पुरी- उड़ीसा में एक ऐसा धर्म-स्थल जो रथयात्रा के लिये विश्व-प्रसिद्ध है। यहाँ देश-विदेश से भक्त जगन्नाथ(कृष्ण) भगवान के दर्शन करने आते हैं। मैं भी वहाँ गया, लेकिन पता नहीं क्यों, पर मुझे वहाँ ऐसा कुछ नहीं लगा कि मैं कह सकूँ ये भारत के प्रथम ४ मंदिरों में से एक है। या चार धामों में से एक। इसकी मान्यता बहुत अधिक है और मन्नत माँगने के लिये लोग पैदल चल कर पहुँचते हैं। लेकिन मेरे अनुभव कुछ और ही थे। मुझे वहाँ जा कर कोई खुशी नहीं मिली बल्कि दुख और आक्रोश लेकर लौटा।
हमारी गाड़ी अभी पार्किंग में ठीक से खड़ी भी नहीं हुई थी कि एक पंडा गाड़ी के बाहर आकर खड़ा हो गया। हमें शक हो गया कि अब यह पीछा छोड़ने वाला नहीं है। हमारे देश में पंडों का प्रोफेशन चोर के समान हो गया है। धार्मिक आड़ लेकर लोगों को लूटते हैं। हमें बताने लगा कि भगवान के दर्शन करायेगा, प्रसाद चढ़वायेगा, मंदिर के बारे में बतायेगा..वगैरह वगैरह और बदले में जो ’प्रेम स्वरूप’ हम देंगे वो ले लेगा। भगवान के दर्शन करवाने के पैसे...भगवान बिकाऊ हैं इस देश में...मंदिर के बाहर भगवान जगन्नाथ की छोटी प्रतिमा बेचने वाला ६० रूपये से २० रूपये पर आ गया.. धर्म स्थल पर आये हो तो यहाँ कि कोई निशानी लेकर जाओ,,भगवान का अपमान न करो... मार्केटिंग की भेंट चढ़ चुके हैं जगन्नाथ मंदिर के ’भगवान’।
अंदर घुसने लगे तो वो पंडा हमारे मना करने पर भी हमारे पीछे-पीछे आने लगा। पास से आवाज़ आई.... इस मंदिर में मुसलमानों, ईसाइयों अथवा कोई भी गैर-हिन्दू धर्म के लोग नहीं जाते.. बाहर दरवाजे पर पशुपतिनाथ जी की मूर्ति के दर्शन कर के लौट जाते हैं। अजब है इंसान भी। एक ही भगवान को अलग-अलग नाम दे कर बाँटा... फिर धर्म के नाम पर बाँटा..अब धार्मिक स्थानों को भी बाँट दिया। इसके बारे में क्या तथ्य दिया जाये? सुना है कि तिरुपति मंदिर के कुछ दूरी के घेरे तक गैर हिन्दू नहीं रह सकते। सही जा रहा है इंसान...मैंने पंडे से कारण पूछा तो उसने कहा कि यह हिन्दुओं का मंदिर है....इंदिरा गाँधी तक को अंदर नहीं घुसने दिया था!!!
थोड़ी आगे और गये। पंडे ही पंडे भरे हुए थे। भक्त व सैलानी कम थे..बाबाओं का हुजूम अधिक था। अगले दिन गोविंद द्वादशी जो थी। मना करने पर भी वो पंडा अभी भी हमारा पीछा कर रहा था। हम प्रसाद लेने पहुँचे। अलग अलग तरह के प्रसाद की लिस्ट। माफ कीजिये नाम तो मैं भूल गया। १११ रू से लेकर ५००० रू तक के प्रसाद शायद उससे भी ज्यादा.. मुझे इतना ही याद है। भगवान पैसे से खुश होते हैं। आप जितने पैसे अधिक देकर प्रसाद चढ़ायेंगे, भगवान आपसे और अधिक प्रसन्न होंगे। वैष्णों मंदिर और पुरी जैसे बड़े मंदिरों में जाकर जब इतना सब देखता हूँ तो दुखी हो जाता हूँ। खैर मुझे केवल प्रसाद लेना था... सो १११ रू वाला लिया और वो ही मुझे काफी लगा। प्रसाद आपको ऐसे नहीं मिलेगा। नाम और गौत्र बताना पड़ेगा। पर्ची पर लिखा जायेगा। हिन्दू हो तो सुबूत दो!!!
यहाँ हमारा पीछा उस "धार्मिक चोर" से छूट चुका था। माफी चाहता हूँ अगर किसी का दिल दुखा इन शब्दों से पर मुझे तो ऐसा ही लगता है। आगे बढ़े तो पग पग पर कोई न कोई पंडा हमारा प्रसाद छीनने की कोशिश करने लगता। न ठीक से हाथ जोड़ पाया न भगवान की मूर्ति को देख पाया। न दर्शन कर पाया। आरती लेने से पहले थाली में "भेंट" चढ़ाई जाती है। प्रसाद का भोग लगाने के लिये भी आपको जेब ढीली करनी ही पड़ेगी। उससे आप बच नहीं सकते। हम तो नहीं बच पाये। एक नहीं तो दूसरा चोर। यकीन मानिये मंदिर परिसर में और भी दर्जनों छोटे-बड़े मंदिर हैं लेकिन हमारा मूड इतना खराब हो चुका था कि हमने कहीं दर्शन नहीं करे और न ही इच्छा हुई। सबसे बड़े भगवान के "बड़े बड़े भक्त" जो उनके आगे-पीछे घूमते रहते हैं, बस उन्हीं के ही दर्शन हो पाये। चढ़ावे का क्या होता है ये तो वहाँ बैठा हुआ भगवान ही जाने। कोई साफ-सफाई नहीं। कहीं कोई इंतजाम नहीं। पता नहीं "वो" अपने इन "बड़े भक्तों" को कैसे झेलता है। हमारा तो आधा घंटा भी वहाँ रहना दूभर हो गया।
आप में से कोई भी यदि पुरी में दर्शन करने की सोचे तो धैर्य और चौकसी बहुत बरते, वरना हालत हमारे जैसी हो जायेगी। या फिर चोरों को "दान" कर दे। हमारे मंदिरों में माँगने का भी एक रिवाज़ है। वापस आते हुए किसी एक ने कहा कि ग्रंथों मे दान को महान कहा गया है। मैंने मन में सोचा कि भीख माँगना भी तो अपराध समान माना गया है।
क्या आपको लगता है कि यदि ऐसे ही हालात रहते हैं तो आने वाले कईं सौ साल तक भी हम तरक्की कर सकते हैं? धर्म को धर्म रहने दो...इसे पेशा मत बनाओ। बड़े मंदिरों ने ईश्वर को बेचने का धंधा बना रखा है और यही लोग खेलते हैं भक्तों की भावनाओं से।
तपन शर्मा

मार्कण्डेय