24 जुलाई का नवभारत टाइम्स पढा...मुखपृष्ठ पर ही खबर थी कि..'घर की नारी और भिखारी एक बराबर'... यहीं से जानकारी मिली कि जनगणना में कुछ लोगों को गैरकमाऊ लोगों की श्रेणी में रखा गया है!...इनमें गृहिणियां, भिखारी, कैदी और वेश्याएं है!... हद हो गई!... जो स्त्रियां घर में सारा दिन बच्चों के लिए और पतियों के लिए खटती रहती है....खाना बनाना, कपडे धोना, घर की सफाई और...और भी बहुत-से काम करती हैं...उनको गैरकमाऊ की श्रेणी में जगह देना क्या न्यायसंगत है?....अगर गृहिणियां घर नहीं संभालेगी तो पुरुष बाहर के काम कैसे कर पाएंगे?... पुरुष के बाराबर ही कमाई का श्रेय एक स्त्री को भी जाता है!... सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में केन्द्र सरकार को निर्देश दिया है कि महिलाओं का नए सिरे से सम्मानजनक मूल्यांकन करें!.. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक स्त्री के सड़क हादसे से मारे जाने पर उसके परिवार को पर्याप्त मुआयजा देने से इन्कार किया था..क्यों कि गृहिणियों की हैसियत महज 1250 रु.प्रतिमाह आंकी गई है!....इस पर सुप्रीम कोर्ट ने मुआवज़े की रकम रु.600000 दिलवाई है!..और कहा है कि गृहिणियों को भिखारी, कैदी और वेश्याओं की श्रेणी में रखना अपमानजनक है!..... क्या भारत सरकार की आंखें अब भी खुलेगी?.... अगर 'मेरा देश महान' कहने वाले नेता जब अपनी ही मां, बहनें और पत्नियों को सम्मानजनक स्थान नहीं दे पाते तो...इस देश की छवि दुनिया के सामने कैसी होगी?
डॉ अरुणा कपूर

मार्कण्डेय