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Sunday, April 26, 2009

किसानों के साथ भेदभाव

हालांकि सरकार दावा करती है कि वह किसानों की हमदर्द है और उसके हितों की रक्षा करती है लेकिन उत्तर प्रदेश के गेहूं उत्पादक किसानों के बारे में सरकार का यह दावा गलत साबित हो रहा है। सरकारी की गलत नीतियों के कारण आज उत्तर प्रदेश के किसान को उसके उत्पाद के सही दाम नहीं मिल पा रहे हैं और इसका लाभ चंद व्यापारी उठा रहे हैं।
तीन वर्ष पूर्व देश में गेहूं की कमी को देखते हुए और किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में भारी बढ़ोतरी की शुरूआत की थी। उसका लाभ किसानों ने उठाया भी और जहां देश में गेहूं का उत्पादन बढ़ा वहीं सरकारी एजेंसियों ने भी रिकार्ड मात्रा में गेहूं की खरीद की।

गत वर्ष देश में गेहूं का उत्पादन 785.70 लाख टन हुआ था और इसमें से सरकारी एजेंसियों ने 227 लाख टन की थी। इसमें अधिकांश योगदान पंजाब व हरियाणा का रहा था और तीसरा स्थान उत्तर प्रदेश का था। पंजाब में सरकारी एजेंसियों ने 99.1 लाख टन की और हरियाणा में 52.37 लाख टन की खरीद की थी। उत्तर प्रदेश मे गेहूं की खरीद केवल 31.37 लाख टन की ही थी।

उल्लेखनीय है कि गेहूं के उत्पादन में पहला स्थान उत्तर प्रदेश का है जहां पर गत वर्ष 256.79 लाख टन का उत्पादन हुआ था जबकि 157.20 लाख टन के उत्पादन के साथ पंजाब का स्थान तीसरा और 102.36 लाख टन के साथ हरियाणा का स्थान तीसरा था।

इस प्रकार गत वर्ष गेहूं उत्पादन में पहला स्थान होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में गेहूं की खरीद तीसरे स्थान पर रही।
इस वर्ष तो खरीद के मामले में स्थिति और भी खराब बनी हुई है। नवीनतम प्राप्त आंकड़ों के अनुसार सरकारी एजेंसियों ने 165.41 लाख टन गेहूं की खरीद की है। इसमें से 86.68 लाख टन की खरीद पंजाब में और 57.34 लाख टन की खरीद हरियाणा में की है। इस प्रकार कुल खरीद में से 144.02 लाख टन की खरीद तो केवल दो राज्यों में ही की गई है। उत्तर प्रदेश में इस वर्ष अब तक केवल 4.79 लाख टन की ही खरीद की गई जबकि राजस्थान में खरीद 5.97 लाख टन की हो हो चुकी है।

खराब स्थिति
गत वर्ष तो स्थिति काफी ठीक थी लेकिन इस वर्ष वहां के किसानों की स्थिति अच्छी नहीं है। चालू रबी विपणन वर्ष 2009-10 के लिए सरकार ने गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य 1080 रुपए प्रति क्विंटल तय किए हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश की मंडियों में गेहूं 930-940 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक रही है। इसका कारण सरकारी खरीद के प्रबंध न होना है। दूसरी ओर, पंजाब और हरियाणा की मंडियों में सरकारी मशीनरी सक्रिय होने के कारण गेहूं के भाव न्यूनतम समर्थन मूल्य या इससे ऊपर चल रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में सरकारी खरीद नहीं होने के कारण बरेली, हरदोई, शाहजहां पुर आदि के कुछ व्यापारी किसानों ने 930-940 रुपए के भाव पर गेहूं खरीद कर हरियाणा की मंडियों में ले जाकर उसे 1080 रुपए के भाव पर सरकारी एजेंसियों को बेच रहे हैं।

हरियाणा की सीमा से सटे क्षेत्रों मथुरा, कोसी, आगरा, मेरठ आदि में गेहूं के भाव 1025 रुपए के आसपास चल रहे हैं। इन क्षेत्रों के किसान अपनी गेहूं हरियाणा की मंडियों में बेच रहे हैं।
उत्तर प्रदेश ही नहीं केंद्रीय सरकार की नाक के नीचे यानी दिल्ली की मंडियों में भी गेहूं 1040 रुपए से 1060 रुपए के बीच बिक रही है। यहां से भी कुछ व्यापारी गेहूं खरीद कर हरियाणा की मंडियों में बेच रहे हैं। दिल्ली से गेहूं लेकर हरियाणा में बेचने पर लगभग 13 रुपए प्रति क्विंटल का खर्च आता है जबकि भाव 20/40 रुपए अधिक तो मिलते हैं ही बारदाना यानि बोरी भी बच जाती है।

--राजेश शर्मा

Sunday, April 19, 2009

चीनी: राजनीति का शिकार- बिकेगी 30 रुपए

देश में महंगाई की दर भले ही गिर कर 0.18 प्रतिशत रह गयी हो लेकिन यह एक कटु सत्य है कि देश में महंगाई कम नहीं हुई और चीनी के भाव तो मानो केंद्रीय सरकार को मुँह चिड़ा रहे हैं। सरकार की हर कार्यवाही के बाद चीनी के भाव में तेजी ही आ रही है। और शायद यही कारण है कि केंद्रीय सरकार चीनी के भाव पर लगाम लगाने के लिए कदम उठाती आ रही है।
वास्तव में सरकार चीनी के भाव को रोकने के लिए अपने तरकश के सभी तीरों को प्रयोग कर चुकी है लेकिन किसी का स्थाई असर भाव पर नहीं हुआ है। इसका कारण सरकारी नीतियाँ ही हैं।
चीनी के भाव में तेजी की नींव तो दो वर्ष पूर्व उस समय ही पड़ गई थी जब देश में चीनी का रिकार्ड उत्पादन हुआ था और चीनी के भाव सरकारी नियंत्रण के कारण बढ़ नहीं पा रहे थे जबकि सभी जिंसों के भाव में तेजी आ रही थी। इससे चीनी मिलों को घाटा हुआ और वे गन्ना उत्पादकों को समय पर भुगतान नहीं कर पाई। परिणाम स्वरुप किसानों ने गन्ने की बुआई कम की और गन्ने का उत्पादन कम हुआ और उसका नतीजा अब उपभोक्ता को भुगतना पड़ रहा है।
यह एक कटु सत्य है कि देश में चीनी उत्पादन में सरकारी नीतियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और यह भी हकीकत है कि गन्ने पर राजनीति भी होती है। और इसके साथ यह भी कटु सत्य है कि चीनी और गन्ना लॉबी सशक्त भी है।
चीनी और गन्ने के उत्पादन में पहला स्थान महाराष्ट का है और दूसरा उत्तर प्रदेश का। दोनों ही राज्यों में गन्ने के भाव को लेकर राजनीति होती है और गन्ना उत्पादकों के वोट प्राप्त करने के लिए राज्य सरकारें गन्ने के जो भाव तय करती हैं वे केंद्रीय सरकार द्वारा तय किए गए कानूनी भाव की तुलना में कहीं अधिक होते हैं। इससे चीनी की उत्पादन लागत बढ़ती है।
दूसरी ओर, चीनी के भाव पर केंद्रीय सरकार का अप्रत्यक्ष नियंत्रण है। सरकारी राशन में देने के लिए मिलों के कुल उत्पादन का 10 प्रतिशत भाग लेवी के रूप में लेती और उसके भाव बाजार भाव की तुलना में बहुत ही कम होते हैं।
मिलें शेष मात्रा को खुले बाजार में बेचती हैं लेकिन वह मात्रा केंद्रीय सरकार तय करती है। बस यहीं से गड़बड़ आरंभ होती है। केंद्रीय सरकार चीनी के भाव रोकने के लिए अधिक मात्रा जारी करती है और मिलों को अनेक बार घाटे में चीनी बेचनी पड़ती है लेकिन जल्दी ही इसकी भरपाई कर ली जाती है।
वास्तव में कानून कहता है कि जो मिलें आबंटित मात्रा को बाजार में न बेचें सरकार उसे लेवी के भाव-जो खुले बाजार की तुलना में कम हैं-पर खरीद लें। लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है। इससे मिलों में कोई डर नहीं है। वे अपनी इच्छानुसार बाजार में चीनी बेचती हैं और अनबिकी मात्रा को अगले माह बेचने के लिए सरकार से अनुमति ले आती हैं।

वर्तमान स्थिति
चीनी में वर्तमान स्थिति के लिए भी सरकार ही दोषी है क्योंकि उसने समय रहते स्थिति का अनुमान नहीं लगाया। चीनी वर्ष 2008-09 अक्टूबर-सितम्बर के दौरान आरंभ में ही चीनी का उत्पादन कम होने के अनुमान मिल गए थे लेकिन सरकार अधिक उत्पादन की बात करती रही। पहले सरकारी अनुमान 220 लाख टन के उत्पादन का था लेकिन अब इसके घटकर 150 लाख टन पर सिमट जाने का अनुमान है। गत वर्ष यह 264 लाख टन था।
बकाया स्टाक पर मिलों और सरकार के बीच मतभेद है। सरकार कहती है कि गत वर्ष का बकाया स्टाक 105 लाख था लेकिन मिलें, जिनके पास वास्तव में चीनी होती है, कहती हैं कि बकाया स्टाक 80 लाख टन से अधिक नहीं है। बकाया स्टाक और चालू वर्ष के उत्पादन को मिलाकर चीनी की कुल उपलब्धता 230 लाख टन बैठती है जबकि खपत का अनुमान लगभग 250 लाख टन का है। कुछ माह पूर्व पूर्व सरकार ने कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है और लगभग 20 लाख टन के आयात का अनुमान है लेकिन एडवांस लाईसेंस के तहत लगभग 30 लाख टन चीनी निर्यात भी की जा चुकी है।
इससे स्पष्ट है कि देश में चीनी की कुल उपलब्धता खपत की तुलना में कम होगी।
अब सरकार ने सरकारी एजेंसियों को 10 लाख टन रिफाईंड चीनी का आयात शुल्क मुक्त करने की अनुमति दी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इससे देया में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी लेकिन आयातित लागत देश में चल रहे भाव के आसपास ही होगी।

30 रुपए किलो
चीनी की उपलब्धता और खपत का गणित और विश्व बाजार में चीनी के भाव को देखते हुए एक बात स्पष्ट है कि इस वर्ष जल्दी नहीं तो त्यौहारों के अवसर पर तो खुदरा बाजार में चीनी 30 रुपए प्रति किलो बिक ही जाएगी और यदि यह स्तर पार कर जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
इस समय खुदरा बाजार में भाव 28 रुपए प्रति किलो तो हो ही चुके हैं।

--राजेश शर्मा