Sunday, February 15, 2009

घटती मुद्रास्फिति की दर लेकिन बढ़ती महंगाई

सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब महंगाई की दर घटनी आरंभ हो गई है। गत वर्ष अगस्त में महंगाई की दर बढ़ कर 12.91 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच गई थी। वास्तव में यह दर पिछले 16 वर्षों में सबसे अधिक थी। इसे चिंताजनक मानते हुए विपक्ष ने शोर मचाया और सरकार ने भी तुरंत प्रभावी कदम उठाए। बहरहाल, महंगाई की दर में गिरावट का दौर आरंभ हुआ और अब 31 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान यह गिर कर केवल 4.39 प्रतिशत पर आ गई है।
सरकार के लिए यह संतोष की बात है लेकिन वास्तविकता यह है कि आम आदमी अब भी महंगाई से त्रस्त है। उसे अब भी अपनी रसोई पर गत वर्ष की तुलना में अधिक खर्च करना पड़ रहा है।

वास्तव में इसमें किसी हद तक आंकड़ों का खेल है और इस महंगाई के लिए पूरी तरह सरकार ही जिम्मेदार है।

सबसे पहले तो यह गलत धारणा है कि महंगाई घट रही है। वास्तव में महंगाई बराबर बढ़ रही है। कमी आई है तो इसकी बढ़ोतरी की दर में। वास्तव में पहले महंगाई की वृद्वि दर 12.91 प्रतिशत पर पहुंच गई थी लेकिन अब घट कर 4.39 प्रतिशत पर आ गई है।
उदाहरण के लिए यदि किसी जिंस की कीमत 100 रुपए माने तो पहले वह 12.91 प्रतिशत से बढ़ कर 112.91 रुपए की हो गई थी लेकिन बाद में वृद्वि की दर घट कर 4.39 प्रतिशत रह गई है। यानि अब यह 112.91 रुपए पर 4.39 प्रतिशत बढ़ रही है। इससे स्पष्ट है कि यह आंकड़ों का खेल है और उपभोक्ता भ्रमित हो रहा है।
अब प्रश्न है रसोई का। रसोई की लागत बढ़ रही है क्योंकि थोक मूल्य सूचकांक में खाद्य वस्तुओं के सूचकांक में कोई कमी नहीं हुई है, सूचकांक घटा है तो औद्योगिक वस्तुओं का। आम आदमी को सरोकार दाल रोटी, सब्जी, तेल आदि से अधिक होता है।
गत वर्ष 2 फरवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान खाद्य वस्तुओं का सूचकांक 219.5 प्रतिशत था जो इस वर्ष 31 जनवरी को समाप्त हुए सप्ताह के दौरान बढ़ कर 244.7 प्रतिशत हो गया। आलोच्य अवधि में गेहूँ, चावल मोटे अनाज और दलहनों का थोक मूल्य सूचकांक 217.2 से बढ़ कर 245.2 हो गया। सिब्जयों को सूचकांक 169.9 से बढ़ कर 217.7 हो गया। फलों का सूचकांक भी बढ़ा है। दूध, नमक, चीनी, खांडसारी, मसालों आदि का सूचकांक भी आलोच्य अवधि में बढ़ा है लेकिन यह राहत का विषय है कि खाद्य तेलों के सूचकांक में कमी आई है।

सरकार दोषी ?

वास्तव में अनाज, दाल आदि के सूचकांक में बढ़ोतरी के लिए सरकार व उसकी नीति दोषी हैं।
अनेक कृषि जिंसों के भाव खुले बाजार में सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम समर्थन मूल्यों की तुलना में ऊंचे चल रहे थे लेकिन उसके बाद भी सरकार ने किसानों के वोट प्राप्त करने के लिए सभी जिंसों के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी कर दी।
गत वर्ष सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1000 रुपए प्रति क्विंटल था और अब बाजार में इसके भाव 1175 रुपए से ऊपर चल रहे थे लेकिन सरकार ने न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ा कर 1080 रुपए कर दिए यानि अब उपभोक्ता को और अधिक भाव चुकाने पड़ेंगे। इसी प्रकार चना, मसूर, सरसों आदि के भाव में बढ़ोतरी की है।


गत खरीफ के दौरान सरकार ने कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में 47 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की थी। इससे बाजार में इसके भाव में और तेजी आ गई। इसी प्रकार मक्का, बाजरा, अरहर आदि के न्यूनतम समर्थन मूल्यों में बढ़ोतरी की थी।

राजेश शर्मा

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3 बैठकबाजों का कहना है :

अवनीश एस तिवारी का कहना है कि -

सरकार जो भी आंकड़े दिखाती है मुद्रास्फीति की वो वस्तुत: बहुत सारे मापदंडों का मिश्रण होता है |
इसलिए १०० फीसदी महंगाई नहीं दर्शाता |
Inflation rate figure is usally a rosy figure being shown by government.

लेख के लिए धन्यवाद |


अवनीश तिवारी

आलोक सिंह "साहिल" का कहना है कि -

बहुत ही अच्छा लेख....
सरकार के दिखाए आँकड़ों पर यकीन कर पाना तो हमेशा से ही मुश्किल रहा है...पर मजबूरी यह है कि दूसरे रिसोर्सेस लायें कहाँ से हर थक कर हमें उनका ऐतबार करना ही पड़ता है...वैसे भी आम
आदमी मुद्रा स्फीति और महँगाई के जोड़ तोड़ को समझ पाने मे असहज ही महसूस करता है...
आलोक सिंह "साहिल"

sumit का कहना है कि -

आपके इस लेख को पढकर आकडो का खेल समझ आने लगा है, मुझे भी ये ही लग रहा था, महंगाई दर कैसे कम हो गई जबकि फल सब्जियो , आटे दाल के दाम बढ रहे है

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