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Sunday, September 27, 2009

अहिंसा परमो-धर्मः

आज से लगभग 102 साल पहले पंजाब की जमीन पर एक शेर पैदा हुआ, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला कर रख दिया। जी हाँ, आप ठीक समझे। आज भारतपुत्र शहीद भगत सिंह की 102वीं जयंती है। पिछले वर्ष आज ही के दिन हिन्द-युग्म ने प्रेमचंद सहजवाला की कलम से शगीद-ए-आज़म की जीवनी, उनके दर्शन, गाँधी से उनके मतभेद इत्यादि पर पुनर्चर्चा के लिए आलेखों की एक शृंखला शुरू की थी। आने वाले 2 अक्तूबर को महात्मा गाँधी की 140वीं जयंती है। इसी बीच हम इस शृंखला का परिशिष्ट प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें प्रेमचंद सहजवाला ने गाँधी की मजबूरी को उस समय की परिस्थितियों के सहारे मन्द किया है। एक अच्छी ख़बर यह है कि लेखों की यह शृंखला पुस्तक रूप में जल्द ही बाज़ार में उपलब्ध होने वाली है। लेख पढ़ें और भगत सिंह की महाकुर्बानी को स्मरण करें, यह उस वीर पुरुष को एक तरह की श्रद्धाँजलि होगी॰॰॰॰॰


परिशिष्ट
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दि. 23 मार्च 1931 को देश का एक स्वर्णिम पृष्ठ तो लिखा गया, पर एक बात को ले कर कई लोग सोचने पर विवश थे। पहले फाँसी की तारीख 24 मार्च तय की गई थी। फिर अचानक वाइसरॉय ने यह तिथि बदल कर 23 मार्च क्यों कर दी? क्या इसलिए कि 24 मार्च को ही कराची में कांग्रेस का अधिवेशन शुरू होना था और यदि एक ही दिन कांग्रेस अधिवेशन का प्रारंभ व शहीदों की शहादत हुए तो कांग्रेस एक विद्रूपता भरी स्थिति में फंस जाएगी, जिससे उबरना उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा? क्या शहादत की तिथि वाइसराय से कह कर गांधी ने बदलवाई थी? और कि जब भगत सिंह व उन के साथी जेलों में थे, तब कांग्रेस का लगभग हर महत्वपूर्ण नेता जेल में उन से मिलने जाता रहा, पर गाँधी ने वहां न जाना ही उचित क्यों समझा? गाँधी ने भगत सिंह व साथियों के विरुद्ध हुए फैसले को माफ़ कराने की बात वाइसराय लॉर्ड इर्विन से की तो थी, पर कांग्रेस द्वारा चलाए जा रहे 'सविनय अवज्ञा आन्दोलन' को ख़त्म करने के सम्बन्ध में गाँधी व लॉर्ड इर्विन के बीच 17 फरवरी 1931 से बहुत महत्वपूर्ण वार्ता चल रही थी, जो 5 मार्च 1931 को 'गाँधी इर्विन समझौते' (जिसे 'दिल्ली समझौता' भी कहा जाता है) के रूप में समाप्त हुई। इस इतनी महत्वपूर्ण बातचीत के दौरान गाँधी ने भगत सिंह का ज़िक्र तक नहीं किया और समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद ही गाँधी ने उस विषय को क्यों उठाया? भगत सिंह व साथियों के विषय को बातचीत के बाहर क्यों रखा गया? जब तक भगत सिंह पर फैसला न हुआ, तब तक समझौते पर हस्ताक्षर ही क्यों किये उन्होंने? गाँधी चाहते तो यह शहादत रुक सकती थी। गाँधी को तो काले झंडों का सामना करना पड़ा। वार्धा से कराची जाते समय हर स्टेशन पर लोगों का समूह आक्रोश के एक तूफ़ान सा उमड़ रहा था। 'नौजवान भारत सभा' के सदस्यों में तो इतना आक्रोश था कि स्टेशनों पर लाल कमीज़ें पहन कर प्रदर्शन किये। इन जवानों ने नारे लगाए-

'महात्मा गाँधी वापस जाओ'
'गाँधीवाद मुर्दाबाद'


पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

  10. अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

  11. खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद ....

  12. एक मर मिटने की हसरत ही दिले-बिस्मिल में है

इन नौजवानों ने गाँधी को कपड़े से बने काले फूल पेश किये... गाँधी ने तो बाद में भगत सिंह के स्मारक के उद्‍घाटन पर जाने से भी साफ़ मना कर दिया। गाँधी तो गद्दार थे। अंग्रेज़ों के पिट्ठू थे गाँधी तो... गाँधी को तो मुसलामानों का ही दर्द सताता है बस। मुसलामानों पर ज़रा खरोंच लगी नहीं कि बस.. गाँधी अनशन पर बैठ जाते थे, वगैरह वगैरह... न जाने क्या क्या कहा और लिखा गया गाँधी के बारे में। आज़ादी से पहले भी और बाद में भी आज भी कई लोग लड़ने पर उतारू हो जाते हैं। यहाँ तक कहते हैं कि गाँधी ही इन बहादुर लड़कों की मृत्यु के ज़िम्मेदार थे। और तो और, विरोधी राजनैतिक दलों ने भी प्रारंभ के चुनावों में इस मुद्दे को उछाल कर वोट टीपने की कोशिश की थी। पर क्या बेहतर नहीं होगा कि इन तमाम सवालों के जवाब सिलसिलेवार खोजे जाएं? आखिर गाँधी को कटघरे में क्यों खड़ा किया जाता है, जब जब भगत सिंह की मृत्यु का प्रसंग उठता है?

पहले कांग्रेस अधिवेशन की बात की जाए, जो सरदार वल्लभ भाई पटेल की अध्यक्षता में कराची में प्रारंभ हुआ। तारीख 29 मार्च 1931 है आज। कांग्रेस आज संकल्प (सं. 2) पारित करने यहाँ एकत्रित हुई है। देश के इन तीनों जवानों को श्रद्धांजलि देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है संकल्प (सं. 2)। इस सत्र में कांग्रेस के सभी गणमान्य सदस्यों के अतिरिक्त उपस्थित हैं भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह व शिवाराम राजगुरु की माँ। संकल्प का प्रस्ताव पढ़ रहे हैं पंडित जवाहरलाल नेहरु। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि प्रस्ताव पढ़ने से पूर्व सत्र को संबोधित करते हुए जवाहरलाल नेहरु कहते हैं कि बेहतर होता, यदि इस संकल्प को वही महापुरुष प्रस्तुत करते, जिन्होंने इस संकल्प का मसौदा बनाया है। यानी स्वयं महात्मा गाँधी! पर कई व्यस्तताओं के होते वे इस समय यहाँ उपस्थित नहीं हो सके हैं। संकल्प इस प्रकार है-

'यह कांग्रेस, किसी भी प्रकार या आकार की राजनैतिक हिंसा से स्वयं को विलग रख कर स्वर्गीय सरदार भगत सिंह व उस के कॉमरेड साथियों, सुखदेव व राजगुरु की वीरता व त्याग की प्रशंसा यहाँ दर्ज करती है, तथा उनके शोकग्रस्त परिवारों से मिल कर इन (तीनों) ज़िंदगियों की क्षति पर शोक व्यक्त करती है।'

प्रस्ताव को पंडित नेहरु ने प्रस्तावित किया (propose by) और पंडित मदन मोहन मालवीय ने समर्थन किया (seconded by)। पंडित नेहरु द्वारा प्रस्ताव पढ़े जाने के बाद पंडित मदन मोहन मालवीय ने भाषण किया जिस में उन्होंने तालियों की गड़गड़ाहट के बीच भगत सिंह व उस के साथियों की बहादुरी व देशभक्ति की भरपूर प्रशंसा थी। इस के बाद वे सरदार किशन सिंह व राजगुरु की माँ को सहारा दे कर सादर मंच तक ले गए। सरदार किशन सिंह ने भी सत्र को संबोधित कर के अपने विचार प्रकट किये।

प्रस्ताव पर मतदान हो, इससे पहले कुछ सदस्यों ने कुछ संशोधन प्रस्तावित किये थे। पर सिवाय श्री एम.वी. शास्त्री के, अन्य सभी ने संशोधन वापस ले लिए थे। श्रीमती कमलादेवी चट्टोपाध्याय ने श्री शास्त्री द्वारा प्रस्तावित संशोधन का समर्थन वापस लेने का फैसला भी सरदार पटेल को बता दिया। श्री शास्त्री ने अपना संशोधन पढ़ते हुए कहा-

'अध्यक्ष महोदय, इस संकल्प में ये शब्द नहीं होने चाहियें, कि कांग्रेस किसी भी प्रकार या आकार की राजनैतिक हिंसा से खुद को विलग रखती है। मेरा कहना है कि यदि हम महान सरदार भगत सिंह, महान सुखदेव व महान राजगुरु, जो कि (ब्रिटिश की) कानूनी हिंसा के शिकार हो गए हैं, का सम्मान कर रहे हैं, तो वह अधूरे मन से नहीं होना चाहिए। मैं चाहता हूँ कि इन तीनों जवानों की बहादुरी व त्याग का गुणगान आप स्वच्छंद व निर्द्वंद्व भावना से करें।'

श्री शास्त्री के संशोधन को आखिर डॉ. ताराचंद लालवानी ने समर्थन दिया और अध्यक्ष के साथ श्री शास्त्री की अप्रिय तर्कबाज़ी के बाद उनके संशोधन पर मतदान हुआ तो शेष सदस्यों में से सभी ने संशोधन के विरुद्ध मतदान किया। इस के बाद मुख्य प्रस्ताव पर मतदान हुआ जिसे शत-प्रतिशत सदस्यों ने पक्ष में वोट डाल कर पारित किया। प्रथा के अनुसार उस दिन की कार्यवाही 'वन्देमातरम्' के गान के साथ संपन्न हुई (Proceedings of 45th session of Indian National Congress pp 78-81)

दरअसल गाँधी व अहिंसा परस्पर पर्यायवाची बन गए थे। गाँधी ने अहिंसा को कांग्रेस व स्वाधीनता संघर्ष का धर्म बना दिया था। भले ही कांग्रेस में कुछ ऐसे भी युवा नेता थे, जैसे जयप्रकाश नारायण, जो गाँधी से 33 वर्ष छोटे थे व उस समय के उत्साही युवा कांग्रेसियों में से थे, जो यदा कदा अहिंसा की लक्ष्मण रेखा से चुपके से बाहर भी निकल आते थे। परन्तु एक पार्टी के रूप में कांग्रेस उस लक्ष्मण रेखा को कदापि पार नहीं कर सकती थी। इसलिए एम.वी. शास्त्री चाहे कितने भी प्रयास कर लेते, वह संकल्प उसी तरह पारित होना था, जिस तरह हुआ। जब जनवरी 1924 में बंगाल के क्रांतिकारी युवक गोपीनाथ साहा ने कलकत्ता के पुलिस कमिश्नर चार्ल्स टेगार्ट को मारना चाहा (गलती से उन्होंने किसी मि. डे की हत्या कर दी- अध्याय 7 अनुच्छेद 6), और हंसते हंसते फांसी के तख्ते पर झूल गए, तब बंगाल कांग्रेस को भी गोपीनाथ साहा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते समय ऐसा ही, शर्तों में बंधा संकल्प पारित करना पड़ा था, जिसमें कांग्रेस ने स्वयं को किसी भी प्रकार की हिंसा से दूर ही रखा। अर्थात् कांग्रेस किसी भी अन्य बात से समझौता कर सकती थी, परन्तु अहिंसा पथ से विमुख होना उस के लिए असंभव था। गाँधी स्वाधीनता संघर्ष में अहिंसा पथ पर कितने दृढ़ थे, इस का सबूत है उनके सब से पहले आंदोलन 'असहयोग आंदोलन' का सहसा एक झटके से 12 फरवरी 1922 को समाप्त हो जाना। पंडित नेहरु जैसे नेता बौखला गए, जो इस आंदोलन को ले कर इतने उत्साहित थे कि उनके साथ हज़ारों नौजवानों में भी उत्तेजना सी आ गई थी। पंडित नेहरु अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि देश के नौजवानों में 'असहयोग आंदोलन' को ले कर इस कदर अदम्य जोश व उत्साह था कि जब पुलिस कोई लॉरी ले कर किसी कार्यकर्ता को गिरफ्तार करने जाती, तो ऐसे असंख्य लोग, जिन्होंने कभी कांग्रेस की गतिविधियों में हिस्सा नहीं लिया, गिरफ्तार कर लिए जाने का आग्रह करते। लॉरी के अन्दर भीड़ बन कर ठुंस जाते और ज़िद में बाहर आने से इनकार कर देते। जेल के अन्दर हम लोग सुनते कि बाहर लॉरियों की लॉरियां भर कर आई हैं। कई सरकारी क्लर्क ड्यूटी से घर लौट रहे होते तो इस सारे जुनून से प्रभावित हो कर उत्साहवश स्वयं को घर की बजाय जेलों में पाते (An Autobiography - Jawaharlal Nehru pp 86-87)। ऐसे में गाँधी ने अचानक सब को सकते में डाल 12 फरवरी 1922 को आंदोलन वापस क्यों ले लिया! दरअसल उत्तरप्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक कस्बे चौरी चौरा में 5 फरवरी 1922 को पुलिस और लोगों के बीच बेहद हिंसक प्रकार की मुठभेड़ हो गई। पुलिस ने गोलियां चलाई तो जनता भी होश खो बैठी और पुलिस थाने पर हमला बोल दिया। गुस्साई भीड़ ने जब पुलिस थाने को आग लगा दी तो पुलिसवाले जान बचा कर थाने से बाहर भागने लगे। पर भीड़ ने कई पुलिसवालों को पकड़ कर थाने में लगाई आग में ही झोंक दिया। कुल 22 पुलिसवाले जल कर मर गए (India's Struggle for Independence by Bipin Chandra, Mridula Mukherjee, KN Pannikar and Sucheta Mahajan p 191)। गाँधी के हृदय को बहुत असह्य ठेस पहुँची। कई लोगों ने सोचा केवल एक जगह ही तो ऐसा हुआ! पर नहीं! गाँधी ने अडिग हो कर आंदोलन समाप्त कर दिया। एक विदेशी महिला ने तो तो बाद के वर्षों में ब्रिटिश वाइसराय को पत्र भी लिखा था कि भारत में पुलिस की आखिर ज़रुरत क्या है। भारत में ब्रिटिश का सब से बड़ा पुलिसवाला गाँधी तो है!

हम इस सारे प्रकरण की तुलना 'भारत छोड़ो' आंदोलन से करते हैं। 8 अगस्त 1942 को गाँधी ने मुंबई से 'भारत छोड़ो' आन्दोलन का बिगुल बजा दिया। ब्रिटिश ने भी उतनी ही मुस्तैदी से 9 अगस्त की सुबह-सुबह सभी छोटे-बड़े कांग्रेसी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। उस समय द्वितीय विश्वयुद्ध के कारण ब्रिटिश वैसे ही पसीने-पसीने हो रही थी और ऐसे समय किसी भी प्रकार के आंदोलन से उसकी बौखलाहट इन गिरफ्तारियों से ही स्पष्ट थी। गाँधी और अन्य सभी नेता विभिन्न शहरों में जेलों में थे और बाहर देश की जनता के सर पर आक्रोश का भूत सा सवार हो गया। पूरा देश हिंसक घटनाओं से भर उठा। जनता को जहाँ मौका मिलता, एक ज्वालामुखी बन कर बहुत भारी संख्या में आगे बढ़ती और रेलवे स्टेशन हो या सरकारी इमारत, टेलेग्राम के खंभे हों या पुलिस थाने, सब को आग लगा देती या पथराव से भून देती. लेकिन नतीजा क्या हुआ? इस घटनाचक्र के ठीक दो महीने बाद ब्रिटिश के प्रधानमंत्री सर विन्स्टन चर्चिल एक कुटिल मुस्कराहट मुस्कराते हुए ब्रिटिश की संसद में भाषण कर रहे हैं। वे भारत के प्रति अपनी चिर परिचित वितृष्णा के साथ बहुत बेशर्म तरीके से ऐलान करते हैं कि भारत में हो रहे उपद्रवों को ब्रिटिश सरकार ने पूरी ताकत के साथ कुचल दिया है। उन्होंने भारत की बहादुर पुलिस और अधिकारी वर्ग की वफादारी की प्रशंसा की, जिनका व्यवहार उन के अनुसार सदैव सर्वोच्च प्रशंसा का अधिकार रखता है! (The Discovery of India pp 538-539)

अर्थात शक्ति के समीकरण में भारत की जनता पिछड़ गई। इस पर कई लोग तो बौखला कर यह प्रश्न भी उछालते हैं -
'तो फिर क्या आज़ादी गाँधी के सत्याग्रह से डर कर मिली? या फिर जेलों में 'रघुपति राघव...' गा रहे कांग्रेसियों से मिली आज़ादी?

यह बहुत पेचीदा सवाल है। अक्सर राजनैतिक दल उस सारे घटनाचक्र को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हैं और अपने तुच्छ राजनैतिक स्वार्थ सिद्ध करने के लिए यह तर्क देते हैं कि ब्रिटिश तो द्वितीय विश्वयुद्ध में ही थक हार चुकी थी, सो चली गई। गाँधी ने क्या किया? पर जब चौरी-चौरा प्रकरण के बाद अचानक आंदोलन वापस ले कर गाँधी ने सब को हैरत में डाल दिया, तब कांग्रेस से भी ज़्यादा चौंकी थी खुद ब्रिटिश। वाइसरॉय के एक प्रवक्ता ने सुख की सांस लेते हुए बयान दिया था कि गाँधी यह आंदोलन वापस न लेते तो ब्रिटिश को बहुत भारी नुक्सान उठाना पड़ता। अब तक इस आंदोलन से कई लाख पाउंड का नुकसान हो चुका है और आंदोलन वापस होते ही कई लाख पाउंड का नुकसान होते होते बच गया। गाँधी ब्रिटिश की नब्ज़ को परख सकते थे। उन्हें पता था कि ब्रिटिश तो यहाँ धन कमाने आई है। इस सोने की चिड़िया को लूट कर अपने घर जश्न मनाने आई है ब्रिटिश। इसलिए गाँधी ब्रिटिश से आया माल रेलवे स्टेशनों व कई सार्वजनिक स्थलों पर जलवाते थे, ताकि ब्रिटिश की रीढ़ की आर्थिक हड्डी टूटे। यदि सत्याग्रह का कोई अर्थ न होता तो सरदार पटेल ने बरदोली (गुजरात) में भूमि कर बढ़ने पर जो सत्याग्रह किया, उससे ब्रिटिश के तंत्र की जड़ें क्यों हिल गई? वल्लभ भाई पटेल नाम की गूँज ब्रिटिश की संसद में कैसे होने लगी? वल्लभ भाई पटेल रातों रात बरदोली निवासियों की नज़र में सरदार वल्लभ भाई पटेल कैसे बन गए? 'नमक सत्याग्रह' में जब गाँधी ने हज़ारों नर नारियों के साथ दांडी के समुद्र में घुस कर अपनी मुट्ठी में अपने ही देश का नमक कस लिया और ब्रिटिश को चुनौती दी कि जो ब्रिटिश हमारा ही नमक खा कर नमक का टैक्स बढ़ाती है, वह हमें नमक बनाने से रोक सके तो रोके। तब भी ब्रिटिश को ही ज़रुरत महसूस हुई कि वह 'गाँधी इर्विन वार्ता' करे। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद परिस्थिति बहुत जटिल हो गई। ब्रिटिश की समझ नहीं आ रहा था कि जंग जीतने की खुशी मनाए या अचानक सर पर आई कंगाली को रोये। प्रसिद्ध लेखक युगल लैरी कॉलिन्स और डोमिनीक लैपीयर द्वारा रचित विश्वप्रसिद्ध उपन्यास 'Freedom at Midnight' के पहले अध्याय में ही लिखा है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद लन्दन में लोगों के पास नव-वर्ष मनाने तक का पैसा नहीं बचा था। लोग इस कदर फटेहाल से हो चुके थे कि उनके पास लांड्री का बिल भरने तक के पैसे नहीं थे। पूरे छः वर्ष इतना बड़ा युद्ध लड़ कर ब्रिटिश खोखली हो चुकी थी। ऊपर से अमरीका व अन्य सभी पश्चिमी देशों की गिद्ध-दृष्टि भारत पर! अमरीका बार बार चर्चिल को सलाह दे रहा था कि गाँधी जेल में अचानक अनशन पर बैठ गए हैं, उनकी जान खतरे में है। गाँधी को जेल से रिहा कर दो! तो क्या अमरीका को उस समय गाँधी के प्रति चिंता हो रही थी! अमरीका तो ब्रिटिश को भारत को आज़ाद कर देने को भी उकसा रहा था। चर्चिल जेल के बाहर एक हवाई जहाज़ और सेना खड़ी कर देते हैं और कहते हैं कि गाँधी को मरने दो। जब मर जाए तो सेना हवाई जहाज़ में उस का शरीर ले जा कर जहाँ लोग कहेंगे, वहीं धर देगी। तो चर्चिल को आखिर किस बात का तनाव सता रहा था! चर्चिल गाँधी के मरने में ही ब्रिटिश को सुरक्षित समझते थे। चर्चिल असुरक्षा से बुरी तरह ग्रस्त थे। चर्चिल को लग रहा था कि ब्रिटिश किसी भी परिस्थिति में भारत न छोड़े। क्योंकि युद्ध से हुई आर्थिक बर्बादी की भरपाई आखिर कैसे हो? अपनी खाली जेबों को भरने के लिए उसी सोने की चिड़िया की बेहद ज़रुरत थी ब्रिटिश को। ब्रिटिश अपना सारा आर्थिक घाटा इसी सोने की चिड़िया से ही पूरा कर सकती थी। इसलिये उस समय भारत में बने रहना उस के अस्तित्व की एक शर्त सा बन गया था। और जर्मनी में सुभाषचन्द्र बोस द्वारा हिटलर से किये गए इस निवेदन पर कि हिटलर भारत की आज़ादी के लिए मदद करें, हिटलर यह कहते हैं कि वे नहीं चाहते कि ब्रिटिश फिलहाल वहां से हटे! क्योंकि यदि ब्रिटिश हट गई तो वहां रूस आ जाएगा! अर्थात् दुनिया की बड़ी-बड़ी ताकतों की गिद्ध नज़रों ने भारत भूमि पर एक बिसात सी बिछा रखी थी। ब्रिटिश हटे तो इस सोने की चिड़िया का शोषण अमरीका करे या रूस! या फिर ब्रिटिश ही टिकी रहे! ऐसे में ब्रिटिश ने जब अंततः विश्लेषण किया तो परिस्थिति 1857 जैसी नहीं थी। न ही प्रथम विश्वयुद्ध जैसी। 1857 एक असंगठित बिखरा-बिखरा फौजी विद्रोह था, जिसे कुचल दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) के प्रारंभ में अभी मोहनदास करमचंद गाँधी नाम की शक्ति ने भारत में कदम रखा ही था। अब उसी गाँधी की ताक़त के रूप में भारत की जनता का आज़ादी-उन्मुख चेहरा ब्रिटिश को उतना उत्साहवर्द्धक नहीं लगा, जितना प्रथम विश्वयुद्ध में! तब तो गाँधी ने गुजरात जा कर नौजवानों को प्रेरणा दी कि वे ब्रिटिश की सेना में भर्ती हों और युद्ध में ब्रिटिश की सहायता करें। अब परिस्थिति ठीक उलट थी। ब्रिटिश ने इस युद्ध में भी कांग्रेस के सामने समर्थन के लिए झोली फैलाई। कांग्रेस चाहती थी कि युद्ध में ब्रिटिश की मदद करे और लगे हाथों कीमत के रूप में आज़ादी ले ले। गाँधी ने मना किया। कांग्रेस नहीं मानी। पर ब्रिटिश से बातचीत कर के खिसियानी बिल्ली की तरह वापस गाँधी के पास ही आई। और गाँधी ने उस समय तक देश की जनता को एक अदम्य ताकत में बदल दिया था। ब्रिटिश की हथेलियों में पसीना आ गया, यह सोच कर कि अब वह उस देश पर एक वर्ष भी और राज करे, जिस देश की जनता एक पल के लिए भी अब पराधीन नहीं रह सकती! भले ही ब्रिटिश के पास उस समय भी बीस लाख से भी अधिक सेना थी, पर ब्रिटिश ने अपनी आर्थिक महत्वाकांक्षाओं को जनता के शोषण पर आधारित किया था, उस पर लोकतंत्र का मुखौटा चढ़ा कर। लोकतंत्र यानी जनता का साथ। पर जब लोक साथ न हो तो तंत्र क्या करेगा? शक्ति के समीकरण में ब्रिटिश ने लोकमान्य तिलक को भी एक समय-बिंदु के बाद शिथिल सा कर दिया था। शक्ति के समीकरण में सुभाषचन्द्र बोस की 'आज़ाद हिंद फौज' भी नगण्य पड़ गई। पर सहयोग व आज्ञापालन के मामले में ब्रिटिश अब खुद को मोहनदास करमचंद गाँधी के सामने बौना सा महसूस करने लगी थी। शारीरिक शक्ति के रूप में वह अब भी विकराल थी, पर वह हारी थी तो मानसिक मोर्चे पर।

गाँधी ने भगत सिंह के लिए कोशिश की भी थी या नहीं, इस बात को ले कर इतिहासकारों के कई मत हैं। 'गाँधी इर्विन वार्ता' 17 फरवरी 1931 को दिल्ली में शुरू हुई। इतिहास में स्वाधीनता संघर्ष का एक पूरा दशक, सन् '28 से ले कर '37 तक का, बेहद महत्वपूर्ण दशक था, जिस ने जनता को आज़ादी के काफी निकट ला कर खड़ा कर दिया। पंडित नेहरु 'The Discovery of India' में लिखते हैं कि सन् '37 में जब देश में प्रादेशिक चुनाव हो गए, और कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें आ गई तो लोगों के व्यवहार में बहुत सुखद से परिवर्तन देखे गए। आसपास के शहरों-गांवों से लोगों के झुंड के झुंड स्वेच्छा से सचिवालयों में घूमने लगे, (जैसे आज़ादी सचमुच मिल ही गई हो)। लोग विधान सभा के चैंबर में चले जाते, मंत्रियों के कमरों में झाँकने लगते। उन्हें रोकना सचमुच कठिन था (p 406)। सन् 1928 में 'साइमन कमीशन' आया। कांग्रेस ने उसे ठुकराया और कांग्रेस ने अपनी शर्तों पर आधारित मोतीलाल नेहरु रिपोर्ट बनाई। मुहम्मद अली जिन्ना ने रिपोर्ट को खारिज कर के अपने ही 14 पॉइंट दे दिए। कांग्रेस की बागडोर मोतीलाल नेहरु के हाथों से निकल जवाहरलाल नेहरु के हाथों आ गई जो एक बार तो पिता से ही भिड़ पड़े थे कि ब्रिटिश से हम सम्पूर्ण आज़ादी लेंगे, उस से कम और कुछ नहीं। पंडित नेहरु द्वारा रावी के किनारे से पूरे देश को सम्पूर्ण आज़ादी की शपथ दिलवाई गई। देश में जगह-जगह तिरंगा झंडा फहराए जाने की धूम मच गई। गिरफ्तारियां। 'सविनय अवज्ञा''नमक सत्याग्रह'। और फिर लन्दन में हुए 'गोल-मेज़ कांफ्रेंस', जिन का चरम था ब्रिटिश द्वारा बनाया गया 'Government of India Act1935', जिस के आधार पर सन् 1949 में भारत का पूरा संविधान बना। और 1937 के प्रादेशिक चुनाव। क्या कुछ नहीं हो रहा था स्वाधीनता इतिहास के पन्नों पर इस दशक में। गाँधी इस पूरे दशक में अथक परिश्रम में लगे थे और इस पूरे घटनाचक्र से जुड़े रहने के सिवाय उन्हें किसी अन्य बात के लिए समय नहीं था। वे एक महान यज्ञ में महान तपस्वी से लगे थे। ऐसे में उन के लिए तीन नौजवान ज़िन्दगियाँ शायद बहुत कम अहमियत रखती हों। उन्होंने जनता को आश्वस्त तो किया था कि उन्होंने वाइसराय से 'बहुत' कोशिश की कि इन तीनों जवानों के मृत्युदंड को उम्र कैद और देश निकाले में बदला जाए। पर कुछ लोग यह मानते हैं कि उन्होंने कोशिश तो की, पर सरसरी सी। वह भी अधूरे मन। कुछ लोग कहते हैं कि 'बहुत' शब्द झूठा है, तो अन्य कई लोग यह मानते हैं कि इतने बड़े यज्ञ में एक शब्द का झूठ कोई अर्थ नहीं रखता। क्योंकि धर्मराज युधिष्ठिर ने भी तो महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा हाथी के मरने पर द्रोणाचार्य को इस भ्रम में रखा कि उनका पुत्र अश्वत्थामा मर गया है। कुछ इस झूठ की तुलना चंद्रमा से करते हैं कि जैसे चंद्रमा पर एक काला दाग़ है, वैसे ही गाँधी के उज्जवल स्वच्छ चरित्र पर भी एक दाग़ है, कि उन्होंने 'बहुत' कोशिश कह कर अपने प्रयास की अतिशयोक्ति व्यक्त की। दरअसल अपने पूरे यज्ञ में गाँधी को एक ही चिंता रहती थी कि नौजवान किसी भी परिस्थिति में दिग्भ्रमित हो कर हिंसा की ओर उन्मुख न हो जाएं। इसीलिए जब मृत्युदंड घोषित हुए तो उन्होंने वाइसराय को पत्र लिख कर इस बात की चिंता जताई कि यदि यह मृत्युदंड हो गया तो संभव है कि देश की नौजवान पीढ़ी भड़क उठे और हिंसा पर उतर आए। गाँधी किसी भी परिस्थिति में नहीं चाहते थे कि इतनी महत्वपूर्ण वार्ता की प्रक्रिया में देश में भड़की कानून व्यवस्था की समस्या के कारण रुकावट आए। यही गाँधी का स्वार्थ था। 17 फरवरी को प्रारंभ हुई 'गाँधी इर्विन वार्ता' से अगले दिन गाँधी ने अन्य सभी महत्वपूर्ण बातों से अलग, एक सरसरे तरीके से लॉर्ड इर्विन से यह चर्चा छेड़ी कि देश के वातावरण को शांतिपूर्ण बनाए रखना इस वार्ता के दौरान बहुत ज़रूरी है। इसलिए यह मृत्युदंड रोक दें। इर्विन बहुत चालाक वाइसराय था। गाँधी से उसने स्पष्ट किया कि:

'मेरे पास तीन विकल्प हैं। या तो मैं तीनों की फांसी माफ़ कर दूं। या फांसी तब दूं, जब कांग्रेस का कराची अधिवेशन समाप्त हो चुका हो। या फिर कांग्रेस अधिवेशन से पहले ही फांसी दे दूं। पर मैं किसी भी हालत में फांसी को माफ़ नहीं कर सकता, और रही बात फांसी को बाद में देने की, सो इस से देश की जनता इसी भ्रम में रहेगी, कि शायद हम उसे माफ़ करने पर विचार कर रहे हैं। इसीलिए बेहतर कि यह काम पहले ही कर दिया जाए!'

और वाइसराय ने तारीख 24 से बदल कर 23 कर दी!

वाइसराय किसी भी हालत में मृत्युदंड माफ़ करने वाले नहीं थे। यह इस बात से भी स्पष्ट है कि जब 5 मार्च को आखिर 'दिल्ली समझौता' हुआ तो उस के एक अनुच्छेद में कांग्रेसियों पर चल रहे मुक़दमे वापस लेने और उन्हें जेलों से रिहा करने की भी ब्रिटिश द्वारा सहमति थी। पर यह सहमति इस शर्त के साथ थी कि केवल जिनके खिलाफ किसी भी प्रकार की हिंसा के गंभीर आरोप नहीं हैं, उन पर चल रहे मुक़दमे वापस लिए जाएंगे और रिहा किया जाएगा। 5 मार्च को 'दिल्ली समझौते' पर हस्ताक्षर हुए और अभी भगत सिंह व साथियों की शहादत में पूरे 18 दिन पड़े थे। जनता के मन में यह उत्कट इच्छा थी कि गाँधी समझौते को ही क्यों नहीं फाड़-फूड़ कर कूड़ेदान में डाल देते, यदि वाइसराय हमारे इन तीन बहादुर लड़कों को छोड़ने पर राज़ी नहीं है तो। पर गाँधी जानते थे, कि देश उस समय बहुत महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा था और समझौते के बाद देश की जनता की शक्ति बढ़नी थी। सो कुछ भी हो, गाँधी समझौते की हत्या करने का विचार तक मन में नहीं ला सकते थे।

...आज 23 मार्च है। सोमवार है। गाँधी सोमवार को मौन व्रत रखते हैं व बातचीत ज़रूरी हो तो कागज़ पर लिख कर करते हैं। आज शाम को ही शहादत है। और गाँधी अचानक एक उत्तेजना भरी अपील वाइसराय को भेजते हैं। जैसे आम जनता की उत्तेजना गाँधी में भी आ गई हो। पर गाँधी को दरअसल 'नौजवान भारत सभा' ने बहुत आग्रह से एक अपील भेजी थी, कि गाँधी और केवल गाँधी ही उनके तीनों साथियों को बचा सकते हैं। पूरे देश में ऐसी कोई ताकत नहीं, जो ऐसे समय कुछ कर सके। 'नौजवान भारत सभा' के नौजवानों ने अपने पत्र में आश्वासन दिया है कि सिर्फ हमारे ये तीन साथी बचा लीजिये। हम आप से वादा करते हैं कि जीवन भर फिर कभी भी शस्त्र को हाथ में नहीं उठाएंगे। किसी भी प्रकार की हिंसा से हम पूरी तरह अछूते रहेंगे। हम हमेशा हमेशा के लिए अपना रास्ता छोड़ने को तैयार हैं। हम कोई भी राजनैतिक हत्या नहीं करेंगे। गाँधी की चेतना को इस आश्वासन ने झकझोर कर रख दिया। इन नौजवानों की ओर से इस से बड़ा पुरस्कार गाँधी के लिए नहीं हो सकता था। इन सभी घटनाओं के दौरान गाँधी कभी भी भगत सिंह की देशभक्ति, बहादुरी व चरित्र पर संदेह नहीं करते थे। पर वे अपने अख़बारों में इतना स्पष्ट लिखते थे कि राजनैतिक हत्याओं द्वारा ये नौजवान अपनी बहादुरी का दुरुपयोग कर रहे हैं। इसलिए भगत सिंह से जेल में मिलने जाने से कहीं अनायास ही उनके और भगत सिंह के रास्ते आपस में विलीन होते हुए न दिखें, वे भगत सिंह से जेल में मिलने कभी नहीं गए। अब एक बहुत बड़ा आश्वासन उन के हाथ में है। गाँधी वाइसराय को एक अति-तत्काल पत्र दौड़ाते हैं कि आज सोमवार है। मैं बातचीत नहीं कर पाऊंगा। कागज़ कलम से ही बात कर पाऊंगा। पर इस समय मेरे पास ब्रिटिश के लिए एक सुनहला मौका है। ब्रिटिश चाहती है कि देश में शांति बनी रहे। तो इस से अच्छा मौका और नहीं हो सकता। आप ये मृत्युदंड टाल कर उम्र कैद और देश निकाले में बदल दीजिये। भगत सिंह ही बाहर चले जाएंगे, और ये नौजवान अपनी पिस्तोलें व हथियार समर्पित कर के शांति पथ पर चलने लगेंगे, इस से ज़्यादा आप को चाहिए क्या...

...पर अब तक देर हो चुकी थी। वाइसराय ने गाँधी की अपील को ठुकरा दिया और शाम को शहादत हो गई।

गाँधी को अफ़सोस से कहना पड़ा, कि ब्रिटिश के पास एक सुनहला मौका था, देश के नौजवानों को दिग्भ्रमित होने से बचाने का। पर ब्रिटिश ने यह सुनहला मौका गँवा दिया है। शायद देर तो इसलिए भी हो गई थी कि भगत सिंह ने जिन लेखों द्वारा आतंकवाद के रास्ते को नकारना शुरू कर दिया था, उन का गाँधी को पता नहीं चला था। गाँधी को पता चलता कि अब भगत सिंह अपने रास्ते से मानसिक तौर पर विलग हो चुके हैं, तो मुमकिन है कि गाँधी के प्रयास कुछ और सशक्त होते।

गाँधी को भगत सिंह के ऊंचे चरित्र में कभी भी संदेह नहीं रहा। वे चाहते थे कि देश की युवा पीढ़ी उनके ऊंचे इखलाक और देशभक्ति से प्रेरणा ले। पर जब उन्हें किसी स्मारक समिति ने अनुरोध किया कि भगत सिंह की स्मृति में एक स्मारक स्थापित किया जा रहा है, इस में आप की उपस्थिति की ज़रुरत है, तब गाँधी ने उस स्मारक समिति को विनम्र लिखा:

'किसी का भी स्मारक बनाने का अर्थ है कि स्मारक बनाने वाले उस के कृत्य का अनुकरण करें। यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को भी एक आमंत्रण होगा कि ऐसे हर कृत्य की नक़ल करे। इसलिए मैं किसी भी तरीक़े से अपने आप को इस प्रकार के स्मारक से जोड़ने में असमर्थ हूँ'!...(The Trial of Bhagat Singh: Politics of Justice by AG Noorani p 251)

चौरी चौरा प्रकरण, और उक्त पत्र! अहिंसा को ले कर गाँधी की भीष्म प्रतिज्ञा के इन से बड़े सबूत भला और कोई हो सकते हैं ?...

समाप्त
********


----प्रेमचंद सहजवाला

Monday, March 23, 2009

एक मर मिटने की हसरत ही दिले-बिस्मिल में है

भारतीय इतिहास में २३ मार्च का दिन भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की शहादत के तौर पर याद किया जाता है। हिन्द-युग्म के प्रेमचंद सहजवाला विगत ६ महीनों से भगत सिंह और उनके सभी दस्तावेजों का पुनर्वालोकन कर रहे हैं। आज इन शहीदों को सलाम करते हुए इस लेखमाला की अंतिम कड़ी प्रकाशित कर रहे हैं।


ट्रिब्यूनल - ट्रिब्यूनल जब गठित हुआ तो उस में तीन जज थे: जस्टिस जॉन कोल्डस्ट्रीम (अध्यक्ष), जस्टिस जी सी हिल्टन व जस्टिस सैय्यद आगा हैदर. पर 12 मई को क्या हुआ कि जज जब अदालत में प्रविष्ट हुए तो क्रांतिकारी रोज़ की तरह देशभक्ति के गीत गा रहे थे व नारे लगा रहे थे. प्रायः जज इन गीतों के बाद ही अदालत में प्रवेश करते थे. इस बीच पुलिस क्रांतिकारियों की हथकड़ियाँ भी हटा देती थी. पर आज जज पहले ही भीतर आ गए. अध्यक्ष जस्टिस कोल्डस्ट्रीम ने क्या किया कि पुलिस के लिए एक आदेश लिखा कि सभी अभियुक्तों को दोबारा हथकड़ियाँ लगाई जाएँ और वापस जेल भेज दिया जाए. पुलिस तुंरत हरकत में आ गई. पर क्रांतिकारी हड़बड़ाहट व अंधाधुंध तरीके से हथकड़ियाँ लगाई जाने के बावजूद गाते रहे - मेरा रंग दे बसंती चोला...पुलिस से जद्दोजहद में तीन युवक - प्रेम दत्त, अजय घोष व कुंदन लाल बेहोश हो गए व कई अन्य ज़ख्मी हो गए. इस पर जस्टिस आगा हैदर ने अध्यक्ष जस्टिस कोल्डस्ट्रीम से असहमति जताई और एक आदेश लिखा कि वे उन के इस आदेश में शामिल नहीं हैं. ट्रिब्यूनल में गहरे मतभेद होने शुरू हो गए. जस्टिस कोल्डस्ट्रीम से माफ़ी मांगने की डिमांड होने लगी. इस लिए 20 जून 1931 को जब ट्रिब्यूनल की अन्तिम बैठक हुई, तो ट्रिब्यूनल का पुनर्गठन किया गया. आगा हैदर को हटा दिया गया क्यों कि वे अन्य दो साथियों से असहमत रहते थे व यदा कदा क्रांतिकारियों का पक्ष ले लेते थे. कोल्डस्ट्रीम को लम्बी छुट्टी का आर्डर पकड़ा दिया गया. अब नए ट्रिब्यूनल के अध्यक्ष थे जस्टिस जी सी हिल्टन व अन्य दो सदस्य : जस्टिस टैप व जस्टिस अब्दुल कादिर.
ब्रिटिश  का धर्म-संकट जब बढ़ता गया,  तब अचानक वायसराय को बीच में पड़ना पड़ा.  वायसराय ने क्या किया कि सारे मुक़दमे में एक ट्रिब्यूनल ले कर कूद पड़ा.  उसने उच्च-न्यायलय के तीन जजों, (जस्टिस जी सी हिल्टन, अब्दुल कादिर व जे के टैप)  का एक विशेष ट्रिब्यूनल बनाया, जो इस  मुक़दमे की पैरवी करे और वह जो भी फ़ैसला दे, उस के विरुद्ध अपील तक न की जा सके.  यानी अपने ह्रदय-पटल पर तो ब्रिटिश एक जजमेंट लिख  ही चुकी थी,  केवल उसे एक मुखौटा देना था, सो उस ने  दिया.  दिनांक 1 मई 1930 को शिमला से एक  Ordinance III पारित करा कर वायसराय  लार्ड  इर्विन ने ट्रिब्यूनल का गठन किया.  इस Ordinance III की खासियत यह भी कि इसे वायसराय के हस्ताक्षर से पहले असेम्बली द्वारा पारित कराना भी अनिवार्य नहीं था.  यानी पूरी जनता के अधिकारों को फलांग कर, एक लम्बी कूद जैसा  था यह Ordinance III.  देश-भक्तों  की मृत्यु का यह दस्तावेज़ ब्रिटिश के खूनी हाथों द्वारा लिखा  जाना था.  अलबत्ता इस ट्रिब्यूनल के पास एक सीमित अवधि थी,  यानी छः महीने,  जिस के बाद ट्रिब्यूनल स्वयमेव समाप्त हो जाएगा.  भगत सिंह ने तो अदालत में मजिस्ट्रेट से ही कह दिया कि ब्रिटिश द्वारा इस ट्रिब्यूनल का गठन ही अभियुक्तों की विजय पताका है,  क्यों कि सभी अभियुक्त तो इतने दिन जनता को यही बताना  चाहते थे कि देश में दर-असल कोई क़ानून है ही नहीं (केवल जंगल का क़ानून है),  और यह काम वायसराय ने स्वयं  अपने कर-कमलों द्वारा ही कर दिया है.  भगत सिंह ने वायसराय को एक  पत्र लिख कर उसे  एक आईना सा दिखा दिया.  भगत सिंह ने स्पष्ट लिखा कि ट्रिब्यूनल बनाने के कारणों में यह लिखा गया है कि हम लोगों में से दो जने तो मुकदमा शुरू होने से पहले ही भूख हड़ताल पर चले गए थे.  कि  हम तो मुक़दमे में  रुकावट डालना  चाहते हैं.  पर कोई भी सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति यह सहज ही समझ सकता है कि भूख  हड़ताल का दर-असल मुक़दमे से कोई ताल्लुक  ही नहीं था.  (भूख हड़ताल तो जेल में हम सब के साथ हुए दुर्व्यवहार से सम्बंधित थी).  जब जब सरकार ने जेल की स्थिति सुधारने  का आश्वासन दिया,  तब तब हमने भूख-हड़ताल समाप्त भी की.  पर जब सरकार की नीयत का खोखलापन उजागर हुआ,  तब हम फ़िर हड़ताल पर चले गए.  पर यह कहना सरासर ग़लत होगा कि मुक़दमे में रुकावट डालने के लिए हम हड़ताल पर गए.  जतिन दास जैसे बहादुर नौजवान ने ऐसी तुच्छ सी बात के लिए अपनी जान कुर्बान नहीं की होगी.
 
मुक़दमे से तो इन सभी बहादुरों में से कोई भी नहीं डरता था.   इन देश-भक्त जवानों पर तो,जैसा पहले लिखा गया है, बिस्मिल की ग़ज़ल का ही यह शेर भी लागू होता है:
 
अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मर मिटने की हसरत ही दिले-बिस्मिल में है
 
ये सब क्रांतिकारी जानते थे, कि अंततः देश के  लिए उन्हें मृत्यु का ही वरण करना है.   मुक़दमे की तरफ़ तो भगत सिंह ने शुरू से ही एक उपेक्षा का रुख अपना रखा था.  उन्होंने अपना कोई वकील  तक करने  से इनकार कर दिया था.  बहुत आग्रह के बाद केवल एक कानूनी सलाहकार  नियुक्त करने पर वे राज़ी हुए थे,  जो उन्हें सलाह देंगे लेकिन  उन का मुकदमा नहीं लड़ेंगे.  भगत सिंह ने दर-असल मुक़दमे का इस्तेमाल एक मंच की तरह करना चाहा,  जिस के माध्यम से वे देश भर के युवाओं में देश-भक्ति की एक लहर पैदा कर सकें. 
पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

  10. अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

  11. खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद ....

अपनी जान बचाने के लिए उन्होंने ने मुक़दमे का इस्तैमाल किया ही नही.   दिनांक  5 मई 1930  प्रातः 10 बजे लाहौर के 'पूंच हाउस' में ट्रिब्यूनल की अगुवाई में सभी अभियुक्तों पर 'सांडर्स हत्या काण्ड' का मुकदमा शुरू हुआ.  अभियुक्त उस से चंद  मिनट पहले ही ट्रिब्यूनल के सामने उपस्थित हो चुके थे और भीतर क्रांतिकारी नारे लगाते हुए प्रविष्ट हुए थे.
 
यहाँ भगत सिंह ने दरख्वास्त दी कि ट्रिब्यूनल को 15 दिन तक स्थगित किया जाए ताकि वे इस ट्रिब्यूनल को गैर-कानूनी साबित करने के लिए दलीलें तैयार कर सकें,  पर उन का यह निवेदन नहीं माना गया.
 
अभियुक्त जे एन  सान्याल सहसा ट्रिब्यूनल के सामने  खड़े हो कर बहुत आक्रोश भरा भाषण दे कर ब्रिटिश की चालों  की कलई  उधेड़ने   लगे.  ट्रिब्यूनल ने उन से उन का कागज़ छीन लिया. पर सान्याल उस का अन्तिम अनुच्छेद बुलंद आवाज़ में बोलने लगे:
 
' इन सभी कारणों से हम इस धोखाधड़ी  की नुमाइश में हिस्सा बनने से साफ़ इनकार करते हैं, और  अब से हम  इस मुक़दमे की पैरवी में भी कोई हिस्सा नहीं लेंगे...'  (Shaheede Azam Sardar Bhagat Singh: The Man and His Ideology by GS Deol p 77).
 
इस बीच क्या हुआ कि भगत सिंह के पिता सरदार किशन  सिंह पुत्र मोह के वश में आ कर ट्रिब्यूनल को एक अर्जी दे बैठे, जिस पर भगत सिंह को बहुत गुस्सा आया.  सरदार किशन सिंह ने यह साबित करने की कोशिश की कि सांडर्स हत्या काण्ड वाले दिन तो भगत सिंह लाहौर में ही नहीं थे!  अपने क्रांतिकारी पुत्र को फांसी के फंदे में जकड़ा देखने की कल्पना ने एक क्रन्तिकारी पिता के ह्रदय को कमज़ोर कर दिया.   दि. 20  सितम्बर 1930 को ट्रिब्यूनल के सामने दी हुई अर्ज़ी में उन्होंने लिखा कि घटना वाले दिन तो भगत सिंह  कलकत्ता में थे और उन्होंने वहां से किसी रामलाल को एक पत्र भी लिखा था.  मैं उन लोगों को यहाँ सबूत के तौर पर पेश कर सकता हूँ... मुझे  न्याय के हित में अदालत में यह साबित करने का मौका ज़रूर दिया जाए... 
 
भगत सिंह को अपने समस्त जीवन में इस बात पर सदा गर्व रहा कि उन के पिता, उन के चाचा लोग,  ये सब क्रांतिकारी रहे और किसी भी प्रकार के परिणाम से कभी डरे ही नहीं.  फ़िर यह पुत्र मोह का कैसा फंदा है जो सच्चाई के गले में पड़ रहा है? एक क्रांतिकारी पिता अपने सुपत्र को बचाने के लिए अदालत में झूठ बुलवाना चाहते हैं.  उन्होंने पिता को बहुत अफ़सोस व आक्रोश भरा पत्र लिखा - आपको शुरू से ही पता है कि मुझे ख़ुद को बचाने में  कोई दिलचस्पी है ही नहीं.  मैंने राजनैतिक मामलों में स्वयं को हमेशा आप से स्वतंत्र रख कर ही कदम उठाए.  आप कितना कहते रहे,  मुक़दमे को गंभीरता से लड़ो,  पर चाहे मेरी वैचारिकता अपने आप में अस्पष्ट है, या मैं ख़ुद को सही ठहराने के लिए तर्क-बाज़ी  कर रहा हूँ,  मैंने इस मुक़दमे को कभी गंभीरता से लड़ना चाहा ही नहीं.  मेरा जीवन इस  कदर अनमोल है ही नहीं,  कम से कम मेरे लिए तो नहीं! (वही पुस्तक pp  80-81)
 
दि. 7 अक्टूबर 1930  को वह दर्दनाक फ़ैसला लिख दिया गया,  जिस ने भारत की तारीख के पन्नों पर ब्रिटिश के हाथों हुए खून से रंग दिया.  कानून की कई धाराएं होती हैं,  जिन का इस्तैमाल कानून करता ही है. पर अमानवीय तरीके से कानून को इस्तैमाल करने की यह एक अभूतपूर्व मिसाल थी.  भगत सिंह व उस के दो साथियों,  सुखदेव  तथा राजगुरु को कई धाराएं इस्तेमाल कर, यथा 121, 302 व 4(बी), मृत्युदंड की घोषणा कर दी गई .  पूरा देश एक सदमे की चपेट में आ गया.  जिन बहादुर नौजवानों को जनता सर आंखों बिठाना चाहती थी,  उन को अब मृत्यु का वरण करने की बात जनता के गले नहीं उतर पा रही थी.  मुक़दमे का फ़ैसला सुनते ही सब से ज़्यादा जिस नेता की छाती जोश व  आक्रोश  से भर उठी,  वे थे पंडित जवाहरलाल नेहरू.  दि. 12 अक्टूबर 1930  को इलाहाबाद में दिए आक्रोश भरे भाषण में वे कहते हैं -  'अगर इंग्लैंड पर जर्मनी या  रूस का हमला हो जाए,  तो क्या लार्ड इर्विन अपने जवानों को हिंसा से दूर रहने की सलाह देते फिरेंगे?..लार्ड इर्विन ज़रा अपने ह्रदय से पूछ कर देखें  कि यदि भगत सिंह अँगरेज़ होते, और इंग्लैंड की तरफ़ से क्रान्ति करते,  तब  कैसा महसूस होता उन्हें?'.. पर भगत सिंह के प्रति अतीव गर्व से नेहरू ने यह भी कहा 'मेरा ह्रदय भगत सिंह की बहादुरी व उत्सर्ग-भावना के प्रति प्रशंसा से सराबोर है...(The Trrial of Bhagat Singh: Politics of Justice by AG Noorani p 175).
 
सरदार पटेल ने ब्रिटिश की शेखियों का खोखलापन उजागर करते हुए कहा - 'अंग्रेज़ी क़ानून  हमेशा इस बात की शेखियां बघारता रहा, कि अदालत में बाकायदा प्रति-परीक्षण (cross-examination) के बिना कभी कोई फ़ैसला नहीं दिया जाता.  पर अंग्रेज़ी क़ानून ने ऐसा किया,  और अभियुक्तों को मृत्यु-दंड जैसी सज़ाएं मिली'  (वही पुस्तक p 228).  
 
ब्रिटिश की ही कम्युनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश की ही लेबर-पार्टी शासित  सरकार को आईना दिखा कर लिखा -  'इस मुक़दमे का इतिहास राजनैतिक दमन का  अद्वितीय दस्तावेज़ रहेगा और सर्वाधिक अमानवीय व क्रूर व्यवहार ही इस मुक़दमे की पहचान होगी,  जो कि ब्रिटिश की वर्त्तमान लेबर सरकार की इस इच्छा का  परिणाम है कि दमित लोगों के हृदयों में और दहशत फैलाई जाए...'
 
भगत सिंह ने दया की कोई अपील करने से इनकार कर दिया या उन्हें व सुखदेव तथा राजगुरु को अब एक ही कमरे में भेजा गया,  ये सब गौण बातें हैं. पर जो महत्वपूर्ण है,  वह यह  कि फांसी वाले उस कमरे में जाने से पूर्व सभी साथी उनसे रोते हुए गले मिले.  भगत सिंह ने अपने साथियों से यही कहा - 'साथियो, आज हम आखिरी बार मिल रहे हैं.  पर मेरा तुम सब को यही आखिरी संदेश  है, कि जब आप सब जेलों से जाएँ,  तो सुख-चैन की ज़िन्दगी बिताना न शुरू कर दें,  जब तक कि आप इस फिरंगी कौम को भारत  से बाहर न खदेड़ दें और देश में एक समाजवादी लोकतंत्र न स्थापित  कर दें (Shaheede Azam Sardar Bhagat Singh: The Man and His Ideology by GS Deol p 86).
 
वैसे केवल ब्रिटिश का पर्दाफाश करने के  लिए  ब्रिटिश की Privy  council में एक अपील इस फैसले के विरुद्ध की गई,  पर वह Privy  council ने  10 फरवरी 1931 को खारिज  कर दी.  दि. 3 मार्च 1931  को आखिरी बार भगत सिंह का परिवार  उन से मिलने गया - पिता माता, भाई बहनें.  उनकी दादी ने उनके  जन्म से ही जो नाम उन्हें  दिया,  'भागांवाला', उस भागांवाला को उनकी माँ आखिरी बार अपने सीने से लगा कर रो पड़ीं...पर भारत माँ के लिए वह सचमुच  'भागांवाला' ही था,  जिस की प्रेरणा से देश के जवानों के मन  में आज़ादी की ज्वाला भड़क उठी थी...
 
माँ ने बेटे से कहा भी यही - 'बेटे, अपना रास्ता छोड़ना मत.   जाना तो एक दिन हर किसी को है.  लेकिन तेरा जाना तो वो है बेटे,  जिसे सारी दुनिया याद रखेगी.  मेरी एक ही इच्छा है बेटे, कि मौत को गले लगाते वक़्त भी मेरा बहादुर बेटा नारे लगाए-
 
इन्कलाब जिंदाबाद.
 
दि. 14 फरवरी 1931 को पंडित मदन मोहन मालवीय ने वायसराय को  दया की अपील में एक अर्ज़ी दी कि इन तीनों देश-भक्तों के  मृत्यु दंड को माफ़ कर के उम्र-कैद में बदला जाए.  16 फरवरी 1931 को किन्हीं जीवन लाल, बलजीत व शामलाल ने पंजाब उच्च-न्यायालय में अर्ज़ी दी, कि फांसी की तारिख  अक्टूबर की तय हुई थी,  वह कब की बीत चुकी और अब गठन के नियमों के अनुसार ट्रिब्यूनल का अस्तित्व ही नहीं है,  इसलिए अब मृत्यु-दंड देने का अधिकार किसी को भी नहीं है.  पर 20 फरवरी 1931 को वह अर्ज़ी भी खारिज हो गई..
 
इस के बाद देश की जनता लाखों की तादाद में सड़कों पर उतर आई.  जनता का वह जूनून भी इतिहास के पन्नों का एक जोशीला पन्ना है.  लाखों लोगों के ह्रदय भगत सिंह व उन के साथियों के प्रति श्रद्धा और सम्मान से भर उठे.  लाखों लोगों ने हस्ताक्षर कर के वायसराय को लिखा कि इन तीनों जवानों  ने  देश के लिए अपनी ज़िन्दगी होम कर दी,  अब इन्हें मृत्यु दंड क्यों?  देश-विदेश के अख़बारों के पृष्ठ-दर-पृष्ठ लेखों व अपीलों  से भरे थे,  यहाँ तक कि ब्रिटिश की अपनी संसद के कई सदस्यों ने  एक तार भेज कर  सरकार से अपील की कि यह फ़ैसला रोक दिया जाए.  इस के साथ पूरे देश की भावनाएं जुड़ी  हैं.  देश की दीवारें पोस्टरों से भर गई.  पर...
 
आज 23 मार्च है.  शाम सात बजे शहादत का सुनहला पन्ना लिखा जाना है. शहादत की स्याही से ये तीनों नौजवान भारत का सुनहला इतिहास लिखेंगे... भगत सिंह ने गवर्नर    को एक पत्र लिखा था कि  मुक़दमे के अनुसार हम सब ने मिल कर इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम के विरुद्ध एक जंग  छेड़ रखा है.  इस दृष्टि से हम तीनों योद्धा हैं.  इस लिए हम युद्ध-बंदी हैं.  इस लिए हमें फांसी के तख्ते पर चढ़ाने  की बजाय गोली से उड़ा दिया जाए!  यदि ऐसा होता तो भगत सिंह व उस के साथी नायक-महानायक की शहादत को हासिल होते न!  पर सरकार इनके इतने ऊंचे दर्जे को क्या सहन कर पाती!... 
 
अक्सर जब मेरी कल्पना में  यह दृश्य आता है, कि ये तीनों बहादुर जवान  जेल की कोठरी से निकल कर मृत्यु के फंदे  की तरफ़ बढ़ रहे हैं, और नारे लगाते हैं:
 
इन्कलाब जिंदाबाद,
 
जेल के सभी कमरों के कैदियों को यह पता चल जाता है कि अब शहादत की वह घड़ी आ गई है,  जब हमारे ये तीनों साथी हम से बिछड़ जाएंगे, और सब के सब कैदी भी जेल की दीवारों को दहला देने वाली आवाज़ में नारे लगाते हैं:
 
इन्कलाब जिंदाबाद,
 
तब मुझे  बिस्मिल की दूसरी मशहूर ग़ज़ल याद आती है -
 
उरूज़े-कामयाबी पर कभी हिन्दोस्ताँ  होगा 
रिहा सैय्याद के हाथों से अपना गुलिस्ताँ होगा.
(उरूज़े कामयाबी = कामयाबी का शिखर
 
यही इन तीनों का सपना था, कि देश कामयाबी के आसमान को छुए...
 
भगत सिंह ने 3 मार्च 1931 अपने भाई कुलतार को एक पत्र लिख कर उस की हिम्मत बढ़ाई थी कि अपना ख्याल रखना मेरे भाई.  उन्होंने जीवन की नश्वरता को ले कर भाई को लिखा:
 
मेरी हवा में रहेगी ख़याल की खुशबू
ये मुश्ते-ख़ाक है फानी, रहे न रहे
(The Trrial of Bhagat Singh: Politics of Justice by AG Noorani p 231).
 

 
यह जो शरीर है, यह तो एक मिट्टी का ढेला है , यह रहे न रहे.  पर हवा में मेरे विचारों की सुगंध बनी रहेगी!
 
इसी पत्र में भगत सिंह ने अपने भाई को एक और शेर की केवल दूसरी  पंक्ति लिखी, पहली नहीं:
 
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं.
(वही पुस्तक वही पृष्ठ)
 
यह शेर दर-असल अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने उस समय अपने आलीशान महल की तरफ़ देख कर कहा था,  जब अंग्रेज़ों की गोरी पलटन उसे गिरफ्तार करने आई थी.  वाजिद अली शाह ने एक गहरी साँस ले कर अपने महल को देखा  और कहा:
 
दरो-दीवार पे हसरत की नज़र रखते हैं,
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं
 
भगत सिंह के मन में भारत-माता के चरणों में सर-फरोशी (अपना सर कुर्बान करने) के बाद कोई हसरत थी ही नहीं,  सो उन्होंने पहली पंक्ती लिखी ही नहीं.  पर मुझे लगता है, जब इन तीनों बहादुरों के चेहरे ढके जा रहे होंगे, और येइन्कलाब जिंदाबाद के नारे लगाते लगाते आँखें मूँद रहे होंगे, तब मृत्यु की कालिमा छा जाने के अन्तिम क्षण भी इन तीनों के मन में यही हसरत होगी:
 
जुदा मत हो मेरे दिल से कभी दर्दे-वतन हरगिज़ 
न जाने बाद मर्दन मैं कहाँ और तू कहाँ होगा.
(मर्दन = मृत्यु)
 
जीवन के अन्तिम क्षण के हज़ारवें हिस्से तक में भी मातृभूमि से प्यार बना रहे,  यही थी उन की हसरत! 
बिस्मिल आगे लिखते हैं:
 
ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ खंजरे-कातिल
बता कब फ़ैसला उन के हमारे दरमियाँ होगा
 
वतन  की आबरू का पास देखें कौन करता है,
सुना है आज मकतल पर हमारा इम्तिहाँ होगा
 
देशकी करोड़ों जनता का उस समय हृदय   भी छलनी हो गया होगा, और सब की छाती गर्व से फूल भी रही होगी, ऐसे अनमोल सपूत पा कर, जो सदियों सदियों तक चराग ले कर ढूँढने पर भी नहीं मिलेंगे...
 
इस लेख-माला के अंत में भी  बिस्मिल का ही एक शेर याद आ रहा  है:
 
शहीदों के मज़ारों पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पे मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा...
 
जय हिंद
वंदे मातरम्
 
(अब  इस लेख-माला के परिशिष्ट के रूप में  गाँधी की निर्दोषिता पर चंद शब्द,  जो अगली बार.  आख़िर  गाँधी  का क्यों कोसा जाता है,  कि  उन्होंने इन तीनों को फांसी के तख्ते से बचाने की कोई कोशिश ही नहीं की? क्या सचमुच, गाँधी को कटघरे में खड़ा करना उचित है? या इस में भी अधिक खोज-बीन की ज़रूरत है? यह सब अगली बार.
 

Thursday, March 05, 2009

खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद ....

हिन्द-युग्म के प्रेमचंद्र सहजवाला पिछले ६ महीने से भगत सिंह की जीवनी और उनसे जुड़े दस्तावेजों पर पुनर्विचार कर रहे हैं तथा इंटरनेट के पाठकों के लिए हिन्दी में छोटे-छोटे आलेखों के रूप में जानकारियाँ दे रहे हैं। अब तक इस शृंखला क १० कड़िया प्रकाशित हो चुकी हैं। आज पढ़िए ११वीं कड़ी॰॰॰


पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

  10. अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

इस लेख माला में यह पहले ही कहा गया है कि तत्कालीन कानून के अनुसार यदि कोई अभियुक्त अदालत में प्रस्तुत ही न हो, तो अदालत मुक़दमे को आगे नहीं बढ़ा सकती, जब तक कि अअभियुक्त का कोई वकील न हो. इन नौजवानों की भूख हड़ताल ने और इस कारण उनके अदालत में सर्वथा अनुपस्थित रहने ने ब्रिटिश को सचमुच एक धर्म-संकट में डाल दिया था. भूख हड़ताली अदालत में आते नहीं थे और न ही अपना कोई वकील करने को तैयार थे. इस धर्मसंकट से उबरने के लिए ब्रिटिश महारानी की तरफ़ से उच्च न्यायालय में एक अर्ज़ी रखी गई, कि अभियुक्तों की मर्ज़ी के खिलाफ सही, अदालत को उनकी तरफ़ से एक बचाव-पक्ष वकील नियुक्त करने की अनुमति दी जाए. पर उच्च न्यायालय ने अदालत को और भी मुश्किल में डाल दिया, उस अर्ज़ी को खारिज कर के. अब सरकार खिसियानी बिल्ली सी बन चुकी थी. सब से बड़ा अफ़सोस यह था कि सरकार न तो इन क्रांतिकारी नौजवानों को राजनैतिक कैदी का दर्जा देना को तैयार थी, और न ही उनकी किसी भी मांग को स्वीकार करने को तैयार थी. इस पर भी तुर्रा यह कि हम यहाँ अपनी अदालतों में न्याय करने ही तो बैठे हैं, यह दुनिया को दिखा दें. इस खिसियानी बिल्ली के पास अब एक और पंजा बचा था. वह था कि क़ानून में ही कोई संशोधन कर दो. और सितम्बर 1929 में एक दिन सदन की हालत विचित्र थी. ब्रिटिश की तरफ़ से गृह-सदस्य सर जेम्स क्रेरार एक निर्लज्ज से संशोधन का बिल प्रस्तुत करने को खड़े थे. उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि जब बिल पर चर्चा होगी और मतदान होगा, तब सदन के विभिन्न सदस्य उनकी क्या गत करने वाले हैं. सर क्रेरार ने Code of Criminal Procedure (संशोधन) बिल सदन में रखा, जिस में प्रचलित कानून में एक नई संहिता S-540 B जुड़नी थी. इस के अनुसार:

'यदि किसी भी अभियुक्त ने स्वेच्छा से स्वयं को अदालत में प्रस्तुत होने के अयोग्य बना दिया है, तो जज या मजिस्ट्रेट उस अभियुक्त की अनुपस्थिति को दरगुज़र कर के अपनी जांच व अभियुक्त पर मुकदमा जारी रख सकता है, चाहे उस अभियुक्त का प्रतिनिधित्व कोई वकील कर रहा हो या नहीं...'

जबकि क़ानून के पास तो S-540-A के रूप में पहले से यह प्रावधान था कि:

यदि किसी अभियुक्त का प्रतिनिधित्व कोई वकील कर रहा है, और अभियुक्त ने स्वयं को अदालत में प्रस्तुत करने में अक्षम कर दिया है, तब अदालत उस की अनुपस्थिति को दरगुज़र कर सकती है, बशर्ते कि अभियुक्त ने कोई वकील कर रखा हो. और यदि उस का प्रतिनिधित्व कोई नहीं कर रहा तो अदालत मुक़दमे को फिलहाल मुल्तवी रखे. अदालत किसी भी हालत में अभियुक्त की अनुपस्थिति में मुकदमा नहीं चला सकती.

सदन में क्रेरार महोदय निर्लज्जता से ही कहे जा रहे हैं कि 'सदन के गणमान्य सदस्यों के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है, कि क्या सचमुच सरकार के पास इस विकट परिस्थिति से उबरने का कोई इलाज नहीं था? क्या सरकार इन सभी अभियुक्तों को राजनैतिक कैदी मान कर उन की मांगों को पूरा नहीं कर सकती थी? मैं यह ईमानदारी से बता देना चाहता हूँ कि सरकार ने परिस्थिति की विकटता से मुक्ति पाने की भरपूर कोशिश की थी, परन्तु पंजाब सरकार ने न केवल इन अभियुक्तों को राजनैतिक कैदी मानने से इनकार कर दिया, वरन इन की एक भी मांग को मानने से भी पंजाब सरकार मुकर गई' (pp 77-78 The Trial of Bhagat Singh - Politics of Justice by AG Noorani). अपने संशोधन बिल का बिगुल बजाते हुए गृह सचिव एमरसन ने एक ऐसी बात कह दी कि सदन आक्रोश से भर उठा और सदस्य आक्रोश के मारे शोर मचाने लगे. एमरसन ने कहा कि कानून कैदियों की नस्ल भी देखता है. कि कैदी योरपीय है कि भारतीय. उस का रहन-सहन यदि योरापियों जैसा है तो भी उसे योरापियों के बराबर रखा जा सकता है. एमरसन ने यह भी कहा कि यदि भारतीय और योरपीय कैदियों को एक साथ रखा जाए तो प्रतिवर्ष सरकार का खर्चा 40 लाख के करीब अधिक हो जाएगा. जिस कौम के गवर्नर प्रारम्भ में अपनी ही सरकार को ख़त लिखते रहे कि यह बहुत विचित्र देश है, जातिवाद से पीड़ित है, अपढ़ सा है, उसी कौम के एक गृह-सचिव आज सदन को नस्लवाद का मन्त्र बता रहे थे, शायद इस से अधिक शर्मनाक बात भारत के ब्रिटिश-कालीन इतिहास में कोई और हो ही नहीं सकती थी.

इस बिल पर जो बहस हुई, उस में मोतीलाल नेहरू व मदन मोहन मालवीय ने तो ब्रिटिश सरकार को खूब लताड़ा फटकारा ही, पर आश्चर्य कि जिस नेता ने इस बिल को ले कर एक प्रकार से गृह-सदस्य व गृह-सचिव की चमड़ी उधेड़ कर रख दी, वे थे मोहम्मद अली जिन्ना. जिन्ना बहुत ऊंचे स्तर के बैरिस्टर थे. संविधान का अक्षरशः अनुसरण करना ही उनका उस समय मज़हब था. संविधान को क्षति पहुँचते समय शेर की तरह गरजना उन की शख्सियत का एक अहम् हिस्सा था. संवैधानिक तरीके से काम करना उन की दुखती रग थी. इस पर शुक्र कि उस समय तक उन के सर पर पाकिस्तान बनाने का भूत सवार नहीं हुआ था. पाकिस्तान का सपना उन्होंने सन 1937 के चुनावों में बुरी तरह हारने के बाद ही देखना शुरू किया था. तब तक वे कांग्रेस छोड़ कर पूर्णतः मुस्लिम लीग के हो कर रह गए थे और मुस्लिम समुदाय के एकमात्र प्रतिनिधि होने की गलतफहमी में जीते थे, जब कि सन् '37 के प्रादेशिक चुनाव में उन की पार्टी को केवल 4.5 % वोट मिले थे. इस सदमे की प्रतिक्रिया अस्वस्थ रूप से सामने आयी थी और देश ने विभाजन जैसी दर्दनाक चोट सही थी.

इस समय सदन में अध्यक्ष पद पर आसीन थे विट्ठल भाई पटेल और जिन्ना गरज रहे थे:

'जो व्यक्ति भूख हड़ताल पर जाता है, उसके पास एक आत्मा होती है. वह उस आत्मा द्वारा संचालित होता है और वह अपने मक्सद के प्रति न्याय में विश्वास करता है... सरकार न्याय के मूल अधिकारों का बलिदान करना चाहती है और धोखे का सृजन करने के लिए चाहती है कि सदन इस सरज़मीन का क़ानून ही बदल दे (p 76 The Trial of Bhagat Singh - Politics of Justice by AG Noorani).

जिन्ना ने स्पष्ट किया कि गृह सचिव महोदय ने यह फरमाया है कि मुमकिन है कि माननीय सांसदों को अभियुक्तों से सहानुभूति हो. मैं यह कहना चाहूंगा कि मुझे अभियुक्तों से केवल इस सीमा तक सहानुभूति है कि वे सरकारी तंत्र के शिकार हो गए हैं, जिस का अर्थ यह नहीं कि मैं उन के अपराध का समर्थन करता हूँ. जिन्ना ने गृह सचिव की खिल्ली से उड़ाते कहा कि सचिव महोदय ने योरपीय होने की परिभाषा देते हुए कहा है कि यदि कोई टोपी पहनता है, तो कम से कम जेल के शब्दकोष में वह योरपीय ही है. पर भगत सिंह की जीवन शैली से तो यही दिखता है कि वे योरपीय हैं, क्यों कि वे तो हैट भी पहनते हैं और बरमूडा भी. बटुकेश्वर दत्त भी टोपी पहनते हैं. जिन्ना ने पंजाब सरकार को लताड़ते हुए कहा कि यदि सरकार के पास मस्तिष्क होता, तो इस समस्या का समाधान कब का कर चुकी होती. पर सरकार की मनःस्थिति कुछ इस प्रकार की रही होगी कि हम तुम अभियुक्तों पर मुकदमा भी चलाएंगे, और देखेंगे कि या तो तुम फांसी के तख्ते पर झूल जाओ या फ़िर उम्र भर के लिए देश निकला दे दिया जाए, पर जब तक तुम हमारी जेल में हो, हम तुम्हारे साथ सभ्य व्यहवार कतई नहीं करेंगे. जिन्ना ने अपनी सशक्त वकीलाना भाषा के शस्त्र से सरकार की आँखों में घूरता सा एक सवाल भी दागा : ' Do you wish to prosecute them, or persecute them (क्या आप इन पर अभियोग चलाना चाहते हैं, या अत्याचार करना चाहते हैं?). जिन्ना ने चेतावनी दी कि यह बिल पारित करने के बाद मैजिस्ट्रेट के सामने सारा मुकदमा एक तरफा हो जाएगा, क्यो कि अभियुक्त अपनी सफाई में कुछ कह ही नहीं पाएंगे. क्या यह एक बहुत बड़ा धोखा नहीं होगा?...मैं माननीय सदस्य से कहना चाहूँगा कि इस प्रकार भूख हड़ताल द्वारा मृत्यु की तरफ़ जाना हर किसी के बस का रोग नहीं है. यदि विश्वास नहीं तो थोड़ी सी कोशिश ही कर के देख लीजिये.. 'जो व्यक्ति भूख हड़ताल पर जाता है, उसके पास एक आत्मा होती है...' जिन्ना ने भाषण में जो सब से महत्वपूर्ण बात कही, वह यह कि कोई भी जज या मैजिस्ट्रेट जिसे ज़रा सी न्याय बुद्धि हो, वह अपने विवेक में ज़रा भी झटका महसूस किए बिना इस प्रकार का मुकदमा नहीं चला सकता या मुकदमा चला कर मृत्यु दंड नहीं दे सकता... जिन्ना ने तो सरकार के मुक़दमे की भी खिल्ली उड़ा कर कहा कि क्या कोई ऐसा भी मुकदमा है, जिस के लिए सरकारों को छः सौ गवाह प्रस्तुत करने पड़ रहे हैं. यह तो सचमुच एक बहुत बड़ा चुटकुला सा हुआ न... ((pp 81-82 वही पुस्तक). पंडित मोती लाल नेहरू ने अपने भाषण में एक महत्वपूर्ण बात कही कि उन के मन में उस व्यक्ति के लिए ज़रा भी सम्मान नहीं हो सकता, जिस पर चोरी या गबन का इल्ज़ाम साबित हो चुका है, परन्तु उन के मन में उस व्यक्ति के लिए पूरा सम्मान है, जिस ने जो किया, मन में यह पूर्ण विश्वास रख कर किया कि वह यह सब देश के लिए कर रहा है, भले ही उस ने जो किया, वह दिग्भ्रमित हो कर किया हो, भले ही जो उस ने किया वह वे स्वयं कभी न करें...' (p 93 वही पुस्तक). एक सदस्य जयाकर ने भी सभी क्रांतिकारियों की शान में प्रशंसा करते हुए कहा कि सदन में कुछ सदस्यों ने तो यह प्रामाणित करने की भी कोशिश की कि ये नौजवान, जिन में से कुछ तो बहुत ऊंचे हौसले वाले हैं, जो कुछ कर रहे हैं, वह अपने निजी स्वार्थ के लिए कर रहे हैं. पर क्या मुझे यह कहने की इजाज़त मिलेगी कि यदि भारत एक आज़ाद देश होता, तो इन में से ही कई नौजवान देश के जहाज़ों में कप्तान बनते, या सेना के कमांडर!' (pp 93-94 वही पुस्तक).

इस बिल को औधे मुंह गिरना था, सो गिरा. पर क्या सरकार ने अपना दृष्टिकोण बदला? क्या इन सभी बहादुर नौजवानों को राजनैतिक कैदी का दर्जा मिला? नहीं. जबकि ये तो अपनी मातृभूमि के वे सपूत थे, जिन के बारे में बिस्मिल की गज़ल कहती है:

खींच लाई है सभी को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ऐ-कातिल कातिल में है


पर सरकार का अगला कदम क्या था, और कैसे इन देश-भक्त जाँबाजों के मुकदमों के फैसले कर दिए गए, यह भी ब्रिटिश की निर्लज्ज तानाशाही की एक और ज़िंदा मिसाल थी, है, जिस के बारे में अगली बार.

Tuesday, January 06, 2009

अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़

शहीद भगत सिंह की जीवनी पर बहुत सारे शोध हुए, बहुत से शोध-ग्रंध लिखे गये। प्रेमचंद सजवाला, जो एक वरिष्ठ साहित्यकार तथा विचारक हैं, ने इन सभी शोध पुस्तकों पर रिसर्च किया और शहीद-ए-आज़म की जीवनी को संक्षिप्त रूप में इंटरनेटीय पाठकों के लिए दुबारा लिखा। इस शृंखला की पिछली ९ कड़ियों का प्रकाशन हिन्द-युग्म की कविता पृष्ठ पर हो चुका है। पिछले महीने से हमने विचारों का एक नया मंच शुरू किया। अतः अब से यह शृंखला यहीं प्रकाशित हुआ करेगी---


पिछली कड़ियाँ
  1. ऐ शहीदे मुल्को-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार

  2. आशिकों का आज जमघट कूच-ए-कातिल में है

  3. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (1)

  4. क्या तमन्ना-ऐ- शहादत भी किसी के दिल में है (2)

  5. देखना है ज़ोर कितना बाज़ू ए कातिल में है...

  6. सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

  7. हम अभी से क्या बताएं क्या हमारे दिल में है...

  8. रहबरे राहे मुहब्बत रह न जाना राह में...

  9. लज्ज़ते सहरा-नवर्दी दूरिये - मंजिल में है

दिनांक 5 जुलाई 1929 को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस सचिव की हैसियत से प्रेस को एक वक्तव्य दिया- 'मैंने बहुत दुःख से भगत सिंह व दत्त की भूख हड़ताल का समाचार सुना है। पिछले 20 या अधिक दिनों से उन्होंने कुछ भी खाने से स्वयं को दूर रखा है। मुझे पता चला है कि ज़बरदस्ती भी खाना खिलाया जा रहा है... ऐसे, स्वेच्छा से अपनाए कष्ट के समय हम सब के हृदय उनकी तरफ़ उमड़ते हैं। वे अपने किसी स्वार्थ के लिए अनशन पर नहीं हैं, वरन राजनैतिक कैदियों की स्थिति सुधारने के लिए ऐसा कर रहे हैं। जैसे-जैसे दिन गुज़रते हैं, हम इस कठिन परीक्षा को बेहद उत्तेजना से देखते रहेंगे और मन में उत्कट इच्छा रखेंगे कि हमारे ये दोनों बहादुर भाई इस अग्नि-परीक्षा में सफल हों (The Trial of Bhagat Singh by AG Noorani pp 51-52)

भगत सिंह को लगभग 25 जून 1929 को मिआंवाली जेल से लाहौर सेंट्रल जेल भेजा गया था, जहाँ बटुकेश्वर दत्त पहले ही से थे. दत्त भी तुंरत भूख हड़ताल पर चले गए थे और एक वैसा ही पत्र ब्रिटिश को ठोक दिया था। दिनांक 10 जुलाई 1929 को विशेष मजिस्ट्रेट राय साहेब पंडित श्री किशन की अदालत में, लाहौर सेंट्रल जेल में ही भगत सिंह व साथियों पर सांडर्स हत्या का मुकदमा शुरू हुआ। इसे 'लाहौर षड्यंत्र केस' कहा गया। भगत सिंह व दत्त के अन्य साथी यथा सुखदेव, जतिंदर नाथ दास, अजय घोष, शिव वर्मा, गया प्रशाद, राजगुरु, बीके सिन्हा आदि लाहौर की बोर्स्टल जेल में थे. इन तमाम साथियों ने भी भूख हड़ताल प्रारम्भ कर दी। इस कठिन संघर्ष में भगत सिंह समेत सब के वज़न कम होते गए। पर इन सभी जांबाज़ जवानों को तो अग्नि-परीक्षा में कदम दर कदम एक दूसरे के साथ रहना था। इन्हें मृत्यु तक नहीं डरा सकती थी, वज़न कम होना तो इनके लिए नगण्य सी बात थी। इन फौलादी पुरुषों पर तो बिस्मिल का यह शेर ही अक्षरशः लागू होता था:

अब न अहले-वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मर मिटने की हसरत ही दिल-ए-बिस्मिल में है.


मुक़दमे में ब्रिटिश की तरफ़ से सरकारी प्रोसीकयूटर खान साहेब कलंदर अली खान के साथ महारानी के प्रतिनिधि सी एच कार्डन नोड थे, तथा अभियुक्त पक्ष में कई वकील थे, यथा लाला दुनीचंद, मलिक बरकत अली, मेहता अमीन चंद, मेहता पूरण चंद, लाला अमरनाथ, बशीर अहमद, बलजीत सिंह, लाला बिशन नाथ, अमोलक राम कपूर आदि।

विशेष मजिस्ट्रेट ने सब से पहले तो आदेश निकाला कि ये सब क्रांतिकारी अदालत में देश-भक्ति के नारे लगाते हुए न आएं। इस पर लाला दुनीचंद ने आपत्ति जतायी कि यह आदेश मजिस्ट्रेट को दरअसल सरकारी प्रोसीक्यूटर ने लिखवाया है। मजिस्ट्रेट इस बात से इनकार कर गए. पर लाला दुनीचंद ने फ़िर अदालत को यह आश्वासन दिया कि वे अभियुक्त नौजवानों से कह देंगे कि वे नारे न लगाएं। अदालत और लाला दुनीचंद के बीच एक और झड़प यह हुई कि यह मुकदमा जेल में चलाया जा रहा है, जहाँ कि कमरा बहुत छोटा है और अदालत में जनता के अन्य लोगों को आने में बहुत कठिन प्रक्रिया के बाद ही अनुमति मिलती है। अदालत ने गुस्से में पूछा कि क्या हम यहाँ सारे शहर को बुला लें? लाला दुनीचंद ने अदालत को ठंडा करते कहा कि यथा-सम्भव अधिक से अधिक लोग आ सकें तो अच्छा। अदालत ने इतना ही किया कि अनुमति के कायदे कानूनों में कुछ ढील दे दी। इधर सरकारी वकील ने अपनी मुश्किल पेश कर दी, कि कुछ लोग यहाँ अदालत में आ कर अभियुक्तों को पुष्प भेंट करने लगते हैं। अभियुक्त वकील मेहता अमीन चंद ने शिकायत की कि जेल के बाहर कार-पार्किंग में भी भेदभाव बरता जाता है। कुल मिला कर ब्रिटिश की व्यवस्था असुविधाजनक ही थी और ब्रिटिश तो केवल अभियुक्तों को सज़ा देने पर तुली हुई थी।

भूख हड़ताल को समाप्त करने के भी ब्रिटिश ने अजीब से हथकंडे अपनाए। इन बहादुर नौजवानों को पहलवानों की मदद से ज़मीन पर लिटा कर ट्यूब के ज़रिये ज़बरदस्ती खाना ठूँसा जाता था। जेलर ने एक और तरीका अपनाया। उसने पानी के सभी मटकों में दूध भरवा दिया कि इन ज़िद्दी लड़कों को जब प्यास लगे तो दूध पीना ही पड़े। पर ये फौलादी लड़के टस से मस न हुए। क्रांतिकारी अजय घोष ने अपनी पुस्तक 'Bhagat Singh and His Comrades' में लिखा है कि एक क्रांतिकारी किशोरी ने तो लाल मिर्ची निगल ली और उबलता पानी पी लिया ताकि गला सूझ जाए और कितनी भी ज़बरदस्ती से खाना ठूँसा जाए, तो वह फफोलों के कारण बाहर आ जाए। ब्रिटिश यह सब देखने को तैयार थी, पर इनकी मांगों को मानने को नहीं। यही इस फिरंगी कौम का चलन था, यही उसकी असलियत। भगत सिंह समेत सभी साथी शारीरिक दृष्टि से दुर्बल हो चुके थे, पर उन्हें फिर भी अदालत तक हथकड़ियों में ले जाया जाता था। एक दिन भगत सिंह को स्ट्रेचर पर लिटा कर अदालत ले जाया जा रहा था। अदालत पहुँचते ही भगत सिंह हथकड़ियों में जकडे खड़े हो गए और मजिस्ट्रेट पर गरजने लगे - 'मजिस्ट्रेट साहेब, पुलिस वालों द्वारा हथकड़ियाँ पहनाया जाना हमारा अपमान है। आप को इन पुलिस वालों के हुक्म का गुलाम नहीं होना चाहिए... हमें आप पर कोई विश्वास नहीं है, क्योंकि आप पूरी तरह पुलिस के नियंत्रण में हैं। इस प्रकार हथकड़ियों में हम एक दूसरे से बातचीत कैसे करें, या कुछ नोट करना हो तो कैसे करें?...

पर भूख हड़ताल के इस पूरे प्रकरण का सब से दर्दनाक पन्ना है, क्रन्तिकारी जतीन्द्र नाथ दास की शहादत। इन सब नौजवानों के लिए देश के लिए जान देना मानो एक पर्व की तरह था।

दिनांक 15 जुलाई को जेल सुप्रिंटेन्डेंट ने आई.जी (कारावास) को एक रिपोर्ट भेजी कि 14 जुलाई को भगत सिंह व दत्त को विशेष भोजन प्रस्तुत किया गया था, क्यों कि आई.जी (कारावास) ने ऐसा आदेश टेलीफोन पर दिया था। पर भगत सिंह ने उन्हें बताया कि वे विशेष भोजन तब तक स्वीकार न करेंगे, जब तक विशेष डाइट का वह मानदंड सरकारी गज़ट में प्रकाशित न किया जाएगा कि यह मानदंड सभी कैदियों के लिए है।

इस भूख हड़ताल में जतिन दास की स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही थी। भगत सिंह साथियों से सलाह लेने के बहाने बोर्स्टल जेल जा कर सभी साथियों के स्वस्थ्य का समाचार पूछ लिया करते थे। उन्हें कभी नहीं लगता था कि वे अकेले हैं, बल्कि देश-भक्ति की एक ज्वाला थी, जो सब को सम्पूर्ण रूप से जोड़े रहती थी। इधर चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि दास की स्थिति बहुत चिंताजनक है। वे दवाई लेने तक से इनकार कर रहे हैं। एक डॉ. गोपीचंद ने दास से पूछा भी- आप दवाई तथा पानी क्यों नहीं ले रहे?

दास ने निर्भीक उत्तर दिया - मैं देश के लिए मरना चाहता हूँ... और कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए।

21 अगस्त को कांग्रेस के एक अन्य देशभक्त नेता बाबू पुरुषोत्तम दास टंडन ने दास को बहुत मनाया- दवाई ले लो। सिर्फ़ जीवित रहने के लिए। भले ही भूख हड़ताल न तोड़ो। मेरे कहने पर सिर्फ़ एक बार प्रयोग के तौर पर दवा ले लो, और पन्द्रह दिन तक देखो। अगर तुम्हारी मांगें नहीं मानी जाती, तो दवाई छोड़ देना।

दास ने कहा - मुझे इस सरकार में कोई आस्था नहीं है। मैं अपनी इच्छा-शक्ति से जी सकता हूँ। भगत सिंह ने दबाव डालना जारी रखा। इस पर दास ने केवल दो शर्तों पर दवाई लेना स्वीकार किया, कि दवाई डॉ. गोपीचंद ही देंगे। और कि भगत सिंह दोबारा ऐसा आग्रह नहीं करेंगे। (Shaheed-e-Azam Sardar Bhagat Singh: The Man and His Ideology by GS Deol pp 67-68).

26 अगस्त को चिकित्सा अधिकारी ने रिपोर्ट दी कि दास की स्थिति अत्यन्त शोचनीय हो गई है। वे शरीर के निचले अंगों को हिला डुला नहीं सकते। बातचीत नहीं कर सकते, केवल फुसफुसा रहे हैं। और 4 सितम्बर को उनकी नब्ज़ को कमज़ोर व अनियमित बताया गया, उल्टियाँ हुई। 9 को नब्ज़ बेहद तेज़ हो गई। 12 को उल्टी हुई, नब्ज़ अनियमित... 13 सितम्बर, अपने अनशन के ठीक चौंसठवें दिन, दोपहर एक बज कर दस मिनट पर इस बहादुर सपूत ने भारत माँ की शरण में अपने प्राणों की आहुति दे कर इतिहास के एक पन्ने को अपने बलिदान से लिख डाला।

इस युवा देव-पुरूष के अन्तिम शब्द थे - मैं बंगाली नहीं हूँ। मैं भारतवासी हूँ।

जी एस देओल ऊपर संदर्भित पुस्तक में जतिन दास की शहादत पर लिखते हैं -'ब्रिटिश के लिए ईसा मसीह भी शायद एक भूली-बिसरी कथा थे'।

जिस प्रकार यीशु सत्य की राह पर सूली चढ़ गए, जतिन दास सत्य के लिए युद्ध करते करते शहीद हो गए।

विशाल भारत की तरह आयरलैंड जैसे छोटे-छोटे देश भी ब्रिटिश की पराधीनता का अभिशाप सह चुके थे। आयरलैंड के ही एक क्रांतिकारी युवा पुरूष टेरेंस मैकस्विनी ने भी जतिन दास की तरह ही शहादत दी थी। जतिन दास के जाने की ख़बर विश्व के अखबारों में छपी थी। इसे पढ़ कर मैकस्विनी की बहादुर पत्नी ने एक तार भेज कर लिखा - टेरेंस मैकस्विनी का परिवार इस दुःख तथा गर्व की घड़ी में सभी बहादुर भारतवासियों के साथ है। आज़ादी आएगी।

जेल के बाहर कई कांग्रेसी नेताओं के नेतृत्व में असंख्य भीड़ जमा थी।

जतिन दास जिंदाबाद ... इन्किलाब जिंदाबाद के नारों से आसमान गूँज उठा। सुभाष चन्द्र बोस ने देश के इस सपूत को अपना सलाम भेजा। जतिन दास को पूरा देश नमन कर रहा था। अख़बार श्रद्धांजलियों से भरे थे। जतिन दास के भाई के.सी दास ने अपने भाई का पार्थिव शरीर प्राप्त किया जिसे लाहौर में एक भारी जुलूस के बीच कई जगहों से होते हुए रेलवे स्टेशन तक लाया गया। लाखों लोगों की आंखों में आंसू थे। आसमान फिर उन्हीं देश-भक्ति से ओत-प्रोत नारों से गूंजा था।

जतिन दास जिंदाबाद ... इन्किलाब जिंदाबाद

लाहौर स्टेशन से जतिन दास के पार्थिव शरीर को एक रेलगाड़ी में हावड़ा भेजा गया।

ठीक अगले दिन असेम्बली में मोती लाल नेहरू ब्रिटिश पर गरज रहे थे। अपने भाषण में उन्होंने कैदियों के साथ हुए बुरे बर्ताव पर ब्रिटिश को खूब लताड़ा। उन्होंने सरकार के रवैय्ये को बेहद अमानवीय बताया। पंडित मदन मोहन मालवीय ने भी व्यंग्य बाणों से ब्रिटिश के निर्मम चेहरे को छलनी सा कर दिया। सभी क्रांतिकारियों के चरित्र की उन्होंने भरपूर प्रशंसा की और कुछ सदस्यों ने ब्रिटिश पर जतिन दास की हत्या का आरोप लगाया...

क्रमशः॰॰॰॰

प्रेमचंद सहजवाला