Monday, April 12, 2010

भारतीय लोकतंत्र की छोटी-छोटी बातें

~अरुण कुमार उरांव


लखनऊ स्टेशन से दिल्ली वापसी के लिए वहां के ‘आज का आरक्षण’ टिकट खिड़की पर जब पहुंचा तो अंदर बैठे व्यक्ति ने बताया कि यह टिकट गाड़ी खुलने के दो घंटे पहले से मिल सकता है। मैं दो घंटे बाद फिर वहां पहुंचा। खिड़की के पीछे बैठे व्यक्ति ने एक अजीब सवाल पूछा कि क्या तुम्हारे घर का कोई सदस्य रेलवे में काम करता है। मैंने जवाब दिया- ‘नहीं'। इसके बाद उसने कहा कि ‘आज का आरक्षण’ का वक्त अब खत्म हो चुका है, इसलिए जेनरल यानी सामान्य श्रेणी का टिकट लेकर जाओ। उसकी इन बातों के साथ मैं उसी के बगल में बैठे एक दूसरे कर्मचारी की बात भी सुन रहा था कि दे दो यार, अभी तो इस गाड़ी में काफी सीटें हैं।

खैर, मेहरबानी के लहजे में उस व्यक्ति ने मुझे आरक्षण का आवेदन भर कर लाने को कहा और उसी लहजे में उसने मुझे टिकट भी दिया। मैंने टिकट के जो पैसे दिए उसमें बचे हुए दो रुपए मांगने पर उसने झुंझला कर बाद में आने को कहा, जैसे मैंने अपने बचे हुए नहीं, उसके पैसे मांगे हों। इस बीच उसने मेरे आरक्षण फॉर्म पर लिखा मेरा नाम पढ़ा और मेरा
रंग-रूप तो इस बात की गवाही दे ही रहा था कि मैं क्या हूं। सो, उसने बिना किसी हिचक के यह टिप्पणी की कि ‘सब जगह आरक्षण से ही चलोगे क्या...? दो रुपए के लिए हल्ला मचा रहे हो। इतना भी समझ नहीं आता है कि दो-चार रुपए
रेलवे काउंटर पर वापस नहीं मिलता है! सब दिन जंगली ही रहोगे! दो रुपए वापस लेना है तो जाओ तीन रुपए लेकर आओ।’

बात आगे नहीं बढ़ी क्योंकि एक दूसरे मित्र ने मामले को टाल देने को कहा। इसके बाद उस मित्र ने कहा कि दो-तीन रुपए क्या चीज हैं कि तुम इसके लिए झगड़ा कर लेते हो। लेकिन बात यहां दो रुपए की नहीं थी। मैंने मांगा तब वह झुंझला उठा। ऐसे हजारों लोग रोज गाड़ी छूटने के डर से, खिड़की के पार बैठे व्यक्ति की घुड़की से डर कर, खुदरा नहीं होने या इसी तरह दो-तीन रुपए को कोई खास चीज नहीं समझने के कारण अपने पैसे छोड़ जाते होंगे। मैंने बस अपने दो रुपए वापस मांगे थे। मेरे रंग-रूप को देख कर ही पता चलता है कि मैं जनजातीय समुदाय से आता हूं और यही काफी था कि टिकट खिड़की पर बैठा वह व्यक्ति मेरे अस्तित्व पर अवांछित टिप्पणियां करे! उस व्यक्ति ने ट्रेन में पूरे पैसे चुका कर आरक्षित टिकट लेने को मेरे जनजातीय आरक्षित वर्ग से कैसे जोड़ दिया? उसने दो रुपए मांगने के कारण मुझे जंगली क्यों कहा?

ऊपर से देखने में ये बातें बिल्कुल आम लगती हैं और कोई मुझे यह सलाह भी दे सकता है कि यह कोई खास बात नहीं है। लेकिन एक संस्कृति कैसे और क्यों इस तरह के मनोविज्ञान को बनाए रखती है? किसी का रंग-रूप ही क्यों उसकी सामाजिक हैसियत को ऊंचा या नीचा साबित करने के लिए काफी होता है?

मैं खुद को थोड़ा जागरूक इंसान मानता हूं। शायद यही वजह थी कि मैंने टिकट मांगने से लेकर बाकी के दो रुपए वापस लेना जरूरी समझा। टिकट खिड़की पर बैठा व्यक्ति उन लोगों से किस तरह पेश आता होगा, जिन्हें देखने से ही यह पता लग जाता है कि वे गरीब या मजदूर वर्ग के सदस्य हैं। इन लोगों के साथ पैसे लूटने का खेल टिकट खिड़की से लेकर ट्रेन के जेनरल बोगी यानी सामान्य डिब्बे और गंतव्य स्टेशन से बाहर निकल जाने तक होता है। इसमें रेलगाड़ी में सुरक्षाकर्मियों से लेकर टिकट जांच करने वाले और स्टेशन से बाहर निकलते वक्त टिकट लेने वाले टीटी तक शामिल रहते हैं।

बात यहीं तक सीमित नहीं है। इसने एक सामाजिक मनोविज्ञान के रूप में अपनी जगह बनी ली है। मेरे जिस दोस्त ने यह कहा था कि तुम दो-तीन रुपए के लिए क्यों झगड़ा कर लेते हो, वह कॉमरेड कहलाना पसंद करता है। क्या उसने इन दो-तीन रुपए के जरिए रोजाना होने वाले करोड़ों के घोटाले के बारे में कभी सोचा है? यह बात कहां से किसी की मानसिकता में पैठ जाती है कि दो-तीन रुपए कोई चीज नहीं होते?

हमारे महान देश में नमक अब दस से लेकर पंद्रह रुपए किलो या इससे भी ज्यादा महंगा मिलता है। आयोडीनयुक्त नमक नहीं खरीदना अघोषित रूप से अपराध मान लिया गया है। कभी मैं गांव में जब नमक खरीदने जाता था तो पचास
पैसे में एक किलो नमक मिलता था। अब वह पचास पैसे का सिक्का दिल्ली में चलन से बाहर हो चुका है। क्या भारतीय रिजर्व बैंक ने सिक्के बनाने बंद कर दिए हैं? सरकार का भी कहना है कि वह बंद नहीं हुआ है। लेकिन व्यावहारिक तौर
पर पचास पैसे के सिक्के का चलन बंद हो जाने जैसी व्यवस्था चुपचाप कैसे बन जाती है? क्या इसके पीछे कोई पूंजीवादी साजिश हो सकती है? पचास पैसे या एक रुपए की जगह कई बार मुझे एक टॉफी पकड़ा दिया जाता है। दुकानदार का
कहना होता है कि उसके पास खुदरा नहीं है। और इससे भी ज्यादा कि पचास पैसे का सिक्का नहीं चलता, या कि एक रुपए के लिए क्या किच-किच करते हो! फिर सामानों के मूल्य में पचास पैसे क्यों अंकित किए होते हैं? क्या यह सब हमारी लोकतांत्रिक सरकारों के बिना चाहे हो रहा है?

(जनसत्ता से साभार)

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2 बैठकबाजों का कहना है :

निखिल आनन्द गिरि का कहना है कि -

अरुण जी,
आपका लेख पढ़कर सरकारी काउंटरों की पूरी तस्वीर सामने आ गई....दिक्कत आपके रंग-रूप में नहीं है, समाज के रंग-रूप में है....आपने खुलकर बात रखी, यही बड़ी बात है.....बैठक को भी इस सार्थक लेख के लिए धन्यवाद...

AVADH का कहना है कि -

अरुण जी,
आपने बिलकुल सही लिखा है.
हर पाठक को इसमें अपनी आप बीती नज़र आएगी.
आभार सहित
अवध लाल

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