Tuesday, July 13, 2010

विज्ञान की एक सीमा है, प्रकृति असीमित है...

ये टिप्पणी डॉ अरुणा कपूर के ज्योतिषियों पर व्यंग्य के जवाब में झारखंड के बोकारो से आई है...संगीता पुरी हिंदी ब्लॉगिंग पर बेहद सक्रिय हैं...रांची यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एम.ए. के बाद पिताजी की विकसित ज्योतिष की एक नई शाखा गत्यात्मक ज्योतिष पर गूढ़ अध्ययन शुरू किया, जो आज तक जारी है....ज्योतिष को नई तकनीक के ज़रिए ई-पाठकों को पहुंचाने का इनका प्रयास सराहनीय है...ऑक्टोपस की अटकलों पर जब विकसित देश भी आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं तो ज्योतिष में गहरी आस्था रखने वालों का कुढ़ना लाज़मी है...

ऑक्‍टोपस ‘पॉल’ किसी ऋषि महर्षि का अवतार है या फिर उसके मालिकों ने उसे खास प्रकार की शिक्षा दी है या फिर यह संयोग-दुर्योग का खेल, कुछ नहीं कहा जा सकता। क्‍यूंकि विज्ञान मानता है कि जबतक हम किसी चीज के कारण न ढूंढ लें , उस नियम को मानने से ही इंकार कर दें, जबकि मेरे जैसे लोगों का मानना है कि प्रकृति के रहस्‍य असीमित है और विज्ञान की एक सीमा है। जरूरी नहीं कि जिस कारण को हम ढूंढ न सके, वह घटना दुनिया में हो ही नहीं सकती। विश्‍व कप में 'पॉल' नामक ऑक्‍टोपस की एक दो नहीं, सभी भविष्‍यवाणियों के सही साबित होने से दुनियाभर के आम लोगों का विश्‍वास या अंधविश्‍वास..जो भी कहें,बन ही गया है। इसके साथ ही ज्‍योतिष विरोधियों को इसके विरोध के लिए एक महत्‍वपूर्ण बिंदु भी मिल गया है कि जब इस हद तक तो तुक्‍का सही हो सकता है, तो अब तक ज्‍योतिषियों द्वारा की जाने वाली भविष्‍यवाणियां भी तुक्‍का ही थी। वास्‍तव में यदि एक ‘ऑक्‍टोपस’ द्वारा किया जाने वाला तुक्‍का ही इस ढंग से सच होता दिखे, तो फिर ज्‍योतिषीय अध्‍ययन और गणना में दिन-रात खपाने वाले हम ज्‍योतिषियों की मेहनत को कोई महत्‍व नहीं दिया जा सकता।
वर्तमान तो हमेशा मनुष्‍य के हाथ में होता आया है, पर आनेवाले समय और आनेवाली पीढी को कुछ बेहतर स्थिति में बनाने के लिए ही आज तक सबका संघर्ष जारी है। ऐसे में अनिश्चित भविष्‍य को एक निश्चित रूवरूप दे पाने की भला किसकी इच्‍छा न होगी। भविष्‍य का पूर्वानुमान लगाना हमेशा से मनुष्‍य का शगल रहा है। इसके लिए ही वह प्रकृति के हर नियम की जानकारी के लिए बेचैन रहा करता है। वर्षों तक अपने अध्‍ययन के बाद ही हम हर प्रकार के बीज को देखते ही उसको बोए जाने पर होनेवाले पेड़, फूल, फल, बीज और अन्‍य बातों का अनुमान लगा लेते हैं , वह भी तो बीज का भविष्‍य ही है। अब अनुमान करने के बाद बीज मर ही जाए, तो उसमें अनुमान लगानेवालों का क्‍या दोष ?
‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’ इस कहावत से स्‍पष्‍ट है कि बच्‍चों के पालन-पोषण के क्रम में उसके जीवन की उपलब्धियों के बारे में जाना जा सकता है। यह भी तो बच्‍चे के भविष्‍य का पूर्वानुमान ही है, पर इसमें भी कुछ न कुछ अपवाद देखा ही जाता है। इसी प्रकार मौसम, व्‍यापार या अन्‍य क्षेत्रों में भी हम तरह-तरह के आंकड़ों का विश्‍लेषण और उनमें से कुछ तथ्‍यों का तालमेल करते हुए भविष्‍य में होने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्‍त करने की कोशिश करते आ रहे हैं। वर्षों के अनुभव के आधार पर विकसित किए गए सिद्धांतों की वजह से अधिकांश समय घटनाएं हमारे अनुमान के अनुरूप होती है।
इसके बावजूद हमारे ग्रामीण अंचल तक में प्रचलित यह कहावत कि ‘होनी , जानी , पानी , व्‍यासो मुनि न जानी’ भी इस बात की पोल तो खोल ही देती है कि भविष्‍य हमेशा अनिश्चित रहता है और इसे पूर्ण तौर पर समझ पाना मनुष्‍य क्‍या ऋषि और मुनियों के हाथ में भी कभी नहीं रहा। पर ऐसा नहीं है , चाहे कोई भी आधार हो , भविष्‍य के कुछ संकेत तो हमें मिल जाते हैं, पर हमारी महत्‍वाकांक्षा अधिक से अधिक जानने की होती है, यही कारण है कि हम धोखा खा जाते हैं। भविष्‍य जानने के लिए हम किसी बात के गुणात्‍मक पहलू पर ही ध्‍यान दें तो हमें कभी भी निराश नहीं होना पड़ेगा, पर हम सिर्फ गुणात्‍मक की ओर न जाकर संख्‍यात्‍मक पहलू की ओर चले जाते हैं , इससे हमें हमेशा निराशा ही मिल सकती है।
एक उदाहरण देना चाहूंगी कि यदि किसी बीज को देखकर उससे होनेवाले पेड़, फूल और फल की बनावट की चर्चा की जाए , तो हम कभी भी पूर्वानुमान करने में असफल नहीं होंगे। अब वह बीज बोए जाने के बाद सूख जाए और हमारी भविष्‍यवाणी को गलत मान लिया जाए, तो यह लोगों की भूल है। हां, हमारी भूल तब होगी , जब हम इससे आगे बढकर बीज की मज़बूती को देखते हुए इसके पेड की लंबाई-चौडाई और उसमें लगने वाले फल फूल की संख्‍या का आकलन करने लगेंगे। याद रहे, किसी भी चीज का संख्‍यात्‍मक पहलू देश , काल और परिस्थिति के अधीन होता है , इसकी भविष्य‍वाणी नहीं की जा सकती। पर गुणात्‍मक पहलू आंतरिक विशेषता होती है और किसी बीज को देखकर उसकी आंतरिक विशेषताओं का चित्रण किया जा सकता है।
हम जैसे ज्‍योतिषी बच्‍चे के जन्‍म के समय आसमान में मौजूद ग्रहों की स्थिति से बच्‍चे के चरित्र और उसकी जीवनयात्रा का अनुमान लगाते हैं , इसमें हमें काफी हद तक सफलता मिल सकती है। पर इससे लोगों को संतुष्टि नहीं मिलती , वे यहां तक जानना चाहते हैं कि बच्‍चा बडा होकर क्‍या बनेगा, किस अक्षर से शुरू होने वाले देश , शहर या कंपनी में नौकरी करेगा। ये सब बातें देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करती हैं। बस यहीं से भविष्‍यकथन में दिक्‍कतें शुरू होती हैं। इसके साथ हमलोग कुछ महत्‍वपूर्ण घटनाओं का आसमान के ग्रहों से तालमेल बिठाते हुए आने वाली घटनाओं का आकलन करते हैं। पर चाहे जो भी आधार हो , यह समझना चाहिए कि कोई सर्वज्ञ नहीं होता। वैसे भविष्‍य का आकलन करने में गुणात्‍मक पहलू तक जाने में बहुत कम अपवाद होते हैं, पर जैसे ही हम संख्‍यात्‍मक पहलू को लेने लगते हैं, हमें निराशा मिलने लगती है। बेहतर है हम अपनी सीमा के अंदर रहकर भविष्‍य के लिए आकलन करें , इससे न तो किसी की अपेक्षा बढेगी और न ज्‍योतिष का महत्‍व कम हो पाएगा।
तोते या ऑक्‍टोपस द्वारा की जानेवाली शत-प्रतिशत सटीक भविष्‍यवाणियों की जहां तक बात है, वहां कोई आधार नहीं है और इसलिए इसके कारण को ढूंढ पाना किसी के वश का नहीं। जब तक प्रकृति की इच्‍छा होगी , भाग्‍य का साथ मिलता रहेगा , उसकी भविष्‍यवाणियां सही होती रहेगी। पर इस बात को आधार मानकर ज्‍योतिष जैसी दैवी विद्या का मजाक उडाया जाए , तो यह कदापि उचित नहीं!!

संगीता पुरी

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)

22 बैठकबाजों का कहना है :

निर्मला कपिला का कहना है कि -

"जबकि मेरे जैसे लोगों का मानना है कि प्रकृति के रहस्‍य असीमित है और विज्ञान की एक सीमा है। जरूरी नहीं कि जिस कारण को हम ढूंढ न सके, वह घटना दुनिया में हो ही नहीं सकती।"
आपकी इस बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ। बहुत अच्छा लगा आलेख। धन्यवाद।

Deepali Sangwan का कहना है कि -

prakruti jitni athaah hai science ko wahan pahuchne mein janmon lagenge

डॉ. उमेश पुरी 'ज्ञानेश्वर' का कहना है कि -

जो निश्चित है उसे ही जाना जा सकता है। अनिश्चित को कौन जान सका है। संगीता जी का कहना उचित है। उस पर सभी को गौर करना चाहिए। वैसे काल के परिवर्तन के साथ सन्‍दर्भ बदल जाते हैं। समय के साथ साथ परिवर्तन होते रहते हैं, जो स्‍वत: प्रकृति के द्वारा व शोधकत्‍ताओं के द्वारा जो अपने शोध के लिए पूर्ण जीवन तक समर्पण कर देते हैं।

डॉ महेश सिन्हा का कहना है कि -

बिल्कुल सही है की विज्ञान की एक सीमा है, प्रकृति असीमित है...
लेकिन विज्ञान को मानने वाले अपने को स्वमभू मान बैठे हैं

VISHWA BHUSHAN का कहना है कि -

sahmat hoon Sangeeta jee, aapke tarkpoorn kathanon ka bhi jawab naheen

VISHWA BHUSHAN का कहना है कि -

sahmat hoon Sangeeta jee, aapke tarkpoorn kathanon ka bhi jawab naheen

डा. अरुणा कपूर. का कहना है कि -

संगीता जी!... आपने बहुत से प्रश्नों का जवाब सरल भाषा में दे दिया है..और बहुतसी शंकाओं का भी निराकरण किया है, धन्यवाद!.... मैने अपनी टिप्पणी में लिखा ही है सभी प्राणियों में मनुष्य ही सर्वश्रेष्ठ प्राणी है... एक भविष्यवेत्ता जो भविष्यवाणी कर सकता है, वह तोता, ऑक्टोपस या उंट कैसे कर सकता है?..इन प्राणियों से भविष्यवाणी करवानी अटकले लगाने के समान है!... मै तो चाहती हूं कि ज्योतिषशास्त्र में नए आविष्कार भी हो जो ७० से ८० प्रतिशत तक की सटिक भविष्यवाणी समाज को दे सकें!... यह अपेक्षा ज्यादा नहीं है!...!... फिर एक बार धन्यवाद संगीताजी कि मेरे लेख से प्रेरित हो कर आपने यह लेख प्रेषित किया!....बहुर अच्छा लगा!

कुणाल वर्मा का कहना है कि -

ये बात शत-प्रतिशत सही है कि प्रकृति असीमित है और विज्ञान एक सीमा के अन्तर्गत बँधी हुई है।लाजवाब आलेख है।

आभा का कहना है कि -

आप के लेख से सहमत हूँ...

सुधीर का कहना है कि -

प्रकृति की तरह विज्ञान भी असीमित है। यदि विज्ञान सीमित होती तो आज दुनिया इतनी बदली नहीं होती। वह वहीं ठिठकी होती जहां से और जैसी शुरू हुई थी। सीमित है तो सिर्फ आदमी की सोच। यह आदमी की सोच पर ही निर्भर करता है कि वह किसी घटना का रहस्य खोजना चाहेगा या फिर उसे चमत्कार मानकर पूजा करना शुरू कर देगा। यदि वह रहस्य खोज लेगा तो पूरे समाज का भला करेगा। हमने गुरुत्वाकर्षण को जान लिया था फिर उसका तोड़ भी निकाल लिया। अब चांद सितारों तक हमारे राकेट जा रहे हैं। चमत्कार सिर्फ जड़त्व पैदा करता है। विज्ञान जड़ता को तोड़ता है। इस सबके बावजूद यह आपकी सोच पर निर्भर है कि आपको विज्ञान सीमित लगता है। तो मैं एक सवाल पूछता हूं विज्ञान भविष्य में और कितना आगे जा सकता है, मुझे नहीं लगता कि कोई इसकी सीमा बता सकता है।

ललित शर्मा का कहना है कि -

अच्छी पोस्ट,बेहतरीन ज्ञानवर्धक आलेख
संगीता जी का आभार

यह पोस्ट ब्लाग4वार्ता पर भी है

संगीता पुरी का कहना है कि -

सुधीर जी .. मेरे कहने का अर्थ यह है कि प्रकृति की असीमितता के कारण विज्ञान के नियम हर युग और काल में सीमित होते हैं .. और जब भी मैं ज्‍योतिष की चर्चा करती हूं .. आप पाठक चमत्‍कार को बीच में क्‍यूं ले आते हैं .. चमत्‍कार का ज्‍योतिष जैसे वैज्ञानिक विषय से कोई लेना देना नहीं .. और जहां तक ज्‍योतिष का सवाल है .. यान्रि ग्रहों के पृथ्‍वी पर पडनेवाले प्रभाव के रहस्‍य का विज्ञान .. दूसरे विज्ञान की तरह यह भी बहुत आगे जा सकता है .. पर लोगों की ऐसी मानसिकता बनी हुई है कि इसे जड समझते हैं .. खुले आसमान की तरह ही ज्‍योतिष(ग्रहों का पृथ्‍वी के जड चेतन पर पडनेवाले प्रभाव का विज्ञान) में रिसर्च की अनगिनत संभावनाएं हैं .. दुर्भाग्‍य ही है कि अभी तक वैज्ञानिकों का ध्‍यान उधर नहीं गया !!

डॉ महेश सिन्हा का कहना है कि -

कोई इन्हे नाड़ी ज्योतिष के बारे में बताये .
रही बात विज्ञान की तो उसे जाना कहाँ सब यहीं है उसे अभी ढूँढ नहीं पाया है .
विज्ञान ने सुख दिये तो आज दुख भी बहुत दे रहा है

सुधीर का कहना है कि -

संगीता जी विज्ञान आदमी की जिज्ञासा है और वह किसी भी युग में सीमित नहीं रही है। जहां तक ज्योतिष का सवाल है तो मुझे आपके इस जवाब से खुशी हो रही है कि यह भी एक विज्ञान है। हां यह एक शुरुआती विज्ञान, इसके गणतीय सूत्र और भृगुकाल में ही ३८० डिग्री की परिकल्पना, ग्रहों की गति का आकलन बेमिसाल है, मगर जहां तक इसका भविष्यवाणी वाला हिस्सा है, वह किसी अधूरी रिसर्च का हिस्सा है, जिसे या तो बाद में खारिज कर दिया गया होगा या किसी और वजह से बीच में रोक दिया गया। क्योंकि ज्योतिष का सारा काम पंचांग से पत्रा बनाने तक अभी तक मूल रूप में है, जबकि किसी एक घटना को लेकर अगर आप पांच ज्योतिषियों (विषय की अच्छी जानकारी लेकर) से राय लेते हैं तो जरूरी नहीं कि उनका जवाब एक ही हो। उनके पास आपको पांच अलग जवाब भी मिल सकते हैं। जबकि आप अगर उन पांचों से जन्मकुंडली बनवाएं तो वे सभी एक जैसी ही बनाएंगे। यह गणित है और कंप्यूटर से बनाते हैं तो भी वह वही बनेगी। मेरा अपना अनुभव तो यह है कि इनमें से ज्यादातर ज्योतिषि एक-दूसरे को कम जानकार भी बताएंगे। अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपनी तत्काल बुद्धि का ही इस्तेमाल कर तर्क देंगे। कोई सिद्धांत दें यह जरूरी नहीं। रही बात ज्योतिष को चमत्कार कहने की तो वह पाठक नहीं कहते हैं। ज्योतिषि ही उसे चमत्कार के रूप में प्रचारित करते रहे हैं। यह प्रचार इसलिए किया गया तकि लोग उसके पीछे के तर्क न पूछे जो उनके पास भी नहीं होते। इसलिए ज्योतिष में विज्ञान के साथ साथ अंधविश्वास मिलाकर जो कॉकटेल बनाया गया है, उसीने इसको नुकसान पहुंचाया है।

जहां तक डॉ. महेश सिन्हा के नाड़ी ज्योतिष का सवाल है, उसके बारे में मैंने सुना अवश्य है, लेकिन नहीं जानता कि यह क्या है, मैं जानना चाहूंगा। इस संबंध में कोई लिटरेचर हो तो बताएं। मैं पढ़ना चाहूंगा। संभव है इसका भी कोई वैज्ञानिक आधार हो। खोट विज्ञान और ज्योतिष में नहीं है, खोट हमारी सोच में है जो विज्ञान से ज्यादा चमत्कार को तरजीह देती है। चमत्कार हमारी सोच के दरवाजे बंद करता है और विज्ञान उन्हें खोलता है। विज्ञान कोई थर्ड पर्सन नहीं है। विज्ञान आप खुद हैं, आपकी जिज्ञासा है, जिसे अंधविश्वासों से बंधक बनाया जाता है और हम कहते हैं कि विज्ञान दुख देती है। चूंकि विज्ञान हम खुद हैं इसलिए जैसी हमारी नियत होगी वैसा ही रिएक्शन होगा। दुखों के लिए हमारा दोहन और साम्राज्यवादी प्रवृत्ति है। इन्सान की यह प्रवृत्ति है कि वह अपने कृत्यों का दोष देने के लिए हमेशा थर्ड पर्सन की तलाश में रहता है, ऐसे में विज्ञान उसके हाथ आती है और चमत्कार उसके आगे तो वह आंख मूंद कर घुटने टेक देता है।

विश्व दीपक का कहना है कि -

जब तक प्रकृति की इच्‍छा होगी , भाग्‍य का साथ मिलता रहेगा , उसकी भविष्‍यवाणियां सही होती रहेगी। पर इस बात को आधार मानकर ज्‍योतिष जैसी दैवी विद्या का मजाक उडाया जाए , तो यह कदापि उचित नहीं!!

संगीता जी,
आपकी इस बात से मैं शत-प्रतिशत सहमत हूँ। हमारे पूर्वजों की यह विद्या अगर गलत या पथ से विमुख करने वाली होती तो आजकल इसे विज्ञान की श्रेणी में नहीं डाला जाता।

अब चूँकि हम सभी यह मान रहे हैं कि ज्योतिष भी एक विज्ञान है तो फिर "ज्योतिष" और "विज्ञान" के बीच एक झंझट पैदा कर लड़ने की क्या जरूरत है।

-विश्व दीपक

vinay का कहना है कि -

मेने एक लेख लिखा था,जिसका आशय यही था, सीमित विज्ञान कैसे खोजेगा असीमित ज्ञान,इस लेख में मेने ज्योतीष का प्रसंग भी लिया था,सहमत हूँ,संगीता जी से अक्षरश:

संगीता पुरी का कहना है कि -

@ मगर जहां तक इसका भविष्यवाणी वाला हिस्सा है, वह किसी अधूरी रिसर्च का हिस्सा है, जिसे या तो बाद में खारिज कर दिया गया होगा या किसी और वजह से बीच में रोक दिया गया।

आज भी अपने परंपरागत ज्ञान की जानकारी हमें चौंका देती है .. ज्‍योतिष को हम छोड भी दें तो चाहे वैदिक गणित हो या आयुर्वेद या फिर हमारी परंपरागत जीवनशैली .. जिससे हजारों वर्षों के बाद भी न तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचा और न ही हमारे नैतिक मूल्‍यों को .. पर हम आज सीधा उन्‍हें नकार देते हैं .. ज्‍योतिष को खारिज किए जाने या बीच में रोके जाने में भी किसी की कोई चाल हो सकती है .. इसे भी हमें स्‍वीकारना चाहिए .. या इसमें रिसर्च अधूरा है तो उसे पूरा किया जाना चाहिए .. ज्‍योतिष के क्षेत्र में हमारे भ्रम का कारण इससे अधिक अपेक्षा रखा जाना है .. किसी भी क्षेत्र के विशेषज्ञ से जितनी उम्‍मीद रखते हैं .. एक ज्‍योतिषविद से उससे भी कम उम्‍मीद रखी जानी चाहिए .. क्‍यूंकि इस क्षेत्र में समर्पित लोगों को कोई सुविधा नहीं मिल पा रही .. और जहां तक चमत्‍कार दिखाने या लोगों को भ्रमित करनेवाले ज्‍येतिषियों के कारण ज्‍योतिष जैसे पवित्र विषय को बदनाम करने के पहले ये सोंच लें .. कि क्‍या किसी की किडनी निकालने वाले डॉक्‍टर को दोष न देते हुए मेडिकल साइंस पर दोषारोपण किया जा सकता है ??

संगीता पुरी का कहना है कि -

इस लिंक में क्लिक कर देखे .. क्‍या वैज्ञानिकों का यह व्‍यवहार उचित है ....
हेड या टेल : यह ज्‍योतिष का नहीं आंकडों का खेल है

डॉ महेश सिन्हा का कहना है कि -

http://www.nadi-astrology.org/History.ASP
http://en.wikipedia.org/wiki/Nadi_astrology

aniruddha का कहना है कि -

ज्योतिष अपने आप में बहुत ही गहरा और बहुत ही कठिन विज्ञान है. आज जो भी भ्रम की स्थिति बनी है ज्योतिष को लेकर व इसलिए है कि उसे जानने वाले लोग नहीं हैं. जो लोग उसे जानने का दावा करते हैं वे अधकचरे ज्ञान के साथ दुकान खोल लेते हैं जबकि असलियत ये है कि अगर कोई सचमुच इसका अध्ययन करना चाहे तो पूरा जीवन लग सकता है लेकिन लोग कुछ कामचलाऊ बातें सीख कर दुकान खोल देते हैं और इस हिसाब से मैं भी एक दुकान खोल सकता हूँ क्योंकि ज्योतिष की कुछ जानकारी मुझे है लेकिन उसे और गहराई से जब मैं पढने लगा तब मुझे समझ में आया कि ये १०-१५ मिनट का काम नहीं, इसे फुल-टाइम देना पड़ेगा.
एक और बात मैं कहना चाहूँगा जो सबसे महत्वपूर्ण है वो ये कि जिस तरह एक अच्छा डॉक्टर होना सिर्फ डिग्री पर निर्भर नहीं करता, वो उस डॉक्टर की व्यक्तिगत योग्यताओं पर भी निर्भर है कि उसमे इंटेलिजेंस कितना है, उसकी समझ कितनी अच्छी है और किसी भी लक्षण को जानकार वो कितना सटीक अनुमान लगा सकता है, उसी तरह ज्योतिष कितना विश्वसनीय है ये ज्योतिषी की की व्यग्तिगत क्षमताओं पर निर्भर करता है कि वो थोड़े में कितना ज्यादा समझ सकता है.
एक बात और यहाँ उठी है कि हम अपनी हर चीज़ को बेकार क्यों मानते हैं, मैं बिलकुल सहमत हूँ इस बात से कि भारतीय कोई भी बात तब तक नहीं मानते जब तक वो विदेश से घूम के नहीं आ जाए. योग का उदाहरण ले लीजिये, जब तक वो योग नहीं हो गया तब तक अपने देश में उसे इज्ज़त नहीं मिली और आज हर कोई योग करना चाहता है, अब तो पॉवर योग भी आ गया है. इसी तरह जब तक कुछ विदेशी ज्योतिष सीख नहीं लेंगे और अमेरिका में लोग उसे हॉट नहीं कहने लगेंगे अपने देश में उसकी इज्ज़त नहींहोगी

aniruddha का कहना है कि -

ज्योतिष अपने आप में बहुत ही गहरा और बहुत ही कठिन विज्ञान है. आज जो भी भ्रम की स्थिति बनी है ज्योतिष को लेकर व इसलिए है कि उसे जानने वाले लोग नहीं हैं. जो लोग उसे जानने का दावा करते हैं वे अधकचरे ज्ञान के साथ दुकान खोल लेते हैं जबकि असलियत ये है कि अगर कोई सचमुच इसका अध्ययन करना चाहे तो पूरा जीवन लग सकता है लेकिन लोग कुछ कामचलाऊ बातें सीख कर दुकान खोल देते हैं और इस हिसाब से मैं भी एक दुकान खोल सकता हूँ क्योंकि ज्योतिष की कुछ जानकारी मुझे है लेकिन उसे और गहराई से जब मैं पढने लगा तब मुझे समझ में आया कि ये १०-१५ मिनट का काम नहीं, इसे फुल-टाइम देना पड़ेगा.
एक और बात मैं कहना चाहूँगा जो सबसे महत्वपूर्ण है वो ये कि जिस तरह एक अच्छा डॉक्टर होना सिर्फ डिग्री पर निर्भर नहीं करता, वो उस डॉक्टर की व्यक्तिगत योग्यताओं पर भी निर्भर है कि उसमे इंटेलिजेंस कितना है, उसकी समझ कितनी अच्छी है और किसी भी लक्षण को जानकार वो कितना सटीक अनुमान लगा सकता है, उसी तरह ज्योतिष कितना विश्वसनीय है ये ज्योतिषी की की व्यग्तिगत क्षमताओं पर निर्भर करता है कि वो थोड़े में कितना ज्यादा समझ सकता है.
एक बात और यहाँ उठी है कि हम अपनी हर चीज़ को बेकार क्यों मानते हैं, मैं बिलकुल सहमत हूँ इस बात से कि भारतीय कोई भी बात तब तक नहीं मानते जब तक वो विदेश से घूम के नहीं आ जाए. योग का उदाहरण ले लीजिये, जब तक वो योग नहीं हो गया तब तक अपने देश में उसे इज्ज़त नहीं मिली और आज हर कोई योग करना चाहता है, अब तो पॉवर योग भी आ गया है. इसी तरह जब तक कुछ विदेशी ज्योतिष सीख नहीं लेंगे और अमेरिका में लोग उसे हॉट नहीं कहने लगेंगे अपने देश में उसकी इज्ज़त नहींहोगी

सुधीर का कहना है कि -

जब भविष्यवाणियां सही निकलती हैं तो वे समाज के लिए ज्यादा खतरनाक होती हैं, क्योंकि वे खूब प्रचार पाती हैं और समाज में भ्रम और अंधविश्वास को बढ़ाती हैं। जहां तक झूठी निकलने वाली भविष्यवाणियां हैं तो उनका प्रचार नहीं हो पाता और इसलिए वे समाज का भ्रम आज तक नहीं तोड़ पायी हैं। भले ही झूठी निकलने वाली भविष्यवाणियों की संख्या ज्यादा हो।
जहां तक पूत के पांव पालने में देखने की बात है तो वह आपमें पूर्वाग्रह पैदा कर सकता है। इसलिए पालने में देखने की वजाय पूत के पांव परिवरिश कर संवारने चाहिए।

विस्तार से पढ़ें --
http://sudhirraghav.blogspot.com/

आप क्या कहना चाहेंगे? (post your comment)