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Tuesday, July 13, 2010

विज्ञान की एक सीमा है, प्रकृति असीमित है...

ये टिप्पणी डॉ अरुणा कपूर के ज्योतिषियों पर व्यंग्य के जवाब में झारखंड के बोकारो से आई है...संगीता पुरी हिंदी ब्लॉगिंग पर बेहद सक्रिय हैं...रांची यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र में एम.ए. के बाद पिताजी की विकसित ज्योतिष की एक नई शाखा गत्यात्मक ज्योतिष पर गूढ़ अध्ययन शुरू किया, जो आज तक जारी है....ज्योतिष को नई तकनीक के ज़रिए ई-पाठकों को पहुंचाने का इनका प्रयास सराहनीय है...ऑक्टोपस की अटकलों पर जब विकसित देश भी आंख मूंदकर भरोसा कर रहे हैं तो ज्योतिष में गहरी आस्था रखने वालों का कुढ़ना लाज़मी है...

ऑक्‍टोपस ‘पॉल’ किसी ऋषि महर्षि का अवतार है या फिर उसके मालिकों ने उसे खास प्रकार की शिक्षा दी है या फिर यह संयोग-दुर्योग का खेल, कुछ नहीं कहा जा सकता। क्‍यूंकि विज्ञान मानता है कि जबतक हम किसी चीज के कारण न ढूंढ लें , उस नियम को मानने से ही इंकार कर दें, जबकि मेरे जैसे लोगों का मानना है कि प्रकृति के रहस्‍य असीमित है और विज्ञान की एक सीमा है। जरूरी नहीं कि जिस कारण को हम ढूंढ न सके, वह घटना दुनिया में हो ही नहीं सकती। विश्‍व कप में 'पॉल' नामक ऑक्‍टोपस की एक दो नहीं, सभी भविष्‍यवाणियों के सही साबित होने से दुनियाभर के आम लोगों का विश्‍वास या अंधविश्‍वास..जो भी कहें,बन ही गया है। इसके साथ ही ज्‍योतिष विरोधियों को इसके विरोध के लिए एक महत्‍वपूर्ण बिंदु भी मिल गया है कि जब इस हद तक तो तुक्‍का सही हो सकता है, तो अब तक ज्‍योतिषियों द्वारा की जाने वाली भविष्‍यवाणियां भी तुक्‍का ही थी। वास्‍तव में यदि एक ‘ऑक्‍टोपस’ द्वारा किया जाने वाला तुक्‍का ही इस ढंग से सच होता दिखे, तो फिर ज्‍योतिषीय अध्‍ययन और गणना में दिन-रात खपाने वाले हम ज्‍योतिषियों की मेहनत को कोई महत्‍व नहीं दिया जा सकता।
वर्तमान तो हमेशा मनुष्‍य के हाथ में होता आया है, पर आनेवाले समय और आनेवाली पीढी को कुछ बेहतर स्थिति में बनाने के लिए ही आज तक सबका संघर्ष जारी है। ऐसे में अनिश्चित भविष्‍य को एक निश्चित रूवरूप दे पाने की भला किसकी इच्‍छा न होगी। भविष्‍य का पूर्वानुमान लगाना हमेशा से मनुष्‍य का शगल रहा है। इसके लिए ही वह प्रकृति के हर नियम की जानकारी के लिए बेचैन रहा करता है। वर्षों तक अपने अध्‍ययन के बाद ही हम हर प्रकार के बीज को देखते ही उसको बोए जाने पर होनेवाले पेड़, फूल, फल, बीज और अन्‍य बातों का अनुमान लगा लेते हैं , वह भी तो बीज का भविष्‍य ही है। अब अनुमान करने के बाद बीज मर ही जाए, तो उसमें अनुमान लगानेवालों का क्‍या दोष ?
‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’ इस कहावत से स्‍पष्‍ट है कि बच्‍चों के पालन-पोषण के क्रम में उसके जीवन की उपलब्धियों के बारे में जाना जा सकता है। यह भी तो बच्‍चे के भविष्‍य का पूर्वानुमान ही है, पर इसमें भी कुछ न कुछ अपवाद देखा ही जाता है। इसी प्रकार मौसम, व्‍यापार या अन्‍य क्षेत्रों में भी हम तरह-तरह के आंकड़ों का विश्‍लेषण और उनमें से कुछ तथ्‍यों का तालमेल करते हुए भविष्‍य में होने वाली घटनाओं के बारे में जानकारी प्राप्‍त करने की कोशिश करते आ रहे हैं। वर्षों के अनुभव के आधार पर विकसित किए गए सिद्धांतों की वजह से अधिकांश समय घटनाएं हमारे अनुमान के अनुरूप होती है।
इसके बावजूद हमारे ग्रामीण अंचल तक में प्रचलित यह कहावत कि ‘होनी , जानी , पानी , व्‍यासो मुनि न जानी’ भी इस बात की पोल तो खोल ही देती है कि भविष्‍य हमेशा अनिश्चित रहता है और इसे पूर्ण तौर पर समझ पाना मनुष्‍य क्‍या ऋषि और मुनियों के हाथ में भी कभी नहीं रहा। पर ऐसा नहीं है , चाहे कोई भी आधार हो , भविष्‍य के कुछ संकेत तो हमें मिल जाते हैं, पर हमारी महत्‍वाकांक्षा अधिक से अधिक जानने की होती है, यही कारण है कि हम धोखा खा जाते हैं। भविष्‍य जानने के लिए हम किसी बात के गुणात्‍मक पहलू पर ही ध्‍यान दें तो हमें कभी भी निराश नहीं होना पड़ेगा, पर हम सिर्फ गुणात्‍मक की ओर न जाकर संख्‍यात्‍मक पहलू की ओर चले जाते हैं , इससे हमें हमेशा निराशा ही मिल सकती है।
एक उदाहरण देना चाहूंगी कि यदि किसी बीज को देखकर उससे होनेवाले पेड़, फूल और फल की बनावट की चर्चा की जाए , तो हम कभी भी पूर्वानुमान करने में असफल नहीं होंगे। अब वह बीज बोए जाने के बाद सूख जाए और हमारी भविष्‍यवाणी को गलत मान लिया जाए, तो यह लोगों की भूल है। हां, हमारी भूल तब होगी , जब हम इससे आगे बढकर बीज की मज़बूती को देखते हुए इसके पेड की लंबाई-चौडाई और उसमें लगने वाले फल फूल की संख्‍या का आकलन करने लगेंगे। याद रहे, किसी भी चीज का संख्‍यात्‍मक पहलू देश , काल और परिस्थिति के अधीन होता है , इसकी भविष्य‍वाणी नहीं की जा सकती। पर गुणात्‍मक पहलू आंतरिक विशेषता होती है और किसी बीज को देखकर उसकी आंतरिक विशेषताओं का चित्रण किया जा सकता है।
हम जैसे ज्‍योतिषी बच्‍चे के जन्‍म के समय आसमान में मौजूद ग्रहों की स्थिति से बच्‍चे के चरित्र और उसकी जीवनयात्रा का अनुमान लगाते हैं , इसमें हमें काफी हद तक सफलता मिल सकती है। पर इससे लोगों को संतुष्टि नहीं मिलती , वे यहां तक जानना चाहते हैं कि बच्‍चा बडा होकर क्‍या बनेगा, किस अक्षर से शुरू होने वाले देश , शहर या कंपनी में नौकरी करेगा। ये सब बातें देश, काल और परिस्थिति पर निर्भर करती हैं। बस यहीं से भविष्‍यकथन में दिक्‍कतें शुरू होती हैं। इसके साथ हमलोग कुछ महत्‍वपूर्ण घटनाओं का आसमान के ग्रहों से तालमेल बिठाते हुए आने वाली घटनाओं का आकलन करते हैं। पर चाहे जो भी आधार हो , यह समझना चाहिए कि कोई सर्वज्ञ नहीं होता। वैसे भविष्‍य का आकलन करने में गुणात्‍मक पहलू तक जाने में बहुत कम अपवाद होते हैं, पर जैसे ही हम संख्‍यात्‍मक पहलू को लेने लगते हैं, हमें निराशा मिलने लगती है। बेहतर है हम अपनी सीमा के अंदर रहकर भविष्‍य के लिए आकलन करें , इससे न तो किसी की अपेक्षा बढेगी और न ज्‍योतिष का महत्‍व कम हो पाएगा।
तोते या ऑक्‍टोपस द्वारा की जानेवाली शत-प्रतिशत सटीक भविष्‍यवाणियों की जहां तक बात है, वहां कोई आधार नहीं है और इसलिए इसके कारण को ढूंढ पाना किसी के वश का नहीं। जब तक प्रकृति की इच्‍छा होगी , भाग्‍य का साथ मिलता रहेगा , उसकी भविष्‍यवाणियां सही होती रहेगी। पर इस बात को आधार मानकर ज्‍योतिष जैसी दैवी विद्या का मजाक उडाया जाए , तो यह कदापि उचित नहीं!!

संगीता पुरी