Thursday, September 03, 2009

ये दिल्ली है मेरे यार...


हाल ही में एक घटना घटी जब कुछ लोग एक लड़की को छेड़ रहे थे तब एक बुजुर्ग ने बीच-बचाव का प्रयास किया। नतीजा..जान से हाथ धोना पड़ा। हमलावर फ़रार।
बस इश्क मोहब्बत प्यार...
दिल्ली की रिंग रोड। कोई ऐसा समय नहीं जब वाहन सरपट न दौड़ रहे हों। चौबीसों घंटे जाम। एक स्कॉर्पियो आती है, महिला को टक्कर मारकर निकल जाती है। उसके बाद एक के बाद एक, दो-तीन नहीं बल्कि १५ से अधिक गाड़ियाँ उस महिला के ऊपर से गुजरती हैं। रौंगटे खड़े हो जाते हैं लेकिन वीडियो बनाने वाले बनाते रहते हैं और फिर एक चौबीसों घंटे वाले न्यूज़ चैनल की एक घंटे की खबर बनती है। एक कहावत थी-दिल्ली दिल वालों की। थी इसलिये कहा क्योंकि ऐसा कहीं लगता नहीं। हर रो़ज़ बुजुर्ग दम्पत्तियों व महिलाओं पर हमले इस कहावत को निरर्थक साबित करते हैं। ये दुर्घटनायें बताती हैं कि दिल्ली-६ के का गाना दिल्ली की "झूठी" तस्वीर दिखाता है।

अगले वर्ष दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। हर ओर इसकी तैयारियाँ चल रही हैं। अभी पिछले दिनों दिल्ली में बारिश हुई। एक तो ये मौसम विभाग कमाल का है-जब बारिश नहीं होनी होती तब कहता है मानसून आ गया है। खैर विभाग की बात बाद में। पहले बारिश की। मूसलाधार बारिश हुई। ऐसा नहीं कि पिछले वर्षों में ऐसी बारिश न हुई हो। पर पता नहीं क्यों आठ बजे नोएडा से निकला हुआ मैं जब रात को १२ बजे पीतमपुरा आता हूँ तो अपने आपको खुशनसीब समझता हूँ। मैं उन लोगों में से नहीं था जो बारिश होने पर दो घंटे का सफ़र छह घंटे में पूरा करते हैं। दिल्ली की सड़कों व ट्रैफ़िक की ऐसी बुरी हालत मैंने कभी नहीं देखी। ये दिल्ली है। जो दिल्लीवासियों को सम्भाल नहीं पा रही, वो अगले साल अक्टूबर में १.५ से दो लाख पर्यटकों को कैसे सम्भालेगी? लगता है घर से ही काम करना पड़ेगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री कहती हैं कि यातायात में सुधार नहीं हो सकता,जाम तो लगेंगे ही। मतलब उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिये। गौरतलब है कि दिल्ली में हर वर्ष औसतन पाँच लाख लोग नये आते हैं। पर शायद ये हाल कमोबेश हर मेट्रो शहरों का होगा। कुछ वर्ष पहले शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली में बाहरी लोग आते रहते हैं और जाते नहीं जिससे व्यवस्था पर असर होता। उनका इशारा यू.पी व बिहार से था। शीला जी ने यह कहते हुए कतई नहीं सोचा कि वे खुद "बाहरी" हैं। तथ्य यही है कि दिल्ली में रहने वाला हर परिवार बाहर से ही आया है। जब से दिल्ली राजधानी बनी है शायद तभी से लोगों ने इसे घर बनाना शुरु किया। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी कोई हरियाणा, यूपी से आया, कोई पाकिस्तान से तो कोई बिहार से काम खोजने आया।

दिल्ली के न लोग अपने और नही यहाँ के साधन। मसलन न पूरी बिजली यहाँ बनती न ही पानी यहाँ का। बिजली के लिये कभी पंजाब से गिड़गिड़ाते हैं तो कभी पानी के लिये यूपी व हरियाणा से। बिजली पानी की ऐसी कमी है कि दिल्ली अब अधिक बोझ नहीं उठा सकती। पानी की किल्लत से हारकर शीला जी कहती हैं कि जब तक बारिश नहीं होगी तब तक पानी नहीं मिल सकता। और बारिश होती है तो लोगों को मिलता है सिर्फ़ जाम। जाम से याद आया एक और "जाम"। शीला सरकार हर पेट्रोल पम्प व मॉल में "जाम" उपलब्ध करवाने जा रही है। कॉमनवेल्थ खेल आने वाले हैं। पर्यटकों के लिये सुविधा हो जायेगी और कमाई अलग से। मतलब दिल्ली वासियों को हमेशा "जाम" मिल सकेगा। पानी न सही "जाम" ही सही। पर फिलहाल तो ट्रैफ़िक का जाम ही मिल पा रहा है। ऐसा नहीं कि पानी की कमी अभी हुई है। दक्षिणी दिल्ली-दिल्ली का सबसे पॉश इलाका। यहाँ न बिजली है न ही पानी। महरौली का प्रसिद्ध है कुतुब मीनार। पर पिछले दिनों दिल्ली में बातें हो रहीं थीं कि महरौली में आठ दिनों में एक बार पानी आता है। ये है दिल्ली का हाल। बिजली की कटौती कईं घंटों तक होती है। और ये तब भी हुआ करती थी जब मॉनसून सामान्य रहा करता था। अब तो मौसम भी दिल्ली का नहीं रहा।

आखिर दिल्ली का है कौन? न लोग, न मौसम, न यहाँ बिजली है, न पानी है..फिर भी इस देश की राजधानी है। जिसके पास कोई साधन नहीं, कोई संसाधन नहीं। ट्रैफ़िक झेल पायें ऐसी सड़कें नहीं। क्या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ राष्ट्रपति का निवास है। या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ से देश चलाया जाता है। आप बतायें.. क्या लाश पर पंद्रह बार गाड़ियाँ चलाने वाली "दिल वालों" की दिल्ली को देश की राजधानी कहलाये जाने का हक़ है?

तपन शर्मा

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13 बैठकबाजों का कहना है :

Nirmla Kapila का कहना है कि -

आज के हालात पर बहुत से आलेख लिखे जाते हैं जिस पर सिर्फ और सिर्फ अव्यवस्थाओं आदि का रोना ही रोया जाता है मगर उसका कोई हल नहीं सुझाया जाता। क्या ऐसा नहीं लगता कि रोना रोने की बजाये इन समस्याओं के हल पर अधिक लिखा जाये? आभार्

विनोद कुमार पांडेय का कहना है कि -

अब तो ऐसे बड़े शहरों मे लोग इन सब बातों का ध्यान ही नही देते..बस खुद को बचा कर चलते है.
वैसे स्थिति तो सोचनीय ही है..

seema gupta का कहना है कि -

आखिर दिल्ली का है कौन? न लोग, न मौसम, न यहाँ बिजली है, न पानी है..फिर भी इस देश की राजधानी है। जिसके पास कोई साधन नहीं, कोई संसाधन नहीं। ट्रैफ़िक झेल पायें ऐसी सड़कें नहीं। क्या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ राष्ट्रपति का निवास है। या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ से देश चलाया जाता है। आप बतायें.. क्या लाश पर पंद्रह बार गाड़ियाँ चलाने वाली "दिल वालों" की दिल्ली को देश की राजधानी कहलाये जाने का हक़ है?
यथार्थ तो यही है जो प्रश्न आपने किया है, न जाने कितनो एक दिलो मे होगा.....मगर जवाब एक के पास भी नहीं.....आज की दिल्ली तो यही है ....

regards

Anonymous का कहना है कि -

who realy care about ur tis nonsense mater ....,,,,,,
realy realy totaly wastge of tame in writng tis article,,,,,,...
beter you read smthing abt how to write good article.....insted of sputiing your 3rd clas thoughts.....,,,,,,,,,

shanno का कहना है कि -

तपन जी,
पानी, बिजली और मौसम के लिये तो सारा देश बेचैन है. इस समस्या का long term के लिये solution क्या है? दिल्ली जैसे बड़े शहर व किसी छोटे कसबे में इन परेशानियों को लेकर कोई अंतर ही नहीं रह गया. बल्कि छोटे कस्बों में देखा गया है की सड़क के किनारे जगह-जगह हर कुछ दूर पर hand pumps लग रहे हैं जिनसे काफी सुविधा हो रही है. उदाहरण के लिये: मैंने ऐसा देखा है बरेली व पीलीभीत जिलों की तरफ. क्या दिल्ली में भी ऐसा है? ट्रैफिक की दशा भी अत्यंत शोचनीय है लेकिन फिर यातायात को कैसे कंट्रोल किया जाये? It seems Delhi is infested with a lot of problems but no one is coming up with any solutions. These problems won't go away in a day or two but without doing something, nothing will happen.

Manju Gupta का कहना है कि -

आलेख गम्भीर सामाजिक समस्या प्रधान है , समाज बनाने वाले आप और हम हैं . जब हम हर समस्या को मैं से जोडेगें तो समस्या का निराकरण होगा .जैसे आबादी न बढाये.jangl n kate .

sumit का कहना है कि -

दिल्ली के बारे में अच्छा लेख लिखा, यहाँ की समस्याओ को भी बताया
हाँ ये बात भी सही है मेहरौली की कुछ जगह पर सात या आठ दिनों में पानी आता है
पर इन समस्याओ का हल सरकार के पास नहीं है हलाकि चुनावो से कुछ दिन पहले bijli और पानी roj aatey they

Shamikh Faraz का कहना है कि -

आपने तो दिल्ली ली पोल खोल कर रख दी. वैसे यह साडी परेशानिया भी छोटे और गरीब इलाकों में ही हैं.वैसे एक बात यह भी है की नेतागड़ जितने लापरवा है तो हैं लेकिन आम लोग भी अपनी सामाजिक जिम्मेदारियां नहीं निभाते हैं. कुछ इस वजह से भी हालत बद से बदतर हो जाते हैं.

तपन शर्मा का कहना है कि -

Non sense matter!!! Who cares!!! wow... I like your thoughts a lot Mr. Anonymous that you are spreading throughout Hindyugm sections... What the high standard thoughts... BTW, I've got an idea.. Why don't you post some article on your blog or on baithak (if you don't mind.. :-) ) so that a standard could be set.. I know you write very good poems/articles.. We want to learn.. so who can be a better teacher than you?
I think you must have got one of your own blog? or that is also hidden from the world? Just like you... Mr. India!!!

Deepali Sangwan का कहना है कि -

Tapan ji

दिल्ली की मुख्यमंत्री कहती हैं कि यातायात में सुधार नहीं हो सकता,जाम तो लगेंगे ही। मतलब उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिये।

sahi kaha, wo to hain hi aisi, madam ko A.C. car chahiye, A.C. Office aur A.C. ghar, saari luxuries aur delhi ki fiqr kare bhagwaan..!!
har baat pe wo yahi kehti hain, koi accident hota hai to kehti hain, logo ko sadak pe chalna nahi aata. kabhi yeh nahi kahengi ki gaadi chalane wale ki galti hai, koi bhi case ho, madam ko bas excuses dene aate hain.
amazing..! aise logo ko fir se dobara gaddi pe baithane wale dilli wale pagal hain ya kuch aur hi jhol hai is mein bhi. strange.

Deepali Sangwan का कहना है कि -

क्या लाश पर पंद्रह बार गाड़ियाँ चलाने वाली "दिल वालों" की दिल्ली को देश की राजधानी कहलाये जाने का हक़ है?

bilkul nahi, agar haal yeh hai to yeh dilli nahi Dhilli hai..
SAMAJH NAHI AATA..kya hoga is desh ka. koi bhi to aage badhne ko taiyaar nahi, aur badhe bhi to kaise, sarkaar mein gundaraj hai, aur aaj ke samay mein krantikari nahi paaye jaate, har koi apni jeb bharne ke chakkar mein hai, kaun kahega ki yeh Aazaad desh hai, balki desh gulaam hai us sarkaar ka, jise vote dekar hum hi chunte hain, aur fir usi ki gulaami karte hain.
aap khud sochiye, ki agar P.M. se milna ho to kya asaan hai, poora drama hota hai, jabki use wahan humne hi pahuchaya hai,
aaj desh ke har ek neta ke paas ek mudda hai, par kisi bhi party mein Desh mein BADHTI MEHNGAAI, kisi ke pas mudda nahi hai,
kisi ko kursi ki padi hai to kisi ko vipaksh ki kursi ki, par desh ko kaun sochta hai, agar neta hi nahi sochenge, to kyun baithe hain wahan. Stange ppl strange delhi

neelam का कहना है कि -

at least tapan has given a thought to this day to day problem ,no body cares about it .
if delhi 's problems r created by over population ,then what about the problems of those remote and very thinly populated areas .means basic needs water ,electricity,transportation is not there ,no progress in real sense will be in our country .
who is this Anonymous???????????????
who doesnot hav any sense to say anything .

Anonymous का कहना है कि -

need to check

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