
हाल ही में एक घटना घटी जब कुछ लोग एक लड़की को छेड़ रहे थे तब एक बुजुर्ग ने बीच-बचाव का प्रयास किया। नतीजा..जान से हाथ धोना पड़ा। हमलावर फ़रार।
बस इश्क मोहब्बत प्यार...
दिल्ली की रिंग रोड। कोई ऐसा समय नहीं जब वाहन सरपट न दौड़ रहे हों। चौबीसों घंटे जाम। एक स्कॉर्पियो आती है, महिला को टक्कर मारकर निकल जाती है। उसके बाद एक के बाद एक, दो-तीन नहीं बल्कि १५ से अधिक गाड़ियाँ उस महिला के ऊपर से गुजरती हैं। रौंगटे खड़े हो जाते हैं लेकिन वीडियो बनाने वाले बनाते रहते हैं और फिर एक चौबीसों घंटे वाले न्यूज़ चैनल की एक घंटे की खबर बनती है। एक कहावत थी-दिल्ली दिल वालों की। थी इसलिये कहा क्योंकि ऐसा कहीं लगता नहीं। हर रो़ज़ बुजुर्ग दम्पत्तियों व महिलाओं पर हमले इस कहावत को निरर्थक साबित करते हैं। ये दुर्घटनायें बताती हैं कि दिल्ली-६ के का गाना दिल्ली की "झूठी" तस्वीर दिखाता है।
अगले वर्ष दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने हैं। हर ओर इसकी तैयारियाँ चल रही हैं। अभी पिछले दिनों दिल्ली में बारिश हुई। एक तो ये मौसम विभाग कमाल का है-जब बारिश नहीं होनी होती तब कहता है मानसून आ गया है। खैर विभाग की बात बाद में। पहले बारिश की। मूसलाधार बारिश हुई। ऐसा नहीं कि पिछले वर्षों में ऐसी बारिश न हुई हो। पर पता नहीं क्यों आठ बजे नोएडा से निकला हुआ मैं जब रात को १२ बजे पीतमपुरा आता हूँ तो अपने आपको खुशनसीब समझता हूँ। मैं उन लोगों में से नहीं था जो बारिश होने पर दो घंटे का सफ़र छह घंटे में पूरा करते हैं। दिल्ली की सड़कों व ट्रैफ़िक की ऐसी बुरी हालत मैंने कभी नहीं देखी। ये दिल्ली है। जो दिल्लीवासियों को सम्भाल नहीं पा रही, वो अगले साल अक्टूबर में १.५ से दो लाख पर्यटकों को कैसे सम्भालेगी? लगता है घर से ही काम करना पड़ेगा। दिल्ली की मुख्यमंत्री कहती हैं कि यातायात में सुधार नहीं हो सकता,जाम तो लगेंगे ही। मतलब उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिये। गौरतलब है कि दिल्ली में हर वर्ष औसतन पाँच लाख लोग नये आते हैं। पर शायद ये हाल कमोबेश हर मेट्रो शहरों का होगा। कुछ वर्ष पहले शीला दीक्षित ने कहा था कि दिल्ली में बाहरी लोग आते रहते हैं और जाते नहीं जिससे व्यवस्था पर असर होता। उनका इशारा यू.पी व बिहार से था। शीला जी ने यह कहते हुए कतई नहीं सोचा कि वे खुद "बाहरी" हैं। तथ्य यही है कि दिल्ली में रहने वाला हर परिवार बाहर से ही आया है। जब से दिल्ली राजधानी बनी है शायद तभी से लोगों ने इसे घर बनाना शुरु किया। आजादी से पहले भी और आजादी के बाद भी कोई हरियाणा, यूपी से आया, कोई पाकिस्तान से तो कोई बिहार से काम खोजने आया।
दिल्ली के न लोग अपने और नही यहाँ के साधन। मसलन न पूरी बिजली यहाँ बनती न ही पानी यहाँ का। बिजली के लिये कभी पंजाब से गिड़गिड़ाते हैं तो कभी पानी के लिये यूपी व हरियाणा से। बिजली पानी की ऐसी कमी है कि दिल्ली अब अधिक बोझ नहीं उठा सकती। पानी की किल्लत से हारकर शीला जी कहती हैं कि जब तक बारिश नहीं होगी तब तक पानी नहीं मिल सकता। और बारिश होती है तो लोगों को मिलता है सिर्फ़ जाम। जाम से याद आया एक और "जाम"। शीला सरकार हर पेट्रोल पम्प व मॉल में "जाम" उपलब्ध करवाने जा रही है। कॉमनवेल्थ खेल आने वाले हैं। पर्यटकों के लिये सुविधा हो जायेगी और कमाई अलग से। मतलब दिल्ली वासियों को हमेशा "जाम" मिल सकेगा। पानी न सही "जाम" ही सही। पर फिलहाल तो ट्रैफ़िक का जाम ही मिल पा रहा है। ऐसा नहीं कि पानी की कमी अभी हुई है। दक्षिणी दिल्ली-दिल्ली का सबसे पॉश इलाका। यहाँ न बिजली है न ही पानी। महरौली का प्रसिद्ध है कुतुब मीनार। पर पिछले दिनों दिल्ली में बातें हो रहीं थीं कि महरौली में आठ दिनों में एक बार पानी आता है। ये है दिल्ली का हाल। बिजली की कटौती कईं घंटों तक होती है। और ये तब भी हुआ करती थी जब मॉनसून सामान्य रहा करता था। अब तो मौसम भी दिल्ली का नहीं रहा।
आखिर दिल्ली का है कौन? न लोग, न मौसम, न यहाँ बिजली है, न पानी है..फिर भी इस देश की राजधानी है। जिसके पास कोई साधन नहीं, कोई संसाधन नहीं। ट्रैफ़िक झेल पायें ऐसी सड़कें नहीं। क्या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ राष्ट्रपति का निवास है। या सिर्फ़ इसलिये कि यहाँ से देश चलाया जाता है। आप बतायें.. क्या लाश पर पंद्रह बार गाड़ियाँ चलाने वाली "दिल वालों" की दिल्ली को देश की राजधानी कहलाये जाने का हक़ है?
तपन शर्मा

मार्कण्डेय