लेकिन सरकार लुटा रही है।

सरकार ने पहले सरकारी कर्मचारियों को छठा वेतन आयोग दिया और अब महंगाई भत्ता भी बढ़ा दिया। बाबू वेतन वृद्वि भी पाकर खुश तो है लेकिन बढ़ती महंगाई का रोना भी रो रहा है।
वास्तव में यह वर्ष वैश्विक मंदी का है और हर ओर मंदी व्याप्त है लेकिन सरकार है कि दोनों हाथों से लुटा रही बिना यह सोचे की आने वाले महीनों में क्या होगा?

एक एजेंसी का कहना है कि भारत में आने वाले दिनों में आर्थिक हालात खराब हो सकते हैं, लेकिन सरकार ने इस पर गौर नहीं किया।
यह ठीक है अब सरकार ने वाही-वाही लूट ली है लेकिन आने वाले महीनों में बजट में होने वाली कमी को पूरा करने के लिए नई सरकार के सामने भारी कराधान करने के कोई उपाय नहीं होगा।

राजेश शर्मा