Saturday, June 26, 2010

आसन, भाषण और अब शासन के गुरू - बाबा रामदेव

हमारी एक बड़ी बहन सरीखी मित्र जो एक अच्छी गाइनकोलॉजिस्ट भी हैं, यह बात सत्य है जहां वे अपना चिकित्सालय चलाती है, अधिकतकर बच्चों ने उन्ही के शुभ हाथो से जन्म लिया। उनके अच्छे स्वभाव के कारण युवा से लेकर बुजुर्ग तक बड़ी संख्या में उनके प्रशंसक भी हैं सो उन्होने चुनाव लड़ने का मन बना लिया। एक बड़े राजनैतिक दल ने उनको टिकट भी दे दिया। उन्हे लग रहा था जिले के बड़ी संख्या में उपलब्ध प्रशंसक उनके पक्ष में मतदान कर उन्हे विजय श्री दिलवा देगें। परन्तु ऐसा नही हुआ, चुनाव में उन्हे निराशा हाथ लगी। पिछले लोकसभा चुनाव में आन्ध्र प्रदेश के सिने सुपर स्टर चिरंजीवी को भी कुछ ऐसा ही भ्रम हो गया उन्होने भी पूरे प्रदेश में अपने प्रत्याशी लड़ाये। प्रचार के समय उनकी सभाओं में अप्रत्याशित भीड़ भी उमड़ती थी मानो उक्त प्रदेश की सभी सीटें वे ही जीत रहे हों। विपक्षी दल भी सकते में आ गये। उन्हे भी भ्रम हो गया कि आन्ध्र की राजनीति में चिरंजीवी का एकछत्र राज्य होने वाला है। पर ऐसा नहीं हुआ। सिनेमा प्रेमियों ने भीड़ द्वारा उनका उत्साह तो बढ़़ाया पर वोट नहीं दिये। जनता ने इन्हे भी राजनीति के क्षेत्र में ससम्मान नकार दिया। इसी प्रकार का भ्रम जय गुरू देव को भी हो गया था। प्राप्त परिणाम से उन्हे लगभग ढाई दशक गुमनामी के अंधेरे में रहना पड़ा जब तक उस समय की पीढ़ी विषय को पूरी तरह भूल नहीं गयी। इसी प्रकार न जाने कितने विभिन्न क्षेत्रों में अत्यधिक सम्मान प्राप्त व्यक्तियों ने अपनी लोकप्रियता को मतपेटी तक पहुंचाने का प्रयास किया परन्तु वे असफल ही रहे। व्यक्तिगत स्तर पर तो विभिन्न चुनावों में लड़ने वालो की बाढ़ सी आ जाती है। लगभग हर सीट पर कोई न कोई गैर राजनैतिक व्यक्ति अपना भाग्य आजमाता है। हार या जीत जाने पर पलटकर क्षेत्र का मुंह नहीं देखता। मेगा सुपर स्टार अमिताभ बच्चन से अच्छा उदाहरण और नहीं हो सकता।
वर्तमान में योग गुरू रामदेव जी को भी कुछ उपरोक्त नामी-गिरामी हस्तियों की तरह भ्रम उत्पन्न हो गया। उन्हे लग रहा है वे अपनी लोकप्रियता को राजनैतिक क्षेत्र में भुना सकते है। परन्तु उन्हे यह जानना चाहिए समाज आप के साथ किस विषय पर खड़ा है। स्वामी जी को यह बात भली भॉति समझकर कदम उठाना चाहिए कि जनता किसे प्यार देती है किसे सम्मान और वह किसे नोट देती है और किसे वोट। रामदेवा जी को जानना चाहिए जनता उनके साथ कपाल-भाति मे तो है पर राजनीति में साथ दे ऐसा बिल्कुल भी आवश्यक नहीं।
रामदेव कब स्वामी से लेकर योग गुरू बन गये उनके शब्द, शिक्षा, प्रवचन-भाषणों में परिवर्तित होते चले गये पता हीं नहीं चला। देखते ही देखते हरिद्वार की सड़कों पर साइकिल से चलने वाला एक साधारण व्यक्ति किस प्रकार लगभग 10 वर्षों में करीब सत्तर हजार करोड़ रूपये का स्वामी बन गया। आज स्वामी जी के पास विदेशों में भी अकूत अचल सम्पत्ति है। यह बात सत्य है भारत से विलुप्त हो चुके योग विज्ञान को उन्होने पुनः सार्वजनिक किया। इस विषय पर उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम होगी। परन्तु उसकी आड़ में धन का जो खेल चला वह उनके उक्त सम्मान का कम करता है। योग की कक्षा लगा सिनेमा की तरह श्रेणीगत टिकटों की बिक्री उनकी उक्त लोकप्रियता पर प्रश्न चिन्ह लगाती है। उनकी यौगिक क्रियाओं की सी0डी0 तथा साहित्य की ऊॅची कीमतों पर बिक्री भी उनके योग व्यवसायीकरण की तरफ इंगित करती है। आज वे नमक, शरबत टूथब्रश तथा अचार सहित विभिन्न छोटी-छोटी दैनिक उपयोग की वस्तुओं की भी बिक्री करने लगे। सुना जा रहा है जल्द ही वे मिनरल वाटर बनाने का भी संयत्र लगाने जा रहे है।
स्वामी जी के योग आसन तथा प्राणायाम के ज्ञान को जनता ने सिर ऑखों पर बैठाया। उनके प्रवचन से लेकर दन्त मंजन तक समाज ने स्वीकार किये। परन्तु राजनीति में भाग्य आजमाने का फैसला उनके लिए निश्चित ही मुश्किले खड़ी करेगी। वे किस प्रकार रजनीति में शुचिता की बात करेंगे। क्या जनता उनसे यह नहीं पूछेगी उनका इतना बड़़ा आर्थिक ताना-बाना किस सामाजिक शुचिता की उपलब्धि है।
स्वामी जी जिस प्रकार बीमारों का इलाज करते-करते भगवा वस्त्रों की आड़ ले राजनैतिक जनसमर्थन प्राप्त करने का प्रयास एवं प्रधानमंत्री पद की लिप्सा पाले अपने जनकल्याण के स्वरूप का व्यापारीकरण एवं अब राजनीतिकरण किया है। समाज सब देख रहा है। जिस तरह बाबा ने वर्ष 2014 में होने वाले आम लोकसभा चुनाव में सभी 542 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करने की घोषणा की है। इस प्रकार की घोषणा किसी भी एक व्यक्ति ने पूर्व में भारत के इतिहास में नहीं की। उनकी व्यवस्थित राजनैतिक तैयारियों को देखते हुए ऐसा लगता है उनके पीछे कई बड़े समूह है जो देशी भी हो सकते है तथा विदेशी भी। बाबा की योग कक्षाओ, आयुर्वेदिक दवाओं, दिनचर्या की साधारण वस्तुओं से लेकर योग साहित्य तक की व्यवस्थित मार्केटिंग उक्त शक को और पुख्ता करती है। उक्त व्यवस्था में बाबा के विश्वस्त साथी बालकिशन महाराज जी का नाम आता है। परन्तु मार्केटिंग ऐसे कठिन विषय को महज एक व्यक्ति संचालित कर रहा है, जो समझ से परे है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय राजनीति में जहॉ काग्रेस पार्टी स्वाधीनता के रथ पर सवार होकर आयी वहीं जनसंघ (वर्तमान भाजपा) ने प्रखर राष्ट्रवाद तथा हिन्दुत्व के साथ राजनीति का दामन पकड़। जय प्रकार प्रकाश नारायण जी ने युवाओं के साथ अपनी राजनैतिक पारी खेली वही कम्युनिस्ट मजदूरों के सहारे राजनैतिक अखाड़े में अपनी उपस्थिति बनाये है। बात एकदम स्पष्ट है हर दल के साथ एक न एक महत्वपूर्ण समाज जुडा है या था। जो उनके आधार मत की तरह हमेशा उनके साथ खड़ा रहा। हर राष्ट्रीय दल का अपना एक गौरवशाली इतिहास है न कि स्वामी रामदेव जी की तरह आसन, भाषण, तथा अन्त में शासन की अभिलाषा वाली सिर्फ बेचैनी।
बाबा रामदेव अपनी योजना भर पूरा प्रयास कर रहे है कि उनकी राजनैतिक पारी की शुरूआत दमदार तरीके से हो। उनसे कोई छोटी सी चूक भी न हो जिसका परिणाम उन्हे भुगतना पड़े। इसीलिए देश में 18 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं पर उन्होने प्रथम डोरे डालने प्रारम्भ किये। मुस्लिम उलमाओं से सम्पर्क उनकी मुस्लिम घेरे बन्दी का प्रथम चरण था। वैश्विक स्तर पर अपनी कट्टर छवि के लिए मशहूर देवबंद मदरसे में उनका जाना, अपने उद्बोधन का प्रारम्भ कुरान शरीफ की आयातों से करना उनकी राजनैतिक योजना का हिस्सा थी।
इसी वर्ष उनकी एक देशव्यापी आन्दोलन की तैयारी भी है। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट जिसकी राजनैतिक इकाई अगला लोकसभा चुनाव लडे़गी। मजे की बात है केसरिया वस्त्र धारण किये स्वामी रामदेव ने अपनी राजनैतिक पार्टी का ध्वज वाहक हिन्दु धर्म को नहीं बनाया है। उन्हे भय है हिन्दू धर्म का विषय आते ही मुस्लिम मतदाता भड़क न जाये।
भारतीय संस्कृति में गुरू के स्थान को ईश्वर से भी उच्च आसन प्रदान किया गया है। वैश्विक योग गुरू के रूप में स्थापित रामदेव जी महाराज स्वयं को गुरू कहलाने में गौरवान्वित महसूस करते है। परन्तु स्वयं उनके गुरू शंकर देव जी कहां हैं। कभी उनके मुंह से अनायास भी नहीं निकलता इस भय से कि कहीं उनकी लोकप्रियता मे वे हिस्सेदार न हो जाये।
एक पुरानी कहावत है तेज दौड़ने वाला व्यक्ति उतनी ही तेजी से गिरता है। ऐसा लगता है मानेा स्वामी जी के साथ भी ऐसा ही कुछ घटित होने वाला है। वास्तव में रामदेव जी की माया का इन्द्रजाल समाप्त होने के कगार पर है। जिसका अन्तिम चरण उनके मन में भ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। रामदेव जी से पहले भी बडे़-बडे़ स्वामी हुए। ओशो रजनीश जिनके पास धन-धर्म तथा समाज का एक बड़ा वर्ग था। उन्होने तो स्वयं को भगवान तक कहला लिया था। महेश योगी जिनका मुख्यालय हालैण्ड में था उनके शिष्यों में रामनाथ गोयनका से लेकर सत्ता के ऊॅचे-ऊॅचे लोग थे। परन्तु इस प्रकार का स्वप्न इन्होने भी नहीं देखा। कर्ण के द्वारा कुण्डल कवच का दान हो या रावण द्वारा सीता माता का छला जाना। भारतीय समाज हमेशा धर्म की ओट में ही ठगा गया है। बाबा राम देव जी ने संत वेश का उपयोग व्यापार में किया जिसे अब राजनीति मे करना चाहते है। जो निन्दनीय है। देश की जनता की परख बहुत तीखी होती है। वह समय आने पर अपना काम अवश्य करती है। आने वाला समय स्वामी जी के दिवास्वप्न को धूलधूसरित करेगा। उनके सफल योग गुरू से सफल व्यापारी उसके बाद उनकी प्रधान मंत्री पद की लालसा उन्हे लोकप्रियता के अन्तिम पड़ाव पर पहुंचा रही है।

राघवेन्द्र सिंह

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6 बैठकबाजों का कहना है :

Deepali Sangwan का कहना है कि -

bahut teekhi aur sateek baat kahi hai raghavendra ji ne..
Yeh sach hai ki unhone yog ke dwara saikdon logo ki sahayta ki hai, par hum yeh bhi nahi keh sakte ki yog lupt ho gaya tha, haan unki kismat acchi nikli ki unhe logo ne khule haathon sweekar kiya..
Khair yeh dusri baat hai, mudda yeh hai ki kya unhe apne neta ke roop mein dekha jana chaiye, to mera jawaab naa hai..kam se kam main unhe vote nahi karungi, chaar badi baatein karne se koi desh nahi chala sakta, beshak se aaj hamare saamne bhrasht netaon ki qataar lagi hai, par iska matlab yeh katai nahi ki hum kisi ko bhi sweekar kar lein..

Ek baat mujhe aapki badi acchi lagi, ki swami ji ke guru ji ka naam kahin bhi nahi aaya, jabki khud swami ji mashoor ho gaye,.. Sach kaha aapne, iska seedha matlab yahi hua ki unhe bhi business ka taste lag gaya hai.. Kya baat hai.

निर्मला कपिला का कहना है कि -

बाबा राम देव जी ने संत वेश का उपयोग व्यापार में किया जिसे अब राजनीति मे करना चाहते है। जो निन्दनीय है
आप्की बातों से शत प्रतिशत सहमत हूँ। संतों का काम दिशा दिखाना है न कि सत्ता हासिल करना और अब वो जनता के पैसे से कुर्सी हासिल करना चाहते हैं। मुझे संतों साधूयों पर सदा से ही क्षोभ रहा है किस तरह जनता को मूर्ख बना कर ए सी गाडियाँ और महलनुमा आश्रमों मे रहते हैं और आपने कुनवों के लिये धन इक्कठा कर जाते हैं जैसे बापू आसा राम का भन्डा फोड हुया है। धन्यवाद इस आलेख के लिये।

Rajesh R. Singh का कहना है कि -

बाबा रामदेव की विशेषता क्या है ? उन्होंने भारतीय योग में नया क्या किया है बाबा रामदेव योगी नहीं है कसरत सिखाने वाले है इस बीमारू मानसिकता वाले भारतियों को योगी की जरूरत है कसरत सिखाने वाले की नहीं. बाबा आयुर्वेदिक औषधियां बना और बेच रहे है उसमें नया क्या है ? डाबर, चरक, झंडू, वैद्यनाथ, हिमालया, भी आयुर्वेदिक औषधियां बना और बेच रहे है. हमने बाबा समाचार चैनलों पर उन्हें सुन कर उनके राजनैतिक समझ के बारे में अनुमान लगाया है कि वे जो भी राजनैतिक बाते करते है काफी सतही बातें है मुझे नहीं लगता कि बाबा रामदेव राजनीति में कुछ खास कर पाएंगे

विश्व दीपक का कहना है कि -

बेहद चिंतन-मनन के पश्चात लिखा गया लेख मालूम होता ये। आपने सच्चाई को बहुत हीं बारीकी से पकड़ा है। बाबा रामदेव के मन में क्या है - यह तो मैं नहीं बता सकता, लेकिन उनकी हरकतों से बहुत कुछ जाहिर हो जाता है। अब वो राजनीति में आने वाले हैं / आ चुके हैं, देखते हैं उनकी पार्टी और उनका हश्र क्या होता है।

-विश्व दीपक

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

राघवेन्द्रजी ने जो कहा उसमें दो राय नहीं है...लेकिन आजका कौन सा राजकीय नेता दूध का धुला हुआ है?...अगर राम देव स्वामी या योग गुरु, जो भी है...कल एम. एल. ए. बन कर पर्लियामेंट की कुर्सी पर कब्जा जमा भी लेते है तो जनता के लिए नया कुछ भी नहीं है!...

तपन शर्मा का कहना है कि -

Artt of Living पैसे लेकर योग सिखाते हैं। टीवी पर भी नहीं सिखाते.. रामदेव ने योग को कुछ नहीं दिया पर योग से लोगों का कुछ तो भला किया ही है??!!! नहीं??
आसाराम और रामदेव की तुलना नहीं की जा सकती। आसाराम ने साबुन अगरबत्ती और शैम्पू बेचने का धंधा किया है। तांत्रिक के बारे में भी सब जानते हैं।
खैर...
आसन सिखा कर क्या गलत किया.. ये मेरी समझ में नहीं आता। आप रामदेव के राजनीति में आने से "आहत" हैं पर रामदेव बाकि राजनीतिज्ञों की तरह जनता को लूट तो नहीं रहे... राष्ट्रकुल खेलों की आड़ में कांग्रेस ने कितना लूटा है ये किसी से नहीं छूपा है। अंधों में काणा राजा ही सही...
दीपाली जी कहती हैं कि उनकी किस्मत अच्छी थी.. हँसी आ रही है पढ़कर..अगर योग लुप्त नहीं हुआ था तो किसी और ने आगे बढ़कर लोगों तक पहुँचाया भी नहीं। क्या कोई राजनेता आगे आया था? या कोई दूसरा संत? या किसी डाक्टर को पैसा कमाने की जगह समाज सेवा याद आ गई थी?
दूसरी बात यह कि उनके गुरु का नाम कहीं नहीं आया। कलाम साहब बहुत बढ़े साइंटिस्ट हैं..उन्हें किस ने पढ़ाया? आप जानते हैं?
लता मंगेशकर का नाम जब लिया जाता है तब उनके गुरु का नाम आप साथ लेते हैं?
अमिताभ बच्चन को अदाकारी किसने सिखाई?
मोतीलाल नेहरू के पिता का नाम क्या था?
राम का नाम सब लेते हैं पर वशिष्ठ का नाम भी लेते हैं आप?
किस संत या बड़े व्यक्ति के गुरु का नाम आप जानते हैं?
रामदेव को वोट दिया जाये या नहीं यह अलग बात है उन्हें समाज के लिये और भी कुछ करना होगा तभी उन्हें वोट मिलेगा। पर उन्हें राजनीति में घुसने का हक पूरा मिला है। ये उन्होंने साबित कर दिया है।

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