Showing posts with label inflation rate. Show all posts
Showing posts with label inflation rate. Show all posts

Sunday, March 29, 2009

महंगाई दर घटी लेकिन तेज़ी वहीं की वहीं

सरकार महंगाई दर कम होने पर अपनी पीठ ठोक रही है कि 14 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान यह घट कर 0.27 प्रतिशत पर आ गई है। यह महंगाई की दर में वृद्वि का पिछले 30 वर्षों का सबसे नीचा स्तर है। सरकार के लिए संतोष की बात है भी क्योंकि गत वर्ष इसी अवधि में यह 8.02 प्रतिशत थी। यही नहीं गत वर्ष अगस्त में यह दर 13 प्रतिशत का आकंड़ा छू गई थी। उस समय पूरा मीडिया महंगाई को लेकर सरकार के पीछे पड़ गया था। इसे देखते हुए सरकार के लिए यह राहत की बात है। यही नहीं आगामी आम चुनाव को देखते हुए भी सरकार प्रसन्न है कि चलो महंगाई की दर पर काबू तो पाया।
महंगाई की गिरती दर को देखते हुए अनेक अर्थशास्त्री देश में मुद्रा स्फीति की बजाए अपस्फीति की आशंका जताने लगे हैं।

विरोधाभास
वास्तव में सरकार के बयानों में ही विरोधाभास है। थोक मूल्य सूचकांक उद्योग व वाणिज्य मंत्रालय द्वारा किया जाता है। इसके आधार पर यह कहा जा रहा है कि देश में महंगाई की दर कम हो रही है और आगामी सप्ताहों में यह शून्य पर आ जाएगी या निगेटिव हो जाएगी।
लेकिन वित्त मंत्रालय के आर्थिक सलाहकार स्वयं यह मान रहे हैं कि महंगाई कम नहीं हुई है। उनका कहना है कि महंगाई की दर थोक मूल्य सूचकांक के आधार पर निकाली जाती है। यह ठीक है कि थोक मूल्य सूचकांक में लगातार कमी आ रही है लेकिन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की वृद्वि दर तो अब भी 10 प्रतिशत के आसपास घूम रही है।

उपभोक्ता हैरान
बरहहाल, इन सब से आम उपभोक्ता हतप्रभ है। वह महंगाई की दर 13 प्रतिशत के आसपास पहुंचने के बाद परेशान तो था लेकिन अब गिर कर 0.27 प्रतिशत आ जाने पर प्रसन्न नहीं लेकिन हैरान अवश्य है कि यह क्या हो रहा है? उसका बजट तो वहीं का वहीं है या बढ़ रहा है, फिर महंगाई कैसे कम हो रही है।

क्या है सूचकांक
थोक मूल्य सूचकांक में लगभग एक हजार विभिन्न वस्तुओं का समावेश है। दिलचस्प बात यह है कि सूचकांक की लगभग 78 प्रतिशत वस्तुएं वे हैं जिनकी रोजमर्रा की जिंदगी में आम आदमी को आवश्यकता ही नहीं होती है। इनमें विभिन्न रसायन, धातुएं, विभिन्न प्रकार के ईंधन, ग्रीस, रंग-रोगन, सीमेंट, स्टील, मशीनरी व मशीन टूल, पुस्तकों व समाचार पत्रों की प्रिन्टिग, पल्प, कागज आदि अनेक वस्तुएं इस सूची में शामिल हैं। शेष 22 प्रतिशत में वे वस्तुएं हैं जिनकी रोज आवश्यकता होती है।

आंकड़ों की सच्चाई
आम उपभोग की अनेक वस्तुओं के भाव दिल्ली बाजार में गत वर्ष की तुलना में ऊंचे चल रहे हैं। गत वर्ष दिल्ली बाजार में चीनी के एक्स मिल भाव 1600 रुपए के आसपास चल रहे थे जो अब लगभग 2200 रुपए (थोक में 25 रुपए किलो) चल रहे हैं। गुड़ के भाव तो इससे भी आगे हैं। गेहूं दड़ा क्वालिटी के थोक भाव 1125/1130 रुपए से बढ़ कर 1160/1165 रुपए हो गए हैं। मूंग के भाव गत वर्ष 2200/2650 रुपए थे जो अब 3500/4000 रुपए हो गए हैं। रंगून की अरहर गत वर्ष 2575/2600 रुपए थी जो अब 3500 रुपए पार कर गई है। रंगून की उड़द भी 2375/2400 रुपए से बढ़ कर 2800 रुपए के आसपास हो गई है। चने के भाव गत वर्ष की तुलना में अवश्य कम हैं। मसालों के भाव भी गत वर्ष की तुलना में काफी तेज हैं लेकिन खाद्य तेलों के भाव नीचे चल रहे हैं।

सरकारी आंकड़े
यदि सरकारी आंकड़ों को देखें तो भी यह स्पष्ट है कि खाद्य वस्तुओं का थोक मूल्य सूचकांक बढ़ा है। इस वर्ष 14 मार्च को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान दलहनों का थोक मूल्य सूचकांक 269.1 था जो गत वर्ष 15 मार्च को 244.7 था। अनाजों का सूचकांक आलोच्य अवधि में 219.4 से बढ़ कर 241.6 पर पहुंच गया है। सब्जियों व फलों का सूचकांक 234.8 से बढ़ कर 247.6 हो गया है। दूध का सूचकांक 220.3 से बढ़ कर 233.7 हो गया है। इसी प्रकार मसालों, खांडसार, गुड़ व चीनी तथा अन्य खाद्य उत्पादों का थोक मूल्य सूचकांक बढ़ा है लेकिन अन्य व गैर खाद्य वस्तुओं के थोक मूल्य सूचकांक में कमी के कारण महंगाई की दर में बढ़ोतरी कम हो गई है।
यहां यह जानना भी आवश्यक है कि महंगाई की दर में बढ़ोतरी की गति कम हुई लेकिन वह घट नहीं रही है।

--राजेश शर्मा

Sunday, February 15, 2009

घटती मुद्रास्फिति की दर लेकिन बढ़ती महंगाई

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब महंगाई की दर घटनी आरंभ हो गई है। गत वर्ष अगस्त में महंगाई की दर बढ़ कर 12.91 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई थी। वास्तव में यह दर पिछले 16 वर्षों में सबसे अधिक थी। इसे चिंताजनक मानते हुए विपक्ष ने शोर मचाया और सरकार ने भी तुरंत प्रभावी कदम उठाए। बहरहाल, महंगाई की दर में गिरावट का दौर आरंभ हुआ और अब 31 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान यह गिर कर केवल 4.39 प्रतिशत पर आ गई है।
सरकार के लिए यह संतोष की बात है लेकिन वास्तविकता यह है कि आम आदमी अब भी महंगाई से त्रस्त है। उसे अब भी अपनी रसोई पर गत वर्ष की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

वास्तव में इसमें किसी हद तक आंकड़ों का खेल है और इस महंगाई के लिए पूरी तरह सरकार ही जिम्मेदार है।

सबसे पहले तो यह गलत धारणा है कि महंगाई घट रही है। वास्तव में महंगाई बराबर बढ़ रही है। कमी आई है तो इसकी बढ़ोतरी की दर में। वास्तव में पहले महंगाई की वृद्वि दर 12.91 प्रतिशत पर पहुंच गई थी लेकिन अब घट कर 4.39 प्रतिशत पर आ गई है।
उदाहरण के लिए यदि किसी जिंस की कीमत 100 रुपए माने तो पहले वह 12.91 प्रतिशत से बढ़ कर 112.91 रुपए की हो गई थी लेकिन बाद में वृद्वि की दर घट कर 4.39 प्रतिशत रह गई है। यानि अब यह 112.91 रुपए पर 4.39 प्रतिशत बढ़ रही है। इससे स्पष्ट है कि यह आंकड़ों का खेल है और उपभोक्ता भ्रमित हो रहा है।
अब प्रश्न है रसोई का। रसोई की लागत बढ़ रही है क्योंकि थोक मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं के सूचकांक में कोई कमी नहीं हुई है, सूचकांक घटा है तो औद्योगिक वस्तुओं का। आम आदमी को सरोकार दाल रोटी, सब्जी, तेल आदि से अधिक होता है।
गत वर्ष 2 फरवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान खाद्य वस्तुओं का सूचकांक 219.5 प्रतिशत था जो इस वर्ष 31 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान बढ़ कर 244.7 प्रतिशत हो गया। आलोच्य अवधि में गेहूँ, चावल मोटे अनाज और दलहनों का थोक मूल्य सूचकांक 217.2 से बढ़ कर 245.2 हो गया। सिब्जयों को सूचकांक 169.9 से बढ़ कर 217.7 हो गया। फलों का सूचकांक भी बढ़ा है। दूध, नमक, चीनी, खांडसारी, मसालों आदि का सूचकांक भी आलोच्य अवधि में बढ़ा है लेकिन यह राहत का विषय है कि खाद्य तेलों के सूचकांक में कमी आई है।

सरकार दोषी ?

वास्तव में अनाज, दाल आदि के सूचकांक में बढ़ोतरी के लिए सरकार व उसकी नीति दोषी हैं।
अनेक कृषि जिंसों के भाव खुले बाजार में सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्यों की तुलना में ऊंचे चल रहे थे लेकिन उसके बाद भी सरकार ने किसानों के वोट प्राप्त करने के लिए सभी जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी कर दी।
गत वर्ष सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1000 रुपए प्रति क्विंटल था और अब बाजार में इसके भाव 1175 रुपए से ऊपर चल रहे थे लेकिन सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा कर 1080 रुपए कर दिए यानि अब उपभोक्ता को और अधिक भाव चुकाने पड़ेंगे। इसी प्रकार चना, मसूर, सरसों आदि के भाव में बढ़ोतरी की है।


गत खरीफ के दौरान सरकार ने कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में 47 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की थी। इससे बाजार में इसके भाव में और तेजी आ गई। इसी प्रकार मक्का, बाजरा, अरहर आदि के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी की थी।

राजेश शर्मा